पुरुषों पर ही नहीं, बल्कि अब महिलाओं के ऊपर भी दर्ज होगा घरेलू हिंसा का मामला

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नई दिल्ली। हम हमेशा से यह इस बात को सुनते आये हैं कि कोई औरत कहती है कि अरे अपनी पड़ोस वाली है न उसका पति और ससुराल वाले अकसर उसे मारते-पीटते हैं। लेकिन क्या यही वाक्य किसी पुरुष के लिए आपने सुना है। नहीं न? क्यों,क्या घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं ही हो सकती हैं पुरुष नहीं? पुरुष को शुरू से समाज में मजबूत माना जाता रहा है। लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं है न कि घर की चारदीवारी के भीतर उसे सताया न जाता हो।
अब इत्तेफ़ाक देखिये आज तक आपने कई ऐसे केस देखे होंगे। जिनमें एक महिला खुद को दुखियारी साबित करते हुए थाना,कचहरी,कोर्ट के सामने बड़ी आसानी से अपने पति, ससुर और सास को जेल भिजवा देती है। पर अगर ऐसा ही एक पुरुष करना चाहे तो? सबसे पहले तो उसका समाज ही उसका मज़ाक उड़ाएगा। लोग कहेंगे कि घर में औरत से पिट गया तू थू है तेरी मर्दानगी पर घर में हो रही अगर इस हिंसा का विरोध करने लगे तो,फिर वही महिलाओं का दुखियारी वाला ताम-झाम लेकिन अब ऐसे लोगों को समाज में बोलने का मौका दिया गया है। आख़िरकार देश के न्यायालयों को इस बात का आभास हो ही गया है। कि पीड़ित सिर्फ़ पत्नी ही नहीं बल्कि पति भी हो सकते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने घरेलू हिंसा कानून में फेरबदल कर दिया है। पहले इस कानून में धारा 2(q) में पुरुष का ज़िक्र था। जिसे कोर्ट ने हटाकर व्यक्ति कर दिया है। जस्टिस कुरियन जोसफ और नरीमन ने ये ऐतिहासिक फैसला लिया। इससे पहले घरेलु हिंसा कानून 2005 में ऐसा ज़िक्र था। कि घरेलू हिंसा विरोधी कानून के तहत पत्नी या फिर बिना विवाह किसी पुरुष के साथ रह रही महिला मारपीट,यौन शोषण, आर्थिक शोषण या फिर अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल की परिस्थिति में कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन इसमें बदलाव करते हुए ये कहा गया है कि अगर पुरुषों के साथ भी ऐसा कुछ होता है। तो महिलाओं पर कार्रवाही की जा सकती है।
आये दिन न जाने कितने पुरुष,पति,अपने ऊपर होने वाले शारीरिक,मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना सहते हुए या तो जीने को मजबूर हैं। या फिर खुद को मौत को गले लगा लेते हैं।ऐसे में ये कानून उनको भी आवाज उठाने का मौका देगा। ये बदलाव बहुत ज़रूरी था। क्योंकि समाज में हर स्थिति में पीड़ित सिर्फ़ महिलाएं ही नहीं होतीं बल्कि पुरुष भी होते हैं।

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