मासिक धर्म और चुप्‍पी

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स्‍त्री जननी है,पर स्‍त्री कितने परिवर्तन देखती है,शायद स्‍त्री से ज्‍यादा कोई और समझे,पर स्‍त्री सृजना है इसलिए उसे महान बनाकर कई बार साधा गया मौन बडा भयावह होता है। वह स्‍त्री है इसलिए उसे थोडा बहुत तो सहना ही है।जागरूकता की कमी एक लड़की को, कभी-कभी 10 साल की उम्र में, मानसिक आघात की समस्या दे सकती है,अवसाद मे ला सकती है। सामाजिक कलंक और शर्म की भावना के कारण मासिक धर्म से कई बार महिलाओं को भारी समस्या झेलनी पड़ती है। उसे पता भी नही होता कि उसे छुपाना क्‍यो है,दरी पर ही क्‍यो सोना है,वह एकाएक अशुद्ध क्‍यो हो गई । बहुत सारे द्‍वंद जो किसी से पुछना भी मना,और उस पर बात करना,संस्कार हीन होने का तमगा जैसे हासिल करना है या फिर एक कमरे मे अघोषित आपात मे अकेले रहना, साथ मे शरीर मे हो रहे परिवर्तन को सहन करना तो उसके कर्तव्‍यो मे शामिल है। आज भी ग्रामीण भारत में लगभग 80 प्रतिशत लड़कियां माह में तीन से चार दिन स्कूल जाना छोड देती हैं, और यह अक्सर मासिक धर्म की शुरुआत के समय होता है। यह सैनिटरी पैड के उपयोग के बारे में जागरूकता की कमी से होता है। पुराने कपड़े में रिसाव और निशान पड़ने का डर होता है, जिसके कारण लड़कियों को संक्रमण हो सकता है और असुविधा भी,और तो और कई बार स्‍कूल और कामकाजी स्‍थल पर पर्याप्‍त सुविधाए न होने से दो सैनिटरी का एक साथ इस्‍तेमाल करती है,पर फिर शुरू हो जाता है नमी से पैदा हुआ एक दर्दनाक पीडा का एक और चक्र संक्रमण का,जिसका उसे अंदाजा भी नही होता। कई बार कपडा प्रयोग मे लाना भी संक्रमण का कारण होता है। फिर सैनिटरी नैपकिन की अधिक कीमत भी जानकारी को धत्ता बता देती है।
मासिक धर्म के बारे में मिथक और इससे जुड़े कलंक भारत में लड़कियों और महिलाओं के कई मुद्दों में से एक हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में, महिलाओं और लड़कियों को अभी भी मासिक धर्म से संबंधित दर्द या अन्य मुद्दों पर खुलकर चर्चा करने की अनुमति नहीं है।
वे स्कूल, कॉलेज और काम छोड़ देती हैं। उनमें मासिक धर्म स्वच्छता को जल्द से जल्द शामिल किया जाना चाहिए। हाइजीनिक तरीकों की कमी से संक्रमण हो सकता है और यहां तक कि सर्वाइकल कैंसर भी हो सकता है। इसके अलावा, पीरियड्स को सामान्य और किसी भी अन्य शारीरिक प्रक्रिया की तरह सामान्य बनाना अत्यावश्यक है। आज भी लगभग 70 प्रतिशत तक माताएं मासिक धर्म को गंदा और प्रदूषणकारी मानती हैं। वे इस विषय के बारे में अपनी बेटियों से बात नहीं करती हैं और न ही उनकी चिंताओं का समाधान करती हैं।
मासिक धर्म स्वच्छता आदि का विषय सिर्फ घर की महिला सदस्यों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए। परिवार में पुरुषों के बीच भी जागरूकता पैदा करने की जरूरत है। ग्रामीण क्षेत्रों में, इस विषय पर लड़कियों और लड़कों को समान रूप से शिक्षित करने के लिए स्कूलों में सक्षम वातावरण बनाना भी अनिवार्य है। स्‍त्री व्यक्तित्व का विकास होने से पहले हम उसे अघोषित अपराधी के रूप मे प्रवृत न करके अगर सुरक्षित स्वास्थ्य ज्ञान दे तो सही मायने मे सुरक्षित स्‍त्रीत्‍व का विकास कर सकते हैं जो स्‍वयं सृष्‍टि का आधार है। ज्यादातर महिला इस समस्या को ढोने के लिए मजबूर है,पर सामाजिक सजगता से इस समस्या का निराकरण किया जा सकता है।

– डॉ.भावना शर्मा
झुंझुनू,राजस्थान ।

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