रैदास : सारनाथ के वारिस

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सारनाथ में जहाँ कभी बौद्ध भिक्खु प्रत्येक मास की पूर्णिमा और अष्ठमी को विशेष बुद्ध वंदना किया करते थे, अब वह स्थल शत्रुओं के आक्रमण के कारण सुनसान वीराने में तब्दील हो गया था। जहाँ कभी बुद्ध की वाणी गुंजायमान हुआ करती थी, वहाँ असत्य और दुराचरण चरम पर पहुँच रहा था। सामान्य जनता में जाति के आधार पर ऊँच-नीच की खाई को इतना गहरा कर दिया गया था कि मनुष्य और मनुष्यता गायब हो चुकी थी, बच गया था केवल जातीय पहचान। जन्म के साथ ही मानव की पहचान निर्धारित हो चुकी थी। भारत पूरी तरह से अछूत और उच्च जातीय वर्गों में स्पष्ट बट चुका था। इस भेदभाव का फायदा विदेशी हुकूमतों ने उठाया। मध्य एशिया के शाह मुहम्मद गौरी के गुलामों द्वारा स्थापित शासन के बाद भारत पर एक के बाद एक विदेशी ताकत राज कर रही थी। भारत से बुद्ध की शिक्षाओं का विनाश ही भारत की गुलामी का कारण बना। जब तक भारत पर बौद्धों का शासन रहा भारत सदैव स्वतंत्र और मजबूत रहा। बौद्धेतर धर्मों के राजाओं की अकुशल रणनीतियों और उनकी जातीय सोच ने भारत को एक ऐसी गुलामी की ओर धकेल दिया जिसका अंत लगभग एक हजार साल बाद हुआ।सारनाथ से थोड़ा सा दूर गंगा तट के नजदीक ही बाबा संतोख दास के घर माघ मास की पूर्णमासी को चहलकदमी हो रही थी। उनके घर में आस-पडौस की औरतों का तांता लगा हुआ है। आज संतोख दास की पत्नी कालसा के गर्भ से एक संतान जन्म लेने वाली है। संतोख की माँ लखपती बहुत व्यस्त है। वो पूरी तरह से अपनी बहु की सेवा में लगी हुई है। संतोख के पिता कालूराम जी घर में आए हुए मेहमानों के लिए गुड़ और पानी की व्यवस्था कर रहे हैं।दिन ढलने पर आ चुका है। गोधूलि वेला आते-आते कालसा के गर्भ का दर्द शुरू होता है। सभी औरतें इकट्ठा होती है और बड़ी ही सहजता से कालसा एक बच्चे को जन्म देती है। पूर्णिमा की चाँदनी रात मानहुँ इस बच्चे का स्वागत करने के लिए आज कुछ ज्यादा ही स्वच्छ और धवल हो गई है। गंगा की लहरें भी शांत हो गई हैं। वासंती हवाओं की मृदु शीतलता ने भी एकदम सहजता को धारण कर लिया है।और इधर धूल-धूसरित हो रहे सारनाथ के धम्मिक स्तूप और मृगदाय वन में हवाओं का रूख तेज है। इस हवा ने स्तूप की मिट्टी को हटाना आरम्भ कर दिया है। लग रहा है कि बुद्ध की विरासत को संभालने वाला सारनाथ का वारिस इस धरती पर जन्म ले चुका है।कालसा के इस बच्चे का तेज सूर्य को भी मात देने वाला है। पैदा होने के साथ ही इस बच्चे को देखकर सभी आनन्दित होते हैं। रवि जैसी आभा होने के कारण बच्चे की दादी उसका नाम रखती है रैदास। और इस तरह से सारनाथ को अपने वारिस के रूप में एक नया बोधिसत्त्व मिलता है रैदास।रैदास के पिता चमड़े से जूते बनाने का काम किया करते थे और हिन्दू व्यवस्था के अनुसार चमार जाति से सम्बद्ध रखते थे जिसे उच्च जातीय हिन्दू अछूत और निम्न जाति मानते थे। रैदास बचपन से ही इस कार्य में सिद्धहस्त हो रहे थे, किन्तु कुछ और भी था जो रैदास को खींच रहा था। बनारस में पंडित शारदा नंद की पाठशाला में अध्ययन के लिए रैदास जी जाने लगे, जहाँ काशी के दीठ उच्च जातीय लोगों ने उन्हें अध्ययन से रोका, किन्तु शारदा नंद के प्रयत्न से रैदास जी को अध्यात्म का थोड़ा बहुत ज्ञान हुआ, किन्तु वो ज्ञान सारनाथ के वारिस के लिए पर्याप्त नहीं था। वो एकदम खोखला और निस्सार ज्ञान था, जिसमें मानवीयता के स्थान पर आदर्शात्मक ज्ञान था।रैदास का मन हमेशा उन प्रश्नों में उलझा रहता था जिनका समाधान कभी सारनाथ में तथागत बुद्ध ने किया था। ये प्रश्न साधारण नहीं थे और न ही उनका उत्तर हर किसी के पास था। उनकी इस प्रकार की जिज्ञासाओं को देखते हुए बचपन में ही रैदास का विवाह लोना देवी से कर दिया, जिससे रैदास को विजयदास नामक पुत्र हुआ। शादी और पुत्र प्राप्ति के बाद भी रैदास के प्रश्न अनुत्तरीय थे, उन प्रश्नों की खातिर वे न तो गृहस्थी पर ध्यान दे पा रहे थे और न ही व्यवसाय पर। अंततोगत्वा उनके माता-पिता ने उन्हें पारिवारिक संपत्ति से अलग कर दिया, जिसके बाद रैदास पूरी तरह से परिवार पर ध्यान देने लगे और जल्दी ही जूते के कार्य में सिद्धहस्त हो गए।गृहस्थ होते हुए भी धीरे-धीरे उन्होंने अपने प्रश्नों का समाधान खोजना आरम्भ किया। और उनका निष्कर्ष असमतावादी समाज में समता का उद्घोष, अध्यात्म के क्षेत्र में निर्गुणी परम्परा का स्वीकरण, राजनीति के क्षेत्र में बेगमपुरा अर्थात् धम्मनगर का स्वप्न, आर्थिक क्षेत्र में संसाधनों का समुचित वितरण, मानवीय जीवन के महत्त्व का रेखांकन इत्यादि अनगिनत बिन्दुओं के रूप में, रैदास की लोक कल्याणकारी राज्य-व्यवस्था के निर्माण के रूप में फलित हुआ, जिसे आज भी जनतंत्रीय सरकारों द्वारा पूरा नहीं किया जा सका है।उनकी वैचारिकी अजस्र प्रवाहमान होती हुई अद्यावधि भारतीय समाज को उद्वेलित कर रही है। सारनाथ के वारिस के रूप में रैदास का एक ही लक्ष्य दिखाई देता है, वह है मानवीयता की स्थापना। उनके शब्दों में –ऐसा चाहूं राज मैं, जहाँ मिले सबन कूं अन्न।
ऊँच-नीच सब सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न॥भारतीय इतिहास की श्रमण परम्परा में समता तथा बंधुत्व की विजय पताका को नभोन्नत करने वाले तथा अवलोकितेश्वर के बाद भारत में प्रसिद्ध बोधिसत्त्व रैदास जी की जयन्ती पर उनको नमन। रैदास जयन्ती पर आप सभी को मंगलकामनाएं।- डॉ.विकास सिंह
असिस्टैण्ट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष
संस्कृत विभाग, मारवाड़ी महाविद्यालय
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, बिहार।

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