उंमग भरी तीज

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बरखा का खत लेता आजा सावन,और सावन लेता आ तीज,वो अलबेली सुहागन तीज जो अपने साथ त्योंहारों की अठखेलियां करे और नवयौवना की उमंगो को परवान करे और साथ ही छ माह बाद आने वाली गणगौर के सुमधुर गीतो के साथ श्रृंखला पूरी करती हुई विदा हो जाए पुनः लोट आने के लिए। तीज के बाद ही रक्षाबंधन की राखी की डोर ,जन्माष्टमी का माखन चोर, श्राद्ध-पर्व मे पूर्वजो के आशीर्वाद की डोर, नवरात्रि मे गरबे का शोर, दशहरा, दीपावली मे पटाखो का जोर सहित बड़े त्योंहार अभिषेक करते है उमंगो का,आशावादिता का और राजस्थान की विविधता को रोचकता प्रदान करते है। हमारा रंग रंगीला राजस्थान तो हमेशा से ही तीज-त्यौहारों, रंग-बिरंगे परिधानों, मेलों, उत्सवों और अपनी जीवन्तता के लिए जाना जाता है, फिर भी तीज का त्यौहार राजस्थान के लिए एक अलग ही उमंग लेकर आता है, नयी नयी उमीदें लेकर आता है।नवोढा के लिए तो सबसे खुबसुरत समय होता है,मायके और ससुराल से बरसता है प्‍यार सिणजारे के रूप मे,और सखियो की छेडछाड,अंखियो की शरारत तीज को और खुबसुरत बना देती है।
बरसात का महत्व यूँ तो सभी के लिए है चाहे वह कोई भी देश हो या कोई भी प्राणी। परंतु मरुभूमि के लिए तो पानी अमृत के समान है,और राजस्‍थान की संस्‍कृति ने इस अवसर को भी अपने माधुर्य मे समेट रखा है। ऐसे में जब महीनों से तपती हुई मरुभूमि को तृप्‍त करता सावन आता है तो वह निश्चित ही किसी उत्सव से कम नहीं होता। सावन का यह महीना जब पूरे प्रदेश की सुख समृद्धि से जुड़ा हो तब सावन की ऋतु मरू प्रदेश के लिए और भी अधिक समरसतापूर्ण हो जाती है।

सावन की इसी बारीश पे ही तो टिकी होती है मरू प्रदेश की हर आस, फिर चाहे बात खेती-बाड़ी की हो या रोजमर्रा की जरूरतों और पीने के पानी की। तभी तो सावन के आगाज़ के साथ ही शुरू होती है विभिन्न देवी देवताओं से अच्छी बरसात और अच्छी फसल की प्रार्थनाएं। तभी तो आसमान से टपकती हर एक बूँद आनंद और मस्ती की हिलोरों से सराबोर कर देती है मरुभूमि के जन सामान्य से लेकर पशु-पक्षी और पेड़-पौधों तक को। तभी तो पूरा सावन ही शिव पार्वती की तरह आदर्श जीवन का एक आदर्श पर्व, एक उत्सव, एक त्यौंहार बन जाता है। पानी के रूप में आसमान से बरसता ये अमृत जैसे ही रेत के धोरों को छुता है तो गीली मिटटी की सौंधी गंध पुकार उठती है , आजा रे सावणियां ,बाट उडिके तीजण रे। पंद्रह पंद्रह दिन पहले पेड़ों पर झूले भले ही कहीं देखने ना मिले,आज वो उमंग ना दिखे,आज भी समय का रोना हो पर आज भी कुछ महिलाए एक दिन के लिए ही सही लहरिया पहन कर सजतीं है और घर में पकवानों विशेषकर खीर और घेवर का स्वाद लिया जाता है तो सावन मन के अन्दर गहरे तक उतर आता है। तीज की कहानी सुनने,सजने सवरने,अपने पिहु को रिझाने के साथ सुमधुर गीतो मे परंपरा निर्वाह करती है। तीज का माहत्‍मय आज की पीढी को भी पता होना चाहिए । चलो हम बताते हैं तीज की कथा___
शिवजी ने पार्वतीजी को उनके पूर्वजन्म का स्मरण कराने के लिए तीज की कथा सुनाई थी। शिवजी ने कहा_ हे पार्वती तुमने हिमालय पर मुझे वर के रूप में पाने के लिए घोर तप किया था। अन्न-जल त्यागा,पत्ते खाए,सर्दी-गर्मी,बरसात में कष्ट सहे। तुम्हारे पिता दुःखी थे। नारदजी तुम्हारे घर पधारे और कहा- मैं विष्णुजी के भेजने पर आया हूं। वह आपकी कन्या से प्रसन्न होकर विवाह करना चाहते हैं। अपनी राय बताएं। पर्वतराज प्रसन्नता से तुम्हारा विवाह विष्णुजी से करने को तैयार हो गए। नारदजी ने विष्णुजी को यह शुभ समाचार सुना दिया पर जब तुम्हें पता चला तो बड़ा दुख हुआ। तुम मुझे मन ही मन अपना पति मान चुकी थी। तुमने अपने मन की बात सहेली को बताई। सहेली ने तुम्हें एक ऐसे घने वन में छुपा दिया जहां तुम्हारे पिता नहीं पहुंच सकते थे। वहां तुम तप करने लगी। तुम्हारे लुप्त होने से पिता चिंतित होकर सोचने लगे यदि इस बीच विष्णुजी बारात लेकर आ गए तो क्या होगा।
शिवजी ने आगे पार्वतीजी से कहा- तुम्हारे पिता ने तुम्हारी खोज में धरती-पाताल एक कर दिया पर तुम न मिली। तुम गुफा में रेत से शिवलिंग बनाकर मेरी आराधना में लीन थी। प्रसन्न होकर मैंने मनोकामना पूरी करने का वचन दिया। तुम्हारे पिता खोजते हुए गुफा तक पहुंचे।

तुमने बताया कि अधिकांश जीवन शिवशंकर को पतिरूप में पाने के लिए तप में बिताया है। आज तप सफल रहा, शिवजी ने मेरा वरण कर लिया। मैं आपके साथ एक ही शर्त पर घर चलूंगी यदि आप मेरा विवाह शिवजी से करने को राजी हों।
पर्वतराज ने पार्वती के प्रेम का मान रखा तत्पश्चात विधि-विधान के साथ विवाह कराया। हे पार्वती! तुमने जो कठोर व्रत किया था उसी के फलस्वरूप हमारा विवाह हो सका। इस व्रत को निष्ठा से करने वाली स्त्री को मैं मनवांछित फल देता हूं। उसे तुम जैसा अचल सुहाग का वरदान प्राप्त होता है। मनचाहे वर के लिए हरियाली तीज के व्रत की तुलना कहा वेलेंटाइन डे जैसी संस्कृति कर सकती हैं । प्रेम के प्रतीक सावन महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहीं कज्जली तीज तो कहीं हरियाली तीज के नाम से जाना जाता है। भव‌िष्य पुराण में देवी पार्वती बताती हैं क‌ि तृतीया त‌ि‌‌थ‌ि का व्रत उन्होंने बनाया है ज‌िससे स्त्र‌ियों को सुहाग और सौभाग्य की प्राप्त‌ि होती है। सावन महीने में तृतीया त‌िथ‌ि को सौ वर्ष की तपस्या के बाद देवी पार्वती ने भगवान श‌िव को पत‌ि रूप में पाने का वरदान प्राप्त क‌िया था।
हरियाली तीज के दिन विवाहित स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन स्त्रियों के मायके से श्रृंगार का सामान और मिठाइयां उनके ससुराल भेजी जाती है। हरियाली तीज के दिन महिलाएं सुबह घर के काम और स्नान करने के बाद सोलह श्रृंगार करके निर्जला व्रत रखती हैं। इसके बाद मां पार्वती और भगवान शिव की पूजा होती है। पूजा के अंत में तीज की कथा सुनी जाती है। कथा के समापन पर महिलाएं मां गौरी से पति की लंबी उम्र की कामना करती है। इसके बाद घर में उत्सव मनाया जाता है और भजन व लोक नृत्य किए जाते है। इस दिन हरे वस्त्र, हरी चुनरी, हरा लहरिया, हरा श्रृंगार, मेहंदी, झूला-झूलने का भी रिवाज है और भला ये रिवाज़ अगर नई पीढी न जाने तो प्रेम की अमर कथा कैसै जान पाएगी । आज युवा पीढी बात बात पर रिश्ते तोडने पर उतारू हो जाती है,उनके लिए एक आदर्श जीवन संस्कृति है,हम इस परंपरा का स्वयं निर्वाह करे और आने वाली पीढी को बताए कि ये झूले ,ये मेहंदी,ये घेवर,ये फीणी अपने अंदर बहुत बडा आदर्श छिपाए है,आज अगर हम अपने तीज त्योहार का अनुसरण करे तो आदर्श जीवन व्यवस्था बनाए रख सकते हैं ।

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