फिर याद आये कांशीराम…..

“साहब, बहुत ही साधारण सी कमीज़-पेंट पहनते थे। उनके हाथ में हमेशा एक पेन होती थी, जिससे वे 85-15 के बारें में बात किया करते थे। वो हमेशा डीएम-पीएम की बात किया करते थे। वो ज्ञान के रास्ते में बुद्ध के भारत की बात किया करते थे। वो सरकार के निर्णयों को जनता की अदालत में चैलेंज करते थे। वो हमें हुक्मरान बनने के लिए स्वप्न देखने औऱ साकार करने के लिए प्रेरित करते थे।” (मेरी अम्मा तत्वलीना गुलकन्दी बौध्द का हिंदी अनूदित वाक्य जो अभी तक मेरी स्मृतियों में अंकित है।)

देश-विदेशों में 15 मार्च को मान्‍यवर साहब कांशीराम जी के जन्मदिन को बहुजन समाज दिवस के रूप में मनाए जाने के मंगल सन्देश आ रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर और प्रसिद्ध मिशनरी बहुजन चिंतक आदरणीय डॉ. राज कुमार सर साहब कांशीराम जी के जन्मदिन पर विभिन्न सम्मेलन, परिचर्चा, प्रदर्शनी, आदि के आयोजन की बात रखते हुए कहते हैं, “साहब कांशीराम से सम्बंधित कार्यक्रम बड़े हों या छोटे, लेकिन किए जाने चाहिए। इतिहास बनाने के लिए इतिहास को जानना जरूरी है। मान्‍यवर साहब के जीवन एवं आन्दोलन का इतिहास, एक चलता फिरता विश्वविद्यालय है, एक एनसाईक्लोपीडिया है जिसकी शाखाएं देश की हर गली, मोहल्ले, गांव, कस्बे और शहर में खुलना बेहद जरूरी है अगर भारत में सामाजिक लोकतन्त्र की स्थापना करनी है।”

साहब कांशीराम के द्वारा दिखाए गए स्वाभिमान और आत्मसम्मान के पथ से हम बहुजन शक्ति और प्रेरणा प्राप्त करते हैं। अम्बेडकरी आंदोलन को जिस खून-पसीने से आपने सींचा है, हम उसे आगे बढाने का प्रयास करेंगे। भारत में व्याप्त विविधता को बहुजन के रूप में एकत्रित करने के आपके आह्वान को हम यथार्थ रूप में बदल बुद्ध के बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय से जोड़कर अपनी सांस्कृतिक विरासत को पुनः स्थापित करने का प्रयत्न करेंगे।

आपके संघर्ष को मैंने अपनी आँखों से कम किन्तु अपनी अम्मा की आंखों से ज्यादा देखा है। हमारे बचपन की कहानियों में टीवी की कहानियों की तरह राजकुमार-राजकुमारी या परी-फ़रिश्ते नहीं होते थे, उनमें ज्यादातर बुद्ध, क़बीर, रैदास, बाबासाहब और आपका जिक्र होता था। आगरा में आपकी कई रैलियों की गवाह हमारी अम्मा बनीं थीं। वो बताती थी कि साहब कांशीराम में मुझे बुद्ध और बाबासाहब एक साथ दिखाई देते हैं।

जब-जब अम्मा ने हमें पंजाब के रोपड़ में आपके जन्म की कहानी सुनाई थी, महाराष्ट्र के आपके एक साथी दीनाभाना का वृत्तांत बताया था, आपकी साइकिल यात्राओं का जो चित्रण किया था अथवा आपके द्वारा दिए गए भाषणों के अंश को सुनाया था तो बाल मन पर अंकित वो किस्से व इतिहास अभी भी मस्तिष्क के कोनों में विद्यमान हैं।

सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के लिए 1964 में आपने नौकरी छोड़ने के साथ ही आजीवन अविवाहित रहने का दृढ़ निश्चय किया और एक बोधिसत्त्व की तरह बोधिचित्तोत्पाद किया कि बाबासाहब के द्वारा देखे गए बहुजन भारत के स्वप्न की पूर्ति तक मैं चैन से नहीं बैठूंगा।” इसके लिए आपने बामसेफ और डीएस-4 का गठन किया जिसके माध्यम से सामाजिक एकता स्थापित करने की पहल की तथा 14 अप्रेल, 1984 को राजनीतिक रूप से बहुजन समाज को सुदृढ़ करने के लिए “बहुजन समाज पार्टी” का गठन किया।

स्वाभिमान और आत्मसम्मान बोध के साथ- साथ बहुजनों को उनके इतिहास से संयुक्त करने के लिए साहब कांशीराम जी सन् 2002 में अपने लाखों-करोड़ों अनुयायियों के साथ 14 अक्टूबर, 2006 को बाबासाहब की धम्मदीक्षा अथवा धम्मचक्क-अनुप्रवर्तन दिवस के 50 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में बौद्ध धर्म स्वीकार करना चाहते थे, किन्तु धर्मान्तरण करने से पूर्व ही 9 अक्टूबर, 2006 को उनका परिनिर्वाण हो गया, जिससे धम्मकारवाँ थोड़ी देर के लिए रुक सा गया। आज इस धम्मकारवाँ को भिक्खु चंदिमा, भिक्खु देवेंद्र, भिक्खु करुणाशील, भिक्खु सुमेध, भिक्खु रतन आदि अनेक विद्वान भिक्खु लोग बढ़ा रहे हैं।

भारतीय लोकतन्त्र को बहुजन एकता के सूत्र में बांधने वाले, शोषित समाज की निष्क्रिय-राजनीतिक चेतना को उद्भूत करने वाले, संसद तक का मार्ग प्रशस्त करने वाले, समस्त बहुजन समाज में अपना परिवार देखने वाले, व्यक्तिगत स्वार्थ से दूर बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय को साकार करने वाले, बाबासाहब के प्रबुद्ध भारत के स्वप्न को आगे बढाने वाले और शोषित समाज को हुक्मरान समाज में बदलने वाले मान्यवर साहब कांशीराम जी के जन्मदिन पर आप सभी को मंगलकामनाएँ।

– डॉ. विकास सिंह

Author: Team Newsques India

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