हिंद में ही हिन्दी उपेक्षित क्यों

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हिंद देश के वासी हम और हमारी भाषा हिन्दी आज अपने ही घर में दोयम दर्जे का जीवन जी रही है, किसने सोचा था कि हमारी भाषा हिंदी एक दिन केवल हिंदी दिवस तक सीमित रह जाएगी। आज हिंदी भाषी अपने ही देश में अनपढ़ और अंग्रेज़ी में बात करने वाले उच्च शिक्षित, कुलीन वर्ग के हिमायती बन गए। क्या दूसरों से बेहतर या उनके बराबर दिखने की चाह जिन्हें हम अपने से बेहतर मानते हैं, हमारी वर्ण व्यवस्था का ही एक विकृत रूप नहीं है। अभिजात्य वर्ग का पूरा तंत्र, आज इस खाईं को और भी विषम बना रहा है। उदाहरणार्थ , आप एक बड़े स्कुल या पांच सितारा होटल के रिसेप्शन या फिर किसी बड़े निजी अस्पताल में खड़े हैं। वहां अगर आप अंग्रेजी में अपना परिचय देते हैं तो संभव है कि रिसेप्शनिस्ट का व्यवहार आपके प्रति अलग होगा। ऐसे में अगर आप ग़लत ही सही, लेकिन अंग्रेज़ी बोल सकते हैं तो शायद वही बोलेंगे।

लेकिन अंग्रेज़ी बोलने वालों को अधिक बौद्धिक या कुलीन समझे जाने की जड़ें इससे कहीं आगे जाती है। सामाजिक शोध अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि अंग्रेज़ी के रास्ते भारत में आई आधुनिकता ने हिंदी को दोयम बना दिया । ‘अंग्रेज़ों के भारत में आने से पहले हम एक परंपरागत समाज थे हमारे यहां आधुनिक विज्ञान, तकनीक और लोकतंत्र जैसी सामाजिक व्यवस्था और विचार सबसे पहले अंग्रेज़ी में ही आए। पाश्चात्य पुनर्जागरण उनकी मातृभाषा में होता है , और हमारा पुनर्जागरण आंग्ल भाषा में होता है। आज भी आंग्ल भाषा में लिखे गए को हिंदी की अपेक्षा ज्यादा सही माना जाता है।

अपनी भाषाओं से आगे बढ़कर अंग्रेज़ी पढ़ने-समझने वालों को ही पहली बार आधुनिक समाज की विशेषताओं और अच्छाइयों का पता चला। ’ ऐसे में परंपरागत भारतीय समाज की संस्कृति और भाषा को भी नीची नज़र से देखा जाना शुरू हो गया। अंग्रेजी हमारे यहां आधुनिक और प्रगतिशील दिखने का एक नजरिया बन गई।हमने आधुनिकता औऱ प्रगतिशीलता का कोई अपना रास्ता निकालने के बजाय एक आसान तरीक़ा चुना और एक विदेशी भाषा के ज़रिए वहां पहुंचने की कोशिशों में लग गये। बेशक इसके पीछे दुनिया में भारत की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति की भी भूमिका रही। दुनिया के सामने गुलाम हिंदुस्तान को असभ्य, आदिम और अंधविश्वासी समाज के तौर पर पेश किया जाना भी लार्ड मैकाले का षडयंत्र रहा । लेकिन आजादी के इतने वर्षों बाद भी स्थिति यह है कि भारत में ही हिंदी या अन्य स्थानीय भाषाओं में बात करने वालों को उतना बौद्धिक या महत्वपूर्ण नहीं माना जाता। भाषा सिर्फ संप्रेषण का माध्यम ही नहीं, बल्कि इससे आगे जाकर संस्कृति की वाहक भी होती है। उदाहरणार्थ हिंदी बोलने वाले समाज की परंपराओं, जीवनशैली, समस्याओं और संघर्षों के बारे में ही ज्यादा हिन्दी में लिखा जाएगा अन्य भाषा में नहीं।

यही बात बोलचाल में भी देखी जा सकती है। हिंदी में आप, तुम और तू जैसे शब्दों का होना दिखाता है कि सामने वाले व्यक्ति के साथ आपके संबंधो का जुड़ाव क्या है । लेकिन अंग्रेज़ी में संबोधन के लिए सिर्फ एक शब्द ‘यू’ होता है जो बताता है कि यहां इस तरह के बंटवारे की संभावना कम है क्योंकि जब हम भाषा बदल रहे होते हैं, तो अनजाने में अपने विचार, संस्कृति और फिर समाज को भी बदल रहे होते हैं आज संस्कृति का अवमूल्यन हुआ है और पाश्चात्य संस्कृति का विकास हुआ है, उसका कारण स्वदेशी भाषा का तिरस्कार भी है और हम आधुनिकता की चकाचौंध में भारत की मूल्य पोषित शिक्षा का माध्यम हिन्दी को दरकिनार करते जा रहे हैं। जिस राष्ट्र की आवाज का माध्यम ही बदल जाए तो जड़ कितनी मजबूत होगी, सोचने का विषय है।

– डॉ.भावना शर्मा
झुंझुनूं, राजस्थान
bsharma.jjn@gmail.com

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