सावित्री बाई फुले को नमन

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तथागत की तथता को यदि आप महसूस करना चाहते हैं तो करुणा को अपने हृदय में धारण करना होगा। आपको बोधिसत्त्व की तरह ‘बोधिचित्त की परिणामना’ करनी होगी और दृढ़ प्रतिज्ञ होना होगा कि संसार में जब तक एक भी व्यक्ति दुःखी है, आप स्वयं की मुक्ति के बारें में नहीं सोचेंगे । किसी दूसरे के दुःख में दुःखी होने के साथ-साथ जब आप भी उसे महसूस करने लगें तो समझ लीजिए कि करुणा आपको सिद्धार्थ से बुद्ध की ओर ले जा रही है। जब करुणा से आप ओतप्रोत होंगे तो आप किसी भी रोगी या शोकग्रस्त जन को देखते ही दौड़ पड़ेंगे उसके उस रोग यां शोक को समूल नष्ट करने के लिए, क्योंकि तब तक आप उसमें और अपने में भेद को भूल चुके होंगे। आप समष्टि में सोच रहे होंगे। आपको इस ब्रह्माण्ड का एक-एक प्राणी चींटी से लेकर हाथी तक सब एक जैसे दिखाई देंगे। आपका हृदय तथागत की वाणी को भी महसूस करने लगेगा। आपके कानों से इस ब्रह्माण्ड में फैली हुई बुद्ध की वाणी सुनाई देने लगेगी..ये केचि पाणभूतत्थि तसा वा थावरा वा अनबसेसा।
दीघा वा ये महता वा मज्झिमा रस्सकाणुकथूला॥दिट्ठा वा येव अद्दिट्ठा ये च दूरे वसन्ति अविदूरे।
भूता वा संभवेसी वा सब्बे सत्ता भवन्ति सुखितत्ता॥अर्थात् संसार में जितने भी प्राणी हैं, फिर वे चाहे जंगम हों या स्थावर, बड़े हों या छोटे, बहुत ही पतले हों या स्थूल, दिखाई देने वाले हों या न दिखाई देने वाले हों, दूर हों या निकट, पैदा हुए हों या होने वाले हों, सभी सुखी रहें। जब आपका हृदय इस तरह के विचारों से परिपूर्ण हो जाता है तो आप ‘मैं’ और ‘तुम’ को भूल चुके होते हो, वहाँ आप अपने आपको ही सर्वत्र देखने लग जाते हो तथा साथ में आपको सब अपने में ही दिखाई देने लगता है।मैंने कई लोगों को कहते हुए सुना है कि ये सब आज के समय में केवल कागज़ी बातें हैं, ये सब रूहानी बातें हैं, इनका व्यवहार से कोई लेना-देना नहीं है। तो ऐसे अविद्याग्रसित जनों को मैं कहना चाहूंगा कि आपकी संस्कृति में हमेशा से ही व्यवहार और शास्त्र में भेद किया गया है जिसका खामियाज़ा हम भारतीय आज तक भुगत रहे हैं। ये खामियाज़ा इतना बड़ा है कि कभी दंगों का रूप लेता है, कभी आतंक का, कभी जातीय उत्पीड़न का तो कभी धार्मिक नरसंहार का।अस्तु, मुझे मेरी संस्कृति में सैंकड़ो नहीं, हजारों नहीं अनगिनत ऐतिहासिक उदाहरण मिलते हैं। उन्ही में से एक उदाहरण
महाराष्ट्र में नल्लासोपारा एक जगह है, जो प्राचीनकाल में सोपारा नामक प्रसिद्ध बंदरगाह था। नल्लासोपारा सम्राट् अशोक से लेकर सातवाहन वंशीय महाराज गौतमीपुत्र शतकर्णी के सुशासन और बौद्धों की करुणा का साक्षी स्थल है। यहाँ सम्राट् अशोक के दो अभिलेख भी मिलते हैं।अपने जीवन के अंतिम समय में माता सावित्रीबाई फुले नल्लासोपारा में प्लेग से कराहते हुए प्राणियों के आर्तनाद को सुनकर अपने आपको रोक न सकीं और चली आईं अपने जीवन की भी परवाह न करते हुए नल्लासोपारा। माता सावित्री का हृदय करुणा की असीम भावना से भर चुका था। वो अपनी आंखों के सम्मुख मौत का जो सच देख रही थीं, वो बहुत ही दर्दनाक और मर्माहत करने वाला था। गर्मी वाले दिनों में भी ब्यूबोनिक प्लेग से ग्रसित निरीह प्राणी ठण्ड से कांप रहे हैं, शरीर पर रक्त का स्राव ऐसा लग रहा है मानों साक्षात काल उन प्लेग-पिस्सुओं का रूप ले चुका है और लोगों को तड़पा-तड़पा कर मार रहा है, लोगों के शरीर का तापमान ज्येष्ठ की दुपहरी की तरह बढ़ रहा है, बेमौसम बर्षा की तरह बार-बार लोग वमन कर रहे हैं। ऐसा दृश्य माता सावित्री के आंखों के सम्मुख से गुज़र रहा था। वो उस पीड़ा को केवल देख ही नहीं रही, अपितु उस स्थिति को अपने हृदय से महसूस कर पा रही हैं ठीक बौद्ध विद्वान् वसुबन्धु की तरह।वसुबन्धु लगभग चौथी-पाचवीं शताब्दी ईस्वी के बौद्ध विद्वान थे, एक थेरवादी भिक्खु के रूप में उन्होंने अभिधर्मकोशभाष्य (जिसपर मेरा पीएचडी भी है) लिखा तथा महायानी भिक्खु के रूप में विंशका और त्रिंशका नामक दो ग्रन्थ लिखे। एक दिन वो अपने बुद्ध विहार से भिक्षा के लिए निकले ही थे कि उनकी दृष्टि एक कुत्ते पर टिक गई जिसके शरीर में कीड़े पड़े हुए थे। इस जगह शायद आप होते तो उस कुत्ते को भगा देते यां डण्डे से मारने दौड़ पड़ते क्योंकि आप बचपन से प्यार करना नहीं सीखते, आप सीखते हैं किससे नफ़रत करनी है और किससे प्यार करना है। आपको बचपन से ही ऐसा ढाला जाता है कि आप किसी के बारें में सही-गलत का मूल्यांकन जाति, धर्म यां लिंग के आधार पर करें न कि मानव होने के नाते। किन्तु भारत की हवाओं में आज भी बुद्ध की करुणा बची हुई है जिसकी वजह से कुछ तो ऐसे लोग भी हैं जिनकी वजह से ये देश चल रहा है, नहीं तो मजहबी, दंगाईयों और उपद्रवियों ने इसे कबका नेस्तनाबूत कर दिया होता।उस कुत्ते को देखकर वसुबन्धु का हृदय पसीज गया। वे करुणा से इतने पूरित हो गए कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि कब वे उस कुत्ते के कीड़े निकालने लग गए। करुणा केवल इतनी ही नहीं थी। बेइंतहा करुणा का सागर थे वसुबन्धु। उन कीड़ों को भी बचाने के लिए अपनी जांघ के एक हिस्से से मांस निकालकर उसपर रखने लगे। ये दृश्य करुणा के इतिहास का मील का पत्थर था। ये एक ऐसा प्रतिमान था, जिसे हम केवल सोच सकते हैं किन्तु जी नहीं सकते। किन्तु माता सावित्रीबाई फुले ने इस सत्य को झूठ बनने से रोक लिया था। उन्होंने अपनी ज़ान की भी परवाह नहीं की और प्लेग के मरीज़ों की सेवा करते हुए कब वो इतिहास बन गईं, किसी को पता भी नहीं चला।– डॉ. विकास सिंह (लेखक बिहार के दरभंगा में स्थित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय की अंगीभूत ईकाई मारवाड़ी कॉलेज में संस्कृत विभागाध्यक्ष हैं )

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