कोहिनूरी प्रतिभा

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ग़रीबी की कोख से निकल स्वयं को मजबूती के साथ खड़ा करना ,अपनी प्रतिभा का लौहा मनवाने का सफ़र विभिन्न बाधाओं को पार कर तय हॊता हैं । उन परिस्थियों में ये भी लगता कि बुलंदी उसे वाहवाही दिलवा शीर्ष स्थान काबिज कर देगी तो दुनिया उसे सिकंदर समझ नतमस्तक होगी।  हाँ ! निसंदेह ऐसा हॊता भी बशर्त हैं आप उच्चवर्गीय , पूँजीपति , आकर्षक हो तो डंका ऐसा बजेगा कि कानों के पर्दे फट जाये ।हमारा चौथा स्तम्भ मीडिया भी पूर्ण रूप से सक्रियता दिखाता मोटी काली स्याही से लिखी हेडलाइंस होती  सभी पत्रकार , रिपोर्ट्स उसे कवरेज करने को लालायित । उस से  दूसरा सच ये जिसे नकारा नहीं जा सकता कि कोई गरीब , संघर्षों की गोद में पोषित , दलित , आदिवासी , पिछड़े क्षेत्र की  होनहार , जी तोड़ मेहनती , शरीर की नाजुक हड्डियों को लौहा बना देने वाली स्त्री मेरी कॉम या हिमा दास जैसी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर की खिलाड़ी जो विश्वभर के धुरंधरों को अपने -अपने क्षेत्र में नाकों चने चबवा भारतवर्ष की झोली में स्वर्ण पदक ड़ाल देती हैं । इस समाज के  दो मुँहे के लोग, धर्म जाति की तुला ले कर बैठे हैं , किसी की मेहनत से अर्जित जीत को चाहे परीक्षाओं की जीत हो , लेखन में बढ़ते कदम हो , सभी का धार्मिक , राजनैतिक , जातीय तुला में तौलते अथवा ट्रोल बना प्रशंसा करने की बजाय नीचा दिखाने को उतारूँ रहते । रोकिए इन नफ़रत की आँधियों  को ऐसा ना हो मुल्क के लोग इन पैतरों को अपना एक -दूसरे की जान लेने को उतारूँ हो जाये । यही दोगलापन  हिमादास झेल रही हैं । ऐसी गोल्डन गर्ल की  प्रशंसा करना तो दूरी की बात उसकी उपल्बधि पर उसकी जाति सर्च कर असमानताओं को उगा उसके सम्माननीय व्यक्तित्व को ठेस पहुंचाते हैं । उन गोल्ड मेडलस की चमक में भी उन्हें ये कारण खोजने होते हैं कि कैसे इस बाजी को अपने पाले में खींचे ने का प्रयास करें।  जब नहीं खींच पाते तो प्रशंसा भी नहीं कर पाते जैसे जुबां लकवे से बंद हो गयी हो । जी हाँ ! यहाँ हिमादास की बात मैं रखना चाहती हूँ । हिमादास जो इस महान देश भारत की धाविका हैं।  यदि पी.टी .ऊषा के पश्चात इस रेसलिंग क्षेत्र में भारत भाल को स्वर्ण पदकों से किसी ने सुशोभित किया तो वो एक ही नाम हैं हिमादास ।
9जनवरी 2000में असम राज्य के ढिंग गाँव के किसान परिवार में जन्मी हिमादास रोंजीतदास , जमौली की पाँच भाई -बहनों में आख़िरी संतान हैं । पिता द्वारा चावल की खेती कर एवं माँ गृहकार्य कर बच्चों का पालन पोषण करते आ रहे हैं । हिमा का लड़को के साथ फुटबॉल खेलना ही इस बात की गवाही देता हैं कि उनका झुकाव ,लगाव खेल में अत्याधिक रहा । हिमा ने फुटबाल के मैदान में अपनी दौड़ने की क्षमता को बढ़ाया जब वो खेलती थी तो गाँव के लोग फुटबाल में कैरियर बनाने के मश्वरे भी हिमादास को देते ताकि वे गाँव का नाम रोशन कर सके किंतु अभी तक कोई उद्देश्य दौड़ने के क्षेत्र में निर्धारित नहीं किया था । सामान्य बच्चों की भाँति केवल खेल को मनोरंजन समझ खेले जा रही थी । उनकी गुणवत्ता की प्रथम परख उनके जवाहर नवोदय विद्यालय के फिजिकल अध्यापक द्वारा की गई । उन्हीं का मार्गदर्शन पा हिमादास ने रेसिंग प्रतियोगिताओं में भाग लेना प्रारम्भ किया ।चूँकि गाँव में रेसिंग ट्रक नहीं था यदि हॊता  भी तो किसी निर्धन तबके की सामान्य लड़की के लिए मिलना भी असम्भव हॊता । हिमादास अपनी दौड़ की प्रेक्टिस मिट्टी के उसी मैदान में करती जहाँ वह साथियों के साथ फुटबाल खेलती थी । हिमा की 2017की इंटर डिस्टिक दौड़ ने उन्हें  100मीटर की दौड़ में विजयी बना उनके इरादो , हौंसलॊ को मजबूती दी  । यही वो समय था जब हिमादास के सितारे बुलंदियों पर थे उन्होनें उस प्रतियोगिता के लिए जो शूज पहने थे वो बहुत ही सामानय सस्ती क्वलिटि के थे अभिप्राय ये हैं कि जिसे प्रकार के बहुत ही गरीब बच्चे के जूतों की कल्पना होती हैं वैसे ही इस महान धाविका के रहे जुनून के समक्ष ये वस्तुएँ आड़े भी नहीं आती । ज़्यादातर अर्थ का अभाव प्रतिभाओं को दफ़न कर देता हैं ।  हिमा की मेहनत , लग्न उसे मंजिल की ओर बढ़ाना चाहती थी । वहीं पर हिमादास की गुणवत्ता के पारखी कोच निपॉन  ने उनकी तीव्र गति को देखा तो आश्चर्यचकित रह गये । तभी से उन्होनें इस प्रतिभासंपन्न लड़की को ट्रेंड करने का दृढ़ संकल्प लिया । निपॉन से कोच का स्वतः ही मिल जाना किसी चमत्कार से कम नहीं रहा होगा हिमादास को माता पिता की आज्ञा ले गुवाहाटी ले गये इस के पीछे दो कारण थे एक उत्तम ट्रेनिंग , दूसरा समय से अच्छा भोजन मिल सकेगा यही सोच के उन्हें भेज दिया गया  । इन्होंने अपनी मेहनत , पूर्ण , निष्ठा एवं कोच के निर्देशन ने अब 200मीटर की बजाय 400मीटर दौड़ने की आत्मशक्ति को बढ़ा लिया । अब मिट्टी के मैदान ने एक मुक्कमल ट्रेक का स्थान ले लिया था जहाँ हिमादास अपनी हड्डियों और शरीर को   पसीने में तर बदर कर खुद को सोना बनाने के लिए तपा रही थी ।अब वो वक्त भी आ ही गया जब खुद को चुनौतियों के आगे खड़ा कर साबित भी करना था । 
हिमादास ने बैंकाक में एशियाई यूथ चैम्पियनशिप में 200मीटर दौड़ सातवाँ तथा 18वर्षीय हिमादास आस्ट्रेलिया के कॉमन वेल्थ की 400मीटर दौड़  में हिस्सा ले छठा स्थान पाया ये दो असफलता हिमादास के हौंसलॊ को क्षीण नहीं कर पाई बल्कि उन्होनें अपनी शक्ति संचय कर उससे और  परिश्रम कर आगे बढ़ने की प्रेरणा भर गई ।19वर्ष की कम आयु में अर्जुन अवार्ड हासिल करने वाली इस धाविका ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम  एथेलिस्ट  भारतीय महिला का श्रेय भी दिलवा दिया । इन  दिनों जुलाई माह में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में चार स्वर्ण पदक हासिल कर विश्व स्तर पर भारत की विजय का परचम लहरा देने वाली इस अद्भुत प्रतिभा वाली खिलाड़ी ने 4जुलाई को पोजनान एथलेटिक्स में 200मीटर की रेस को 23.65 सैकेंड 7जुलाई को पोलैंड के कुटनो एथलेटिक्स में 23 .43 सैकेंड , 13जुलाई का gold Medal चेक रिपब्लिक कलांदे मेमोरियल 23.43सैकेंड तथा 17जुलाई का एक और स्वर्ण पदक टबोर एथलेटिक्स रेस को 23 25 सैकेंड में पूर्ण कर इस गोल्डन गर्ल ने भारत भाल को गर्व से शिखर तुंग सा कर दिया हैं । अधिकतर अभिनेताओं  , अभिनेत्रियों ने उनकी इस अद्भुत जीत पर ट्वीट कर बधाइयाँ भी दी हैं । समाज के लोगों की गलित , संकीर्णताओं से लिप्त मानसिकता इस सच को पचा नहीं पा रही हैं सोशल मीडिया पर क्रिकेट का रोना धोना प्रलाप अभी तक सुर्खियों में हैं अख़बार भी काले अक्षरों में जैसे मुँह छूपा हेमादास की उपलब्धियों से जी चुरा रहे हो । या कोन की छोटी सी ख़बर बना तिलांजलि दे दी जाती ।  ऐसा  ग़ैर जिम्मेदाराना रवैया इस चौथे स्तम्भ की गरिमामयी छवि को खराब कर रहा हैं । हिमादास  पर हमें गर्व हैं भारत का सौभाग्य रहा हैं कि  ऐसी विभूति ने भारत की भू पर जन्म ले उसे धन्य किया हैं असमानताओं ,वर्गभेद , ग़रीबी अमीरी , इन सभी से ऊपर उठ सोचना हो गा ।मुझे उम्मीद हैं हिन्दोस्तान का मीडिया ईमानदारी से अपनी भूमिका अदा करेगा । एक दिन भारत की स्त्रियाँ भी खुले मंच पर नारी जाति के बिना किसी विभेद अधिकारों की लड़ाइयों , खुले दिल से एक दूसरे की प्रसन्नताओ  में शामिल होगीं ।
‘ ‘ सोने की लड़की क्यों ? ये तो
कोहिनूर है भारत भाल का
नारी शक्ति की पहचान का
 तिरंगा के मान सम्मान का । ‘ ‘
धूल से उठ छूना आसमां को  आसां नहीं होता यारों ।  इस कोहिनूरी इंसान की जाति  सर्च करना बंद कर जीत के जश्न को मनाओ । सत्ता , समाज , सम्प्रदाय के नाम पर इंसान को पाट देने वाली सोच से ऊपर उठकर हिमादास जैसी पूर्व , समकालीन तथा भविष्यनेत्रियाँ  जो किसी भी क्षेत्र में ऐसी अनोखी प्रतिभाओं को ले पैदा होगीं  उनके हक का सम्मान भारत के नागरिक अवश्य देंगे ।

– डॉ.राजकुमारी

(सहायक प्रवक्ता हिन्दी)

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