प्रेम न बाडी उपजै

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पतझड़ मेंं भी गुलज़ार मेंं रंग भर जाता हैं
जब रूहानी , रूमानी इश्क़ ए मर्ज़ हो जाता हैं
इश्क़ , मोहब्बत , प्रेम , प्यार जो नाम दें लो , जितने नाम दें कम हैं । जीवन मेंं स्थायी बसंत ,पुष्प सी मनमोहक सुगंध , इश्क़ की रूमानी हवा की हृदय पटल पर फैलती खूशबू आपको प्रेम दीवानी , इश्क़ मेंं काफ़िर , जंग ए ऐलान सीखा देती हैं । किसी की नैना मेंं कैद होना , किसी के चक्षुओं मेंं कैद हो जाना । अंतस मेंं उपज जहां से वैरागी बना देता हैं । करीबियाँ फासले मिटा देती हैं । विभावरी करवटों मेंं कटती , प्रभात मेंं सिलवटों मेंं इश्क़ आबाद दिखाता हैं सुर्ख आँखों मेंं जगरातें रूमानी इश्क़ के हृदय , मस्तिष्क सब प्रेमी के हवाले । मन का मिर्जा हो जाना तन साहिबा हो जाना । जिस पर चढ़ गया इश्क़ रंग कोई ओर नहीं चढ़ पाये । जो डूबे इसमें वो पार हो जाये । ऐसा भाव जिसमें उच्छ्वास हैं आस -विश्वास हैं , जुड़ी श्वास, नित नया आकर्षक , सौंदर्यरूप प्रेमी का सब लोकलाज छोड़ उसी का आँखों को भाना , टकटकी लगा देखना , प्रेमाभिव्यंजना हैं । अनुरक्त प्रेमी का भाव विह्ल्व हो जाना , दर्शन होने पर भी ,दर्शन की हर वक्त आस रह जाना । संयोग मेंं इतराना , लज्जाना ,देखना , छिप जाना भावों की , आंगिक क्रियाओं से समझना प्रेम की अवस्थाएँ हैं । वियोग मेंं आतुरता , अनुरक्त होने पर सुध -बुध खोना , एक बार दर्शन होना , मन का संसार से वैरागी होना प्रेम की पराकाष्ठा हैं । वियोग मेंं प्रेम का टप स्वर्ण बन जाना प्रेम का उदात्त रुप हैं ।
– डॉ .राजकुमारी

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