सांप्रदायिक सदभाव का प्रतीक नरहड की दरगाह

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नरहड गांव झुंझुनु जिले मे आज सांप्रदायिक सद्‍भाव का प्रतीक है ,जो कि चिडावा पिलानी मार्ग पर स्‍थित देवरोड़ गावं के निकटस्‍थ है। पुरातन समय मे मुस्लिमों व नेहरा जाटो का राज रह चुका है,आज भी गांव में रणवा व धायल दो जाट गोत्रो का आधिक्य है । इसी नरहड़ कस्बे में स्थित पवित्र हाजीब शक्करबार शाह की दरगाह कौमी एकता का जीवन्त उदाहरण है। इस दरगाह की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहां सभी धर्मों के लोग सद्‍भाव से पुजा अर्चना करते है। कौमी एकता के प्रतीक के रूप में ही यहां प्राचीन काल से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर विशाल मेला लगता है। जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से सभी धर्मो के लोग अपनी पूर्ण श्रद्धा से शामिल होते हैं। किदवंती है कि नरहड की दरगाह के गुम्बद से शक्कर बरसती थी इसी कारण यह दरगाह शक्कर पीर बाबा या पवित्र हाजीब शक्‍करबार शाह के नाम से भी जानी जाती हैं।शक्कर बार शाह अजमेर के सुफी संत ख्वाजा मोइनूदीन चिश्ती के समकालीन व सिद्ध पुरुष थे।

शक्कर बार शाह ख्वाजा साहब के 57 वर्ष बाद तक जीवित रहे और इस धरती पर सद्‍भाव की परंपरा की मिशाल कायम की । आज भी यहाँ श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन कोमी एकता सद्‍भाव का विशाल मेला भरता है जिसमे देश के विभिन्न हिस्सों से आए श्रद्धालु शिरकत करते है। राजस्थान व अन्‍य समीपस्‍थ क्षेत्रो मे तो शक्कर पीर बाबा को लोक देवता के रुप मे पूजा जाता है। जन्म, मरण,परण कोई भी कार्य हो बाबा को अवश्य याद किया जाता है इस क्षेत्र के पशुपालक तो गाय भैंसों के बच्चा जन्‍मने पर उसके दूध से जमे दही का प्रसाद पहले दरगाह पर चढ़ा कर पशु का दूध घर में इस्तेमाल करते है। पशुओं को स्‍वस्‍थ रखने की दुआ भी यहाँ की जाती है । हाजिब शक्कर बार साहब की दरगाह के परिसर में जाल का विशाल पेड़ हैं जिस पर जायरिन अपनी मन्नत के धागे बांधते हैं। मन्नत पूरी होने पर गांवों में रातीजगा होता है जिसमें महिलाएं बाबा के बखान के लोकगीत जकड़ी गाती हैं। यह माहौल इतना सुरम्य होता है, अमन चेन का आलम होता है,कि कोई केवल हिंदू मुसलमान नही होता,बस नेकदिल इंसान होता है । दरगाह में बने संदल की मिट्टी को लोग श्रद्धा से अपने साथ ले जाते हैं जिन्हे खाके शिफा कहा जाता हैं। मान्यता है कि इस मिट्टी को शरीर पर मलने से पागलपन दूर हो जाता हैं। शायद माटी को मलना खुदा की ख़िदमत में खुद को समर्पित करना भी हो सकता है,जो एक मानसिक मजबूती की राह भी हो सकती है। शायद इसी विश्वास के रूप मे दरगाह में ऐसे दृश्य देखे जा सकते हैं।

हजरत के अस्ताने के समीप एक चांदी का दीपक हर वक्त जलता रहता हैं। इस चिराग का काजल बडा चमत्कारी माना जाता है कि आंखों के रोग भी दूर होने की आस्‍था रखी जाती है दरगाह के पीछे एक लम्बा चौडा तिबारा है जहां लोग सात दिन की चौकी भरकर वहीं रहते हैं नरहड़ दरगाह आने वाले सभी खादिम है जो इबादत के रूप मे सेवा कर खुदा की खिदमत करते है। दरगाह मे बाबा के नाम पर प्रतिदिन बड़ी संख्या मे खत आते हैं जिनमें लोग अपनी अपनी समस्याओं के निराकरण की अरदास करते हैं। जिस प्रकार ख्वाजा मोइनुदीन चिश्ती को ‘सूफियों का बादशाह ‘ कहा जाता है उसी प्रकार शक्कर बार शाह ‘बागड़ के धणी ‘ के नाम से जाने जाते है। किवदंती है कि नरहड़ कभी प्राचीन जोड राजाओं की राजधानी रही, उस वक्त दिल्ली पर पठानों का शासन था एंव लोदी खां नामक पठान वहां का गर्वनर था। पठानो व राजपुतों के मध्य हुए युद्ध में पठान निरंतर परास्त होते गये एवं नरहड़ मे आकर उनके सैनिक व घोड़े थकते गए। एक रात दिव्यवाणी द्वारा पीर बाबा ने कहा कि तुम युद्ध कैसे जीत सकते हो। तुमने तो मेरी मजार पर अस्तबल बना रखा हैं। उसी वक्त पठान सेना ने वहां से अस्तबल हटाया व विजय हासिल की। उसी वक्त से यहां उनका आस्ताना कायम हैं। इतना महत्तवपूर्ण स्थल होने के बावजुद भी असंतुलित क्षेत्रीय विकास के कारण यहां आने वाले जायरीनो को परेशानी उठानी पडती हैं। यहाँ की बदहाल सड़के, वर्षा के मौसम मे पर्याप्त नियोजन का अभाव मे राजस्थान ,खासतौर से झुंझुनू की इस पुरातात्‍विक समृद्धि को सही मायने मे हम संजो नही पा रहे है, नही तो पर्यटन की दृष्टि से इस क्षेत्र को विकसित किया जा सकता है। आज भूमण्‍डलीकरण के युग मे हम अपने संसाधनों का समुचित संवर्धन नही कर पाते है तो ये एतिहासिक मेले केवल पन्नों तक सीमित रह जाएंगे। अतः आज के परिप्रेक्ष्‍य मे अपनी संस्कृति के संवर्धन हेतु हमे अपने पुराने तीज त्योहार मेले को सहेजना ही होगा।

-डॉ.भावना शर्मा

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