पार्टी नहीं, परिवार के प्रति निष्ठा

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-अरविन्द जांगिड़ ठिकरिया

देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी कांग्रेस में अध्यक्ष पद को लेकर चल रही बहस ने एक बार फिर इस बात को साबित कर दिया है कि इस पार्टी में किसी कार्यकर्ता का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, बल्कि उन्हें यदि पार्टी में रहना है तो परिवार विशेष के इशारे पर ही चलना होगा।

पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं द्वारा पार्टी के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को 17 दिन पूर्व लिखी गयी चिट्ठी के बाद सोमवार को इस मुद्दे पर वार्ता के लिए कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलायी गयी थी।

इस बैठक से पूर्व पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपना अंतरिम अध्यक्ष का एक वर्ष का कार्यकाल पूरा होने पर पद से त्यागपत्र देने की इच्छा जतायी थी। इसके बावजूद कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा गांधी परिवार की पैरवी में खड़ा हो गया और सोनिया गांधी को ही अंतरिम अध्यक्ष बने रहने के लिए दबाव बनाने लगा। इससे पूर्व पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने चिट्ठी लिखने के वक्त पर सवाल उठाते हुए कहा कि, ‘अंतरिम अध्यक्ष की बीमारी के वक्त ही ऐसी चिट्ठी लिखने का क्या अर्थ है। उन्होंने चिट्ठी लिखे जाने वालों पर भाजपा से मिलीभगत का भी आरोप लगाया।

कुल मिलाकर पार्टी की कार्यसमिति की बैठक का नजारा ऐसा दिखायी दे रहा था कि सोनिया गांधी को पार्टी नेतृत्व पर सवाल पर उठाने वाली चिट्ठी लिखने वाले पार्टी के दिग्गज नेताओं ने मानों भारी भूल कर दी हो। पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनका परिवार इस बैठक में पार्टी के लिए शहादत देने की मुद्रा में नजर आ रहा था और उनको चिट्ठी लिखने वाले लोग कठघरे में खड़े थे। नतीजतन, पार्टी अध्यक्ष के लिए नया चेहरा ढूंढना या इस मुद्दे पर बात करना तो दूर, सात घंटे तक चली यह बैठक अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को वरिष्ठ नेताओं द्वारा लिखी गयी चिट्ठी पर ही केंद्रित रही।

इसका परिणाम यह हुआ कि सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाने वाले दिग्गज नेताओं ने भी बजाय इसके कि वे एकजुट होकर तथा पार्टी के नयी पीढ़ी के नेताओं को साथ लेकर इसका विरोध करते, अपने बागी कदम पीछे खींच लिये। इसके साथ ही पार्टी (दूसरे शब्दों में अपने परिवार) के लिए कुर्बान हो जाने की विजयी मुद्रा में सोनिया गांधी ने एक बार फिर पार्टी पर अहसान करते हुए अंतरिम अध्यक्ष पद पर बने रहने की मंजूरी दे दी।

17 दिन की बगावत तथा सात घंटे तक चली पार्टी कार्यसमिति की बैठक के बाद यह स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस पार्टी में यदि रहना है तो गांधी परिवार से बनाकर रखने या उसके इशारे पर चलने में ही भला है। रही नेतृत्व की बात, तो यह बात भी जग जाहिर है कि सोनिया के बाद यदि गैर गांधी परिवार का कोई व्यक्ति पार्टी की बागडोर संभालता है तो भी उसे गांधी परिवार के इशारों पर चलना होगा। उसका अपना स्वतंत्र कोई अस्तित्व नहीं होगा। पार्टी में गांधी परिवार की मर्जी से इतर कोई निर्णय भी नहीं लिये जा सकेंगे, भले ही पार्टी का बेड़ा गर्क हो जाये।

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की इस हालत ने विश्व के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में कमजोर विपक्ष की भूमिका पर भी सवाल खड़ा कर दिया है। मजबूत लोकतंत्र वही होता है, जहां सत्ता पक्ष के साथ—साथ विपक्ष भी मजबूत हो। इसके विपरीत आज देश में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की कमजेार स्थिति से इस देश के लोकतंत्र पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

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