वैश्विक परिदृश्य में अहिंसा का सूत्रपात है विश्व शांति दिवस

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उन्नीस वी सदी युद्ध उन्माद के नाम रही , जन संहार, शीत युद्ध का चरम मानसिक तनाव , बड़ी बड़ी सभ्यताओं का विलोपन , मानव जनित सीमाओं पर एक दुसरे के खुन का प्यासे हैवानों का मानवता के हनन का प्रयास , और इन सबसे आजादी के लिए छटपटाहट, साथ ही अहिंसा के सिद्धांत के लिए अडिग एक महामानव महात्मा गाँधी का उद्भव इस युग की विशेषता रही । गांधी जी के अहिंसा के प्रयोग और विश्व शान्ति की उत्कंठ आशा लिए जन्म राष्ट्र संघ, फिर कालांतर मे सयुंक्त राष्ट्र संघ का निर्माण भी उन्नीसवीं सदी के नाम रही । ऐसे में भी वसुधैव कुटुंब की अवधारणा ने गांधीवादी सिद्धांतो को पुष्ट किया और वैश्विक शांति के उद्देश्य को लेकर आज भी प्रतिवर्ष सयुंक्त राष्ट्र संघ की पहल पर 21 सितंबर को विश्व शांति दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी देशों और नागरिकों के बीच शांति व्यवस्था कायम रखना और अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों और झगड़ों पर विराम लगाना है। अहिंसा हिंसा की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली होती है और सृजनात्मक होती है। शांति का यही संदेश दुनिया भर में पहुंचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने कला, साहित्य, सिनेमा, संगीत और खेल जगत की विश्वविख्यात हस्तियों को शांतिदूत भी नियुक्त किया हुआ है। इस साल विश्व शांति दिवस की थीम

“क्लाइमेट एक्सन फार पीस (Climate Action for Peace)” है। इस थीम के जरिए दुनिया भर के लोगों को ये संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि शांति बनाए रखने के लिए जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करना सबसे जरूरी है। जलवायु में हो रहा परिवर्तन विश्व की शांति और सुरक्षा के लिए बेहद खतरनाक है। साथ ही यह दिवस सभी देशों और लोगों के बीच स्वतंत्रता, शांति और खुशी का एक आदर्श माना जाता है। ‘विश्व शांति दिवस’ मुख्य रूप से पूरी पृथ्वी पर शांति और अहिंसा स्थापित करने के लिए मनाया जाता है। शांति शाश्वत होती है और अहिंसा इसका सन्मार्ग । इसकी खोज में मनुष्य अपना अधिकांश जीवन न्यौछावर कर देता है। किंतु यह काफ़ी निराशाजनक है कि आज इंसान दिन-प्रतिदिन इस शांति से दूर होता जा रहा है। हिंसा प्रतिहिंसा के दौर और चारों तरफ़ फैले बाज़ारवाद ने शांति को व्यक्ति से दूर कर दिया है। पृथ्वी, आकाश व सागर सभी अशांत हैं। स्वार्थ और घृणा ने मानव समाज को विखंडित कर दिया है। यूँ तो ‘विश्व शांति’ का संदेश हर युग और हर दौर में दिया गया है, लेकिन इसको अमल में लाने वालों की संख्या बेहद कम रही है। वर्ष 1982 से शुरू होकर 2001 तक सितम्बर महीने का तीसरा मंगलवार ‘अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस’ या ‘विश्व शांति दिवस’ के लिए चुना जाता था, लेकिन वर्ष 2002 से इसके लिए 21 सितम्बर का दिन घोषित कर दिया गया।

सम्पूर्ण विश्व में शांति कायम करना आज संयुक्त राष्ट्र का मुख्य लक्ष्य है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर में भी इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि अंतरराष्ट्रीय संघर्ष को रोकने और शांति की संस्कृति विकसित करने के लिए ही यूएन का जन्म हुआ है। संघर्ष, आतंक और अशांति के इस दौर में अमन की अहमियत का प्रचार-प्रसार करना बेहद ज़रूरी और प्रासंगिक हो गया है। इसलिए संयुक्त राष्ट्रसंघ, उसकी तमाम संस्थाएँ, गैर-सरकारी संगठन, सिविल सोसायटी और राष्ट्रीय सरकारें प्रतिवर्ष 21 सितम्बर को ‘अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस’ का आयोजन करती हैं। शांति का संदेश दुनिया के कोने-कोने में पहुँचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने कला, साहित्य, सिनेमा, संगीत और खेल जगत की विश्वविख्यात हस्तियों को शांतिदूत भी नियुक्त कर रखा है। बेहद सुखद है आज गांधी जी के आचार व्यवहार को सयुंक्त राष्ट्र संघ ने अंगिकार कर रखा है और अहिंसा का वैश्विक मंतव्य को सम्मान दिया जाता है। गांधी जी कि अहिंसा आज भी प्रासंगिक है इसलिए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी तीन दशक पहले यह दिन सभी देशों और उनके निवासियों में शांतिपूर्ण विचारों को सुदृढ़ बनाने के लिए समर्पित किया था।

– डॉ.भावना शर्मा
मोदियो की जाव, झुंझुनूं,राजस्थान
bsharmajjn@gmail.com

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