स्त्री सशक्तीकरण के सशक्त प्रहरी साहब कांशीराम जी को नमन

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आज 15 मार्च है यानि कि मान्यवर साहब कांशीराम जी का जन्मदिवस। 1934 में होशियारपुर में जन्मे मान्यवर कांशीराम बहुजन राजनीति के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। बहुजन राजनीतिक शृंखला में विश्वरत्न बाबासाहब डॉ. अम्बेडकर के बाद यदि कोई नाम प्रमुखता से उभर के आता है तो वह है साहब कांशीराम जी का। साहब का जीवन संघर्षो की एक लम्बी दास्तान है जिसकी गवाह हैं वो गलियाँ, वो मुहल्ले, वो कस्बें, वो शहर और वो मंच जिन तक पहुँचने के लिए उन्होंने साइकिल से ही अपनी यात्रा आरम्भ की थी। उसी यात्रा का प्रतिफलन बसपा है जिसे भारत के सबसे विशाल भूभाग ‘उत्तरप्रदेश’ पर चार बार लोगों की सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ।

बाबासाहब डॉ. अम्बेडकर ने संविधान के रूप में जिस आदर्श को स्थापित किया, उसी आदर्श को जन-जन तक पहुँचाने का काम मान्यवर ने करके बहुजन समाज को जोड़ा और बाबासाहब के स्वप्न सत्ता में भागीदारी को पूर्ण करके दिखाया।

किस्सों के माध्यम से अपनी बात को बहुजन समाज तक पहुँचाने और समझाने की उनमें अद्भुत कला थी। इतना ही नहीं बाबासाहब महिलाओं के अधिकारों को संरक्षित रखने हेतु जो हिंदू कोड बिल लाये एवं जिसके लिए अपने पद से इस्तीफ़ा दिया, उस महिला समाज के नवीन राजनैतिक मार्गो को प्रशस्त करने का काम भी साहब कांशीराम ने किया। 1977 के ज़माने में बहुजन महिलाओं में परिवर्तन की लहर उतनी नहीं थी जितनी अब है। उस समय एक सशक्त महिला को न केवल राजनीतिक पटल पर उपस्थित किया, अपितु बहुजनों के स्त्री सशक्तीकरण के बिन्दु को सशक्त किया। उस नाम को आज पहचान की आवश्यकता नहीं है, वे हैं – बहन कुमारी मायावती।

महात्मा गाँधी जी द्वारा थोपे गए हरिजन शब्द का पुरज़ोर विरोध करते हुए तथा इसे एक वैचारिक हीनता का परिचायक बताने वाली एक महिला का जिक्र जब साहब कांशीराम तक पहुँचा तो उन्होनें उनके इन विचारों को मजबूती देने के लिए और प्रशासनिक बाध्यताओं को समझते हुए बताया कि यदि वे समाज को जातीय उत्पीड़न से बचाना चाहती हैं तो अपने प्लेटफार्म को बदलें। बहुजन उत्पीड़ित समाज की आवाज़ बने और उनके लिए काम करें। महिलाओं का घर से निकल समाज में किसी पुरुष के साथ रहना, चुनौतियों और चेतावनियों भरा कंटक मार्ग होता है। इन विषम परिस्थियों में एक युवती का सरकारी नौकरी त्याग समाज उद्धारक और राजनीतिक चेहरा बनकर उभरना अत्यंत कठिन था। हमेशा बुद्ध और पटाचारा की भाँति काम कर बहुजन परम्परा को आगे बढ़ाया। ये दोनों विभूतियाँ बहुजन हितैषी चेहरे हैं। एक को काल मार्क्स और दूसरे को लेनिन की संज्ञा भी विद्वानों द्वारा दी जाती रही है, यद्यपि वैचारिक मतभेद बराबर है। मायावती जी ने राजनीतिक गुर मान्यवर कांशीराम जी से ही सीखे । एक दलित महिला को सशक्त राजनीतिज्ञ के रुप में मान्यवर ने खड़ा कर ये साबित किया कि अम्बेडकर ऐसे ही महिलाओं के अधिकारों के पक्षधर नहीं थे। यदि उनको अधिकारों का सदुपयोग आ जाये तो अपना लौहा मनवा सकती है।

महिलाओं की उन्नतशीलता, नारी सशक्तिकरण, एक शक्तिशाली राजनेता के रुप में बहन कुमारी मायावती जी को खड़ा किया, जो एक महान शक्ति बनकर उभरी। बाबासाहब कानून लाते हैं तो मान्यवर कांशीराम उनको ज़मीन स्तर पर सच करते हैं। यहाँ बहुजन वर्ग को दो ऐसे राजनेता मिलते हैं जो किसी धनाढ्य वर्ग या राजनैतिक खानदान से ताल्लुक़ नहीं रखते ना ही राजनीतिक विरासतों से उनका कोई वास्ता है। उन्होनें बहुजनों को जोड़ने का काम बड़ी संलग्नता से किया। अपना समस्त जीवन अपने समाज को समर्पित कर गये। मान्यवर कांशीराम जब तक जीवित थे बाबासाहब के दिए अधिकारों को प्रमाणित करते रहे। चाहे समानता, समान शिक्षा, राजनीति में, बहुजनों की भागीदारी, अधिकारों के प्रयोग आदि की अलख जगाते रहे। यदि डॉ. भीमराव अम्बेडकर संसद की ओर प्रस्थान को इंगित करते है तो साहब वहाँ बहुजन को ले जा कर बैठाने का कार्य करते हैं। निष्कर्षत: मान्यवर कांशीराम साहब बहुजन राजनीति के वो चेहरा हैं जो सदैव देदीप्यमान रहेंगे।

– डॉ. राजकुमारी

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