भारत के 10 फैसलों से तिलमिलाया हुआ है चीन,

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 नई दिल्ली। लद्दाख से सटी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन से पिछले पांच हफ्तों से भारतीय सेना का तनाव चल रहा है। कई जगह पर दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने हैं, फेसऑफ की स्थिति बनी हुई है। दोनों देशों के सैन्य कमांडर्स के बीच लगातार बातचीत भी चल रही है फिर भी तनाव बरकरार है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि चीन आखिर भारत से क्यों तिलमिलाया हुआ है? वो भारत के खिलाफ मोर्चा क्यों खोल रहा है? यहां इस तकरार की वजह के बारे में सिलसिलेवार तरीके से चर्चा की गई है।
इस तनाव की शुरुआत डोकलाम विवाद से हुई। वर्ष 2017 में चीन ने भूटान से सटे विवादित डोकलाम में एक सड़क बनाने की कोशिश की थी। ये डोकलाम इलाका चीन और भूटान के बीते वर्षों से विवादित था। ये दरअसल, चीन और भूटान के ट्राइजंक्शन पर है जहां भारत के सिक्किम की सीमा भी मिलती है। चीन इस विवादित इलाके से भारत की सीमा तक सड़क बनाना चाहता था। हालांकि, ये भूटान और चीन के बीच का विवाद था लेकिन भारतीय सेना ने यहां चीन की पीएलए सेना को सड़क नहीं बनाने दी। आखिरकार चीन को पीछे हटना पड़ा और सड़क भारत की सीमा तक नहीं बन पाई। भारत ने ये कहकर सड़क का काम रुकवा दिया कि इस सड़क के बनने से भारत की सुरक्षा को खतरा है। खासतौर से सिलीगुड़ी कॉरिडोर को जिसे भारत का चिकन-नेक कहा जाता है। दूसरा इसलिए कि भारत और भूटान के बीच संधि है कि भारत ही भूटान की रक्षा और सुरक्षा करेगा। 73 दिनों तक दोनों देशों की सेनाओं के बीच फेसऑफ चलता रहा और आखिरकार चीन को अपनी सड़क बनाने का काम रोकना पड़ा।
जानकार मानते हैं कि डोकलाम विवाद के दौरान चीन पीछे हट गया लेकिन उसे ये कतई बर्दाश्त नहीं हुआ कि भारत दो देशों के विवाद में कूद पड़ा है। ना केवल कूदा बल्कि चीन जैसे महाशक्ति को पीछे हटने पर मजबूर भी कर दिया। ऐसे में इस बात का अंदेशा उसी वक्त से लगाया जा रहा था कि चीन इसका बदला निकट-भविष्य में ले सकता है। लेकिन वो कोरोना महामारी में ऐसी चाल चलेगा किसी ने नहीं सोचा था।
दूसरा कारण ये भी है कि धारा 370 हटाने और लद्दाख से जम्मू-कश्मीर को अलग करने से भी चीन को मिर्ची लगी। हालांकि, चीन ने तत्काल कोई कारवाई नहीं की थी लेकिन चीन के आधिकारिक मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने उसी समय भारत के इस कदम का भरपूर विरोध किया था। ऐसे में इस बात के कयास लगाए जाने लगे थे कि चीन का अगला कदम क्या होगा?
लेकिन लद्दाख में चीन के बदली चाल का तत्कालीन कारण भारत का सीमावर्ती इलाकों में सड़क, डिफेंस फैसेलिटी और डिफेंस-फोर्टिफिकेशन बना। दरअसल, पिछले कुछ सालों में भारत ने चीन से सटी लाइन ऑफ एक्चुयल कंट्रोल यानि एलएसी पर 73 स्ट्रेटेजिक रोड यानि सामरिक महत्व की सड़कें बनाने का प्रोजेक्ट शुरू किया था। सड़क बनाने का जिम्मा मुख्यतौर से बॉर्डर रोड ऑर्गेनाईजेश यानि बीआरओ को दिया गया था। कुछ सड़कें बनाने का जिम्मा एनएचएआई और राज्य-सरकारों के पास था। अब तक इनमें करीब 60 सड़कें बन कर तैयार हो चुकी हैं।
इन सामरिक सड़कों के बनने से सैनिकों की मूवमेंट काफी तेज हो गई हैं क्योंकि सैनिक अब गाड़ियों से एलएसी तक पहुंच सकते हैं जबकि पहले पैदल वहां तक पहुंचना पड़ता था। यही नहीं विवादित एलएसी वाले इलाके तक में भारतीय सैनिक अब अपनी गाड़ियों से पैट्रोलिंग करते हैं। चीनी सैनिक काफी पहले से विवादित एलएसी पर अपनी गाड़ियों में पैट्रोलिंग करते रहे हैं। हाल ही में करीब एक साल पुराना वीडियो सामने आया जिसमें चीनी सैनिक एलएसी पर आईटीबीपी के एक अधिकारी से पैट्रोलिंग को लेकर भिड़ रहे हैं। दोनों तरफ की गाड़ियां की भी टक्कर लगी थी। इस घटना से साफ है कि दोनों देशों की एग्रेसिव-पैट्रोलिंग विवाद का एक बड़ा कारण है।
हाल ही में जब पैंगोंग-त्सो लेक से सटे विवादित फिंगर एरिया में दोनों देशों के सैनिकों में झड़प और मारपीट हुई उसमें चीन के सैनिक अपनी आर्मर्ड गाड़ियों में दिखाई पड़े थे। हालांकि, जब भारतीय सैनिक भारी पड़े तो चीनी सैनिक अपनी इन आर्मर्ड-पर्सनैल कैरियर्स (गाड़ियों) को छोड़कर भाग खड़े हुए थे और गाड़ियां रिवर्स गियर में दौड़ना लगे थे, लेकिन इससे साफ हो जाता है कि भारतीय सैनिकों द्वारा एसयूवी गाड़ियों में पैट्रोलिंग करता देख चीनी सेना ने अपनी गाड़ियां का स्तर अब बढ़ा दिया है।
लद्दाख में डीएसडीबीओ रोड बनने से चीन बेहद बौखला गया है। बेहद नामुमिकन से लगने वाली इस 255 किलोमीटर लंबी दुरबुक-श्योक-डीबीओ (दौलत बेग ओल्डी) रोड के बनने से सामरिक महत्व का काराकोरम पास भी भारतीय सेना की जिद में आ गया है। इस सड़क के बनने से पूर्वी लद्दाख की सीमाओं की कनेक्टेविटी काफी बढ़ गई है। काराकोरम पास के बेहद करीब ही है शषगम-घाटी जो 1962 के युद्ध के एक साल बाद ही पाकिस्तान ने चीन को सौंप दी थी। इस सड़क के आस-पास भारतीय सेना ने अपने डिफेंस-फैसेलिटी यानि पक्के बंकर और बैरक तक बना लिए हैं। श्योक नदी से मिलने वाली गैलवान नदी पर भी भारतीय सेना ने पुल बनाने की कोशिश की तो दोनों देशों के सैनिकों में यहां झड़प हो गई। जिसके बाद से गैलवान घाटी में चीनी सेना तंबू गाड़कर बैठ गई। जवाबी कारवाई करते हुए भारतीय सेना ने भी अपना कैंप यहां लगा लिया है।
इसके अलावा हाल के सालों में भारतीय सेना ने एलएसी पर डिफेंस-फोर्टिफिकेशन का काम भी काफी तेजी से किया है। इसके लिए दुनिया के सबसे उंचाई वाले इलाकों में टैंकों की ब्रिगेड को तैनात कर दिया है। फिर चाहे वो लद्दाख हो या फिर उत्तरी सिक्किम (जहां 9 मई को नाकूला दर्रे पर दोनों देश के सैनिकों में भिड़त हुई थी)। लद्दाख में दुनिया की दूसरी सबसे उंची सड़क, चांगला-पास (करीब 17 हजार फीट की उंचाई) से टैंकों को पार कराकर पैंगोंग-त्सो लेक के बेहद करीब तैनात कर दिया है। टैंकों को यहां तक पहुंचाने के लिए भारत ने ना केवल सड़कों को जाल बिछाया बल्कि रास्ते में पड़ने वाले नदीं-नालों तक पर ऐसे ब्रिज तैयार किए जो टैंकों के भार को उठा सकते थे।
ये सब बेहद नामुमकिन सा लगने वाला काम था। इसी तरह से उत्तरी सिक्किम में भी भारतीय सेना ने टैंकों को पूरी एक ब्रिगेड तैनात कर दी है और चीन को कानों-कान खबर तक नहीं लगी। चीन को अभी तक भारत के टैंक-ब्रिगेड की लोकेशन भी ठीक-ठीक नहीं पता है। पिछले साल पहली बार दुनिया को बताया था कि नार्थ सिक्किम में भारतीय सेना ने आर्मर्ड ब्रिगेड खड़ी कर ली है। लेकिन उत्तरी सिक्किम में ये टैंक ब्रिगेड कहां हैं इसकी लोकेशन नहीं बताई थी।
टैंकों के अलावा भारत ने बोफोर्स तोपों को भी चीन सीमा पर तैनात कर दिया है। ये तोपें लद्दाख से लेकर सिक्किम और अरूणाचल प्रदेश तक में तैनात हैं। पिछले कुछ सालों में भारत ने अमेरिका से अल्ट्रा-लाइट होव्तिजर, एम-777 तोपें जो ली हैं वे खास तौर से चीन सीमा पर तैनात करने के लिए ही ली गई थी और उन्हें तैनात भी 3488 किलोमीटर लंबी एलएसी पर कर दिया गया है।
यही नहीं भारतीय सेना अब अपनी मैकेनाइजड फोर्सेज़ पर बेहद तेजी से काम कर रही है। यानि वो रेजीमेंट जो इंफेंट्री यानि पैदल-सैनिक और आर्मर्ड के बीच की कड़ी है। ऐसा इसलिए क्योंकि दुनियाभर की सेनाएं अब लगातार इंफेंट्री यूनिट्स को खत्म करती जा रही हैं। चीन ने अपनी सेना में पैदल सैनिकों की रेजीमेंट को लगभर खत्म कर दिया है। मैकेनाइजड-इंफेंट्री रेजीमेंट में सैनिक बख्तरबंद गाड़ियों में राइफल, एलएमजी, मोर्टार और एंटी-टैंक मिसाइलों से लैस होते हैं। इन बख्तरबंद गाड़ियों को आईसीवी यानि इंफेंट्री कॉम्बेट व्हीकल या फिर बीएमपी कहते हैं। ये गाड़ियां किसी भी सेना के लिए कितनी महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चीन विवाद के बीच ही रक्षा मंत्रालय ने थलसेना के लिए 156 बीएमपी गाड़ियों को ऑर्डर आनन-फानन में दिया है।
डोकलाम विवाद के बाद भारतीय सेना ने अपनी युद्ध-कला की रणनीति पर काम करते हुए किसी छोटे युद्ध के लिए फाइटिंग-फोर्सेज़ को तुरंत अलर्ट किया जा सके इसके लिए भारतीय सेना ने इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप यानि आईबीजी तैयार किए हैं। इन आईबीजी में इंफेंट्री सैनिक, आईसीवी, टैंक, तोप, हेलीकॉप्टर सब एक ही यूनिट में होते हैं। ऐसे में युद्ध के समय में कॉम्बेट-आर्म्स को अलग-अलग तरीके से तैयार करने का झंझट नहीं रहता है। इंटीग्रेटेड होने के कारण अलग-अलग यूनिट्स में बेहतर समन्वय भी होता है। किसी भी शॉर्ट एंड स्विफ्टि वॉर के लिए एकदम सटीक हैं।
चीन के खिलाफ एक लंबे युद्ध के लिए भारतीय सेना पिछले कुछ सालों से पश्चिम बंगाल के पानागढ़ में माउंटेन स्ट्राइक कोर खड़ी कर रही है। भारतीय सेना की इस 17वीं कोर को ब्रह्मास्त्र के नाम से जाना जाता है। युद्ध की स्थिति में इस कोर का मुख्य उद्देश्य दुश्मन की धरती पर जाकर हमला करना है। जैसाकि नाम से विदित है कि ये पहाड़ों में लड़ने के लिए तैयार की जा रही है। चीन के खिलाफ भारत की इस लामबंदी से ड्रैगन के होश उड़ गए हैं। वो समझ नहीं पा रहा है कि जिस देश को उसने ’62 की जंग में हराया था वो आज उसे खुली चुनौती दे रहा है।
सितबंर 2019 में पूर्वा लद्दाख में भारतीय सेना ने चांगथांग प्रहार एक्सरसाइज कर दुनिया को बता दिया कि चीन सीमा पर अब सिर्फ इंफेंट्री यूनिट्स ही नहीं बल्कि टैंक, तोप, यूएवी और बिहाइंड द एनेमी लाइंस की युद्धकला में माहिर, स्पेशल फोर्सेज़ के कमांडो भी तैनात हैं। इस एक्सरसाइज से चीन में खलबली मचनी लाजमी थी।
भारत का दुनिया में बढ़ता दबदबा और अमेरिका और आस्ट्रेलिया जैसे देशों से बढ़ती नजदिकियां चीन को कतई ना भा रही हैं। चीन को ऐसा लगता है कि भारत अमेरिका के साथ मिलकर चीन को घेरना चाहता है। यही वजह है कि चीन एक तरफ पाकिस्तान को भारत के खिलाफ उकसा रहा है और दूसरी तरफ से खुद भारत को घेरने की तैयारी कर रहा है।

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