शिव पार्वती का प्रतीकात्मक चित्र अपने आप में कथानक है चितेरी सोनल जैन का

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राजस्थान की चित्रकला शैली में मारवाड़ चित्रकला शैली अद्भुत है जो महाराजा जसवंत सिंह, महाराजा मानसिंह, मालदेव जो जोधपुर के स्वर्णिम चित्रकला शैली के उन्नायक रहे जहाँ नारायण दास शिवदास, देवदास, अमरदास, विशनदास, रतन जी भाटी, रामा, नाथा, छज्जू, और सेफ जैसे चित्रकार भी रहे। पीले रंग की चित्रात्मकता की स्वर्णिम आभा की यकायक स्मृति में आ गई जब इंस्टाग्राम की एक पोस्ट पर मेरी नजर पड़ी। तस्वीर शंकर पार्वती के युगल पाद की थी जो अपने आप में एक चित्रात्मकता लिए कथानक थी
यकायक जोधपुर लघु चित्रकला का हस्तलिखित ग्रंथ जहां ऊट की पीठ पर ढोला और मारू जैसे प्रसिद्ध प्रेमियो के दृश्य, बिलावल रागिनी चित्र, सुरसागर व रसिक प्रिया चित्र, नाथ चरित्र, दुर्गा सप्तशती ढोला मारू मरवण री बात, पंचतंत्र , वैली किसन रूकमणी आदि ग्रंथों की सहज स्मृति हो आई जब स्वयं मे कथानक को समेटे अपने आप में संपूर्ण चित्र को देखा जो जोधपुर की सोनल जैन द्वारा चित्रित था।

दो शैली का मिश्रित सा रूप चित्र को अनुठा बना रहा था तब अन्य चित्र को ध्यान से देखने पर ज्ञात हुआ कि यह चित्रकार जोधपुर के ही नेहरू पार्क के पास व्यवसायी श्री सुरेंद्र सुराणा सुशीला सुराणा की बेटी है जो बचपन से ही चित्रो के साथ खेलती रही और इसका प्रत्यक्ष गवाह रहा संत पैट्रियक विद्या भवन जहां सोनल गाय का चित्र बना कर ले जाती है और तब वहां के शिक्षक भी अभिभूत होते हैं और माँ भी समझ जाती है कि यह विलक्षण चित्र है जो उनकी लाडली ने उकेरे है। कमला नेहरू कालेज में भी अध्ययन के साथ चित्रो का साथ नही छोड़ा। अनगढ़ सी अनुठी रूचि को उम्मेद आर्ट ने सवारा पर यह रूचि व्यक्तिगत ही बनकर रह गई। क्योंकि महिलाओं के जीवन के भी दो पडाव होते हैं विवाह से पूर्व और विवाह पश्चात। जोधपुर में ही श्री धनपत राज सा मुणोत श्रीमती कृष्णा मुणोत परिवार की बहू बनने के एकबारगी कलम कुंची की जगह घर गृहस्थी ने ले ली और घर गृहस्थी के ककहरे और दो बच्चों के पालन-पोषण में व्यस्त होते-होते एक मोड़ पर गृहस्थी के रंग में कागद कुंची के रंग छुट गए पर बच्चों के बड़े होने के बाद खाली समय अखरने लगा तब एक नीरस खालीपन मे सारे रंग स्याह लगने लगे तब अपनी सास कृष्णा मुणोत जी की प्रेरणा ने उम्मीदों के रंग घोलने शुरू किए पर तब तक कुंची पकडने का आत्मविश्वास खो चुकी सोनल को आत्मविश्वास दिया उनके पति रवि जैन ने जिनका विश्वास पा कर रंग केनवास पर निखरने लगे । सरकारी सेवा में व्यस्त पति की प्रेरणा, जेठ जेठानी की सलाह, बच्चों की जिद्द, भाई भाभी की मनुहार कुंची के रंगों को केनवास तक लाने में कामयाब हुई तब धीरे-धीरे इन्हें वे अपनी जिंदगी का अहम सपना मानकर जीने लगी जो शायद एक कलाकार के लिए संजीवनी होती है। आत्मविश्वास का अभी भी अभाव था सोनल मे जिसे उडान मे रंग भरना सीखाया ममेरी बहन पंकज सेठिया भंडारी ने जिसने बताया कि जिंदगी की खोयी अभिरूचि मे रंग कभी भी भरे जा सकते हैं और कोई भी रूचि कभी भी नहीं मरती कुछ समय के लिए सुप्त हो सकती है और प्रेरक बनी शिक्षिका संगीता निदेशक रंगलोक इंन्सीट्यूट जयपुर, साथ ही सोनल जी की कला की पहली कद्रदान बनी रूचिता संखलेचा और इस तरह सोनल का कलामंच का सोपान रंगो से उड़ान भरने लगा जिसमे पिता श्री सुरेंद्र सुराणा ने भी हरसंभव प्रोत्साहन दिया। प्रारंभिक रूप से घर पर फिर धीरे धीरे दोस्तो को भी पता चला कि हमारे आसपास रंगो की चितेरी है तो धीरे-धीरे रंगो का उजास भी बढने लगा और इंस्टाग्राम पर एक अकाउंट ने एक चितेरी के जीवन को पहचान देने का काम बखूबी किया।
आज सोनल जैन उन जैसी तमाम महिलाओं के लिए एक आदर्श उदाहरण है जो अपने जीवन के कला पक्ष को भूल गई और आज कुछ करने का जज्बा रखती है।
आज उम्र के एक पड़ाव पर अपनी अभिरूचि मे फिर से रंग भरना निसंदेह गौरवमय अनुभूति है जिससे प्रेरणा सभी महिलाओं को लेना चाहिए।

– डॉ.भावना शर्मा (मोदियो की जाव
झुंझुनूं, राजस्थान)
bsharma.jjn@gmail.com

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