प्रकृति और बौद्ध धम्म

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!!! चलो बुद्ध की ओर !!!
!!! नमो बुद्धाय जय अशोक जय भीम !!!
!!! नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स !!!

सारे संसार मे सम्पूर्ण मानवजाति के कल्याण के लिए सधम्म की देशना देकर ज्ञान रुपी प्रकाश से सारी दुनिया को आलोकित करने वाले शाक्य सिंह अर्हत् तथागत बुद्ध की त्रिविध पावनी बुद्ध जयन्ती के पावन अवसर पर हम सम्पूर्ण संसार के सभी प्राणियो के सफल, सुखद एवं मंगलकारी जीवन की कामना करता हुआ सभी को हार्दिक बधाईया देता हूँ।
संसार मे सभी प्राणियो के कल्याण के लिए सधम्म की देशना देने वाले लोक गुरु तथागत बुद्ध का प्रकृति से बडा गहरा सम्बद्ध रहा है, जब हम उनके जीवन का अवलोकन करते है, तो पाते है कि जब तथागत बुद्ध का जन्म राजकुमार सिद्धार्थ के रुप में लुम्बिनी कानन मे वैशाख पूर्णिमा को हुआ तो खुले मे प्रकृति के बीच जंगल मे हुआ राजा के बेटे होने बावजूद जन्म जंगल मे हुआ, जब गृह त्याग करते है और अनोमा नदी को पार कर मुनि भारद्वाज के आश्रम मे पहली बार संन्यास धारण किया प्रकृति के बीच, जब आगे मगध जाते हैं सत्य की खोज में तो पंच वर्गीय परिव्राजको के साथ तपते है प्रकृति के बीच। जब सिद्धार्थ गौतम को सम्यक सम्बोधि की प्राप्ति होती है बोधगया मे, तो वो भी खुले आसमान के नीचे वैशाख पूर्णिमा के दिन प्रकृति के बीच, और सम्यक सम्बोधि की प्राप्ति के बाद प्रथम धम्म उपदेश अपने पंच वर्गीय परिव्राजक साथियो को दिया आषाढी पूर्णिमा के दिन सारनाथ की पावन धरती के “मृगदाव” में खुले आसमान के नीचे प्रकृति के बीच, और अन्त मे अपने अन्तिम उपदेश देते हुए शरीर को कुशीनगर की पावन धरती पर छोडते हैं ,वैशाख पूर्णिमा के दिन खुले आसमान के बीच प्रकृति के बीच। इस तरह से सिद्धार्थ गौतम के रुप जन्म से लेकर, गृहत्याग, सम्बोधि प्राप्ति, प्रथम धम्मोपदेश, अन्तिम धम्मोपदेश भी प्रकृति में होता है, तथागत ने शुरु से लेकर अन्तिम तक प्रकृति का बहुत ही सूक्षमता से अवलोकन किया, और लोगो के कल्याण हेतु विपश्यना के माध्यम से बुद्धत्व प्राप्ति के बाद से
प्रकृति के निकट रह कर ही लोगो को ज्ञान और सधम्म कि देशना दी, क्यूंकि बिना प्रकृति के हम जी नही सकते इसलिए शुद्ध प्रकृति का होना बहुत आवश्यक है। जब हम उस समय के बुद्ध विहारों का अध्ययन या अवलोकन करते हैं तो पाते हैं कि उस समय विहारों का निर्माण प्राकृतिक वातावरण में किया जाता था और विहारों में पांच प्रकार के पेड़ अवश्य लगाये जाते थे – जैसे पीपल, बरगद, नीम, अशोक, बांस जोकि औषधीय गुणों से भी युक्त पौध होते थे, जिनके अनुसार आज भी न केवल भारत वर्ष के बौद्ध विहारों का निर्माण किया जाता है, बल्कि सभी बौद्ध देशों के बौद्ध विहारों में होता है। इसलिए बिना प्रकृति के सहायता मानव जीवन की कल्पना भी नही कि जा सकती है। आज पूरे विश्व मे प्रदूषण का खतरा बना हुआ है क्योकि आज के समय मे स्वार्थी मानव समाज ने अपने स्वार्थ वश प्रकृति को दूषित कर दिया है ,जिसका परिणाम तमाम प्रकार प्राकृतिक आपदाओं के रुप में सामने आते रहते हैं। इसी दूषित प्रकृति का परिणाम है कि आज चीन से शुरू हुआ कोरोना नामक वायरस जिसे कोविड -19 के नाम से जाना जाता है, ने आज सारी दुनियाँ को अपनी चपेट में ले लिया है, उसमे भारतवर्ष भी अछूता नही है, इतने समय में लाखों लोग कोरोना वायरस के चपेट में आकर अपनी जाने गंवा चुके है, और डाक्टर लोग निर्देश दे रहे हैं कि आपस मे शारीरिक स्पर्श मत कीजिए, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाईए और घर मे रहने की सलाह दे रहे है, इस बीच विश्व के सभी देशो मे लॉकडाउन शुरु हुआ, जो अभी निरन्तर जारी, लॉकडाउन का यह फायदा हुआ कि जितना प्रदूषण था लगभग सभी देशो में शून्य के लेवल पर आ गया, यह प्रकृति का बहुत बडा संदेश है कि सम्पूर्ण संसार के मानव समाज को जीना है तो प्रकृति को शुद्ध बनाये रखना होगा, ऐसे वातावरण में तथागत भगवान बुद्ध का उपदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है जो निर्देश डाक्टर लोग आज इस महामारी से बचने लिए दे रहे है ,वो निर्देश तथागत बुद्ध ने आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व भिक्खुओं के लिए और गृहस्थों के लिए दिया था कि आपस मे एक दूसरे को स्पर्श नही करना, पानी को छननी से छान कर पीना, शरीर को निरोग रखना, ध्यान करना इत्यादि।
तथागत का सधम्म आज भी उतना ही कल्याणकारी है जितना पहले था और भविष्य में भी रहेगा।
इसलिए हे मानव समाज के लोगो प्रकृति और संसार के सभी प्राणी एक दूसरे के पूरक हैं। इसलिए एक-दूसरे के साथ रहकर पुनः प्रकृति को संवारने का काम कीजिये। सुख पूर्वक जीवन जिये।
एक बार फिर मैं त्रिविध पावनी बुद्ध जयन्ती की समस्त संसार के लोगो को मंगलकामनाएं और शुभकामनाएं प्रेषित करता हूँ, सबके सफल, सुखद, एवं मंगल कारी जीवन की कामना करता हूँ।
सबका मंगल हो।
साधु साधु साधु

– भन्ते निब्बान
शोधार्थी (दिल्ली विश्वविद्यालय)
नई दिल्ली-110041
सम्पर्क सूत्र- 8377060314

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