निजता का हनन

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निजता के हनन को प्राय: छेडछाड समझा जाता है,मानसिक पीडा से कोई सरोकार नही माना जाता , किन्तु निजता के मामले में उच्चतम न्यायालय की नौ जजों की संविधान पीठ का निर्णय आज़ाद भारत में एक ऐसी ऐतिहासिक घटना है, जो आने वाले समय मे गरीमामय जिंदगी को सुनिश्‍चित करती है । न्यायालय के अनुसार निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, जिसे अनुच्छेद 21 के अंतर्गत सरंक्षण प्राप्त है। एक समय था जब निजता के प्रसंग को एक अभिजित अवधारणा, यानी सम्पन्न घरों की बात मानी जाती थी और निजता का विचार बहुसंख्यक समाज की ज़रूरतों से मेल नहीं खाती थी। यह माना जाता था कि ‘ज़रूरतमंद लोगों को बस आर्थिक तरक्की चाहिये, नागरिक एवं राजनैतिक अधिकार नही। आज निजता वह अधिकार है जो किसी व्यक्ति की स्वायतता और गरिमा की रक्षा के लिये ज़रूरी है। वास्तव में यह कई अन्य महत्त्वपूर्ण अधिकारों की आधारशिला है। निजता का अधिकार हमारे लिये वो आवरण है, जो हमारे जीवन में होने वाले अनावश्यक और अनुचित हस्तक्षेप से बचाता है,अवगत कराता है कि हमारी सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक स्‍तर क्या है और हम अपनी कितनी निजता रखना चाहते है । निजता ही है जो निर्णित करने का अधिकार देती है कि कोई किस सीमा तक हमे जाने। जब फ्रांसीसी क्रांति के बाद निरंकुश राजतंत्र की विदाई शुरू हुई और समानता, मानवता और आधुनिकता के सिद्धांतों के साथ लोकतंत्र ने पैर पसारना शुरू कर दिया। कल्याणकारी राज्‍य की अवधारणा आई तब यह प्रश्न प्रासंगिक हो उठा कि जिस गरिमा के भाव के साथ जीने का आनंद लोकतंत्र के माध्यम से मिला उसे निजता के हनन द्वारा छिना क्यों जा रहा है? आज 21वीं शताब्दी में तो तकनीकी विकास अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच चुका है। पर तकनीक ने निजता के प्रसंग मे दरार डाल दी , ऐसे में निजता को राज्य की नीतियों और तकनीकी उन्नयन की दोहरी मार झेलनी पड़ी । कही कही प्रशासनिक पारदर्शिता के नाम पर महिलाओं विशेष पर की गई निगरानी का दुरूपयोग भी शामिल है। आज स्मार्टफोंस का जमाना है,मनचाहा रिकार्ड नही ही नही,मनचाहा परिवर्तन रिकार्डिंग मे कर लिया जाता है,जो कई बार ब्‍लेकमैलिंग का सबब भी बनता है। फिर एप डाउनलोड करते हैं, तो यह हमारे फ़ोन के कॉन्टेक्ट, गैलरी और स्टोरेज़ आदि के प्रयोग की इज़ाज़त मांगता है और इसके बाद ही वह एप डाउनलोड किया जा सकता है। अब कोई गैर-अधिकृत रूप से एप के डाटाबेस में सेंध लगा दी तो उपयोगकर्ताओं की निजता खतरे मे आ जाती है। तकनीक का निजता में दखलंदाजी, राज्य की दखलंदाज़ी से कम गंभीर है। हम ऐसा इसलिये कह रहे हैं क्योंकि तकनीक का उपयोग करना हमारी इच्छा पर निर्भर है, किन्तु राज्य प्रायः निजता के उल्लंघन में लोगों की इच्छा की परवाह नहीं करता। आधार कार्ड का मामला जीता जागता उदाहरण है। जब पहली बार आधार कार्ड आया तो कहा यह गया कि यह सभी भारतीयों को एक विशेष पहचान संख्या देने के उद्देश्य से लाई गई है। जल्द ही मनरेगा सहित कई बड़ी योजनाओं में बेनिफिट ट्रान्सफर के लिये आधार अनिवार्य कर दिया गया।
यहाँ तक कि आधार पर किसी भी प्रकार के विचार-विमर्श से किनारा करते हुए इसे मनी बिल यानी धन विधेयक के तौर पर संसद में पारित कर दिया गया। इन सभी बातों से पता चलता है कि निजता जो कि लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने के लिये आवश्यक है, गंभीर खतरे में है।
सन्1954 में एम. पी. शर्मा मामले में 8 जजों की और वर्ष 1962 में खड़क सिंह मामले में 6 जजों की खंडपीठ ने निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना था। अतः इसी वर्ष जब इस संबंध में उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई आरंभ की तो न्यायालय के नौ जजों की खंडपीठ बैठाई गई।
दरअसल, सबसे पहले वर्ष 2013 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय में आधार की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए एक जनहित याचिका दायर की गई थी। न्यायमूर्ति चेलामेश्वर की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने 11 अगस्त 2015 को निर्णय दिया कि आधार का इस्तेमाल केवल सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और एलपीजी कनेक्शनों के लिये ही जाए।
कुछ ही दिनों के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एच.एल दत्तु की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मनरेगा सहित कई अन्य योजनाओं में आधार के इस्तेमाल की इज़ाज़त दे दी। तत्पश्चात शीर्ष न्यायालय में एक और याचिका दायर की गई कि क्या आधार मामले में निजता के आधार का उल्लंघन हुआ है और क्या निजता एक मौलिक अधिकार है?
संविधान का भाग 3 जो कुछ अधिकारों को ‘मौलिक’ मानता है में निजता के अधिकार का जिक्र नहीं किया गया है। इन सभी बातों का संज्ञान लेते हुए जुलाई 2017 में नौ जजों की संविधान पीठ ने मामले की सुनवाई आरम्भ कर दी और निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार करना शुरू कर दिया।
1. निजता के अधिकार का दायरा क्या है?
2. निजता का अधिकार सामान्य कानून द्वारा सरंक्षित अधिकार है या एक मौलिक अधिकार है?
3. निजता की श्रेणी कैसे तय होगी?
4. निजता पर क्या प्रतिबंध हैं?
5. निजता का अधिकार, समानता का अधिकार है या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का?

इन सभी प्रश्‍नो के संदर्भ मे शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जीने का अधिकार, निजता के अधिकार और स्वतंत्रता के अधिकार को अलग-अलग करके नहीं बल्कि एक समग्र रूप देखा जाना चाहिये।
न्यायालय के शब्दों में “निजता मनुष्य के गरिमापूर्ण अस्तित्व का अभिन्न अंग हैं और यह सही है कि संविधान में इसका जिक्र नहीं है, लेकिन निजता का अधिकार वह अधिकार है, जिसे संविधान में गढ़ा नहीं गया बल्कि मान्यता दी है।
निजता के अधिकार को संविधान संरक्षण देता है क्योंकि यह जीवन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का ही एक रूप है। आशा की जा सकती है कि निजता का अधिकार, स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीने के अन्य मौलिक अधिकारों के सहचर्य में लोकतंत्र को मज़बूत बनाएगा।
निजता की श्रेणी तय करते हुए न्यायालय ने कहा कि निजता के अधिकार में व्यक्तिगत रुझान और पसंद को सम्मान देना, पारिवारिक जीवन की पवित्रता, शादी करने का फैसला, बच्चे पैदा करने का निर्णय, जैसी बातें शामिल हैं।
किसी का अकेले रहने का अधिकार भी उसकी निजता के तहत आएगा। निजता का अधिकार किसी व्यक्ति की निजी स्वायत्तता की सुरक्षा करती है और जीवन के सभी अहम पहलूओं को अपने तरीके से तय करने की आज़ादी देती है।
न्यायालय ने यह भी कहा है कि अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर हो तो ये इसका अर्थ यह नहीं कि वह निजता का दावा नहीं कर सकता
अन्य मूल अधिकारों की तरह ही निजता के अधिकार में भी युक्तियुक्त निर्बन्धन की व्यवस्था लागू रहेगी, लेकिन निजता का उल्लंघन करने वाले किसी भी कानून को उचित और तर्कसंगत होना चाहिये। “*न्यायालय ने यह भी कहा है कि निजता को केवल सरकार से ही खतरा नहीं है बल्कि गैरसरकारी तत्त्वों द्वारा भी इसका हनन किया जा सकता है। अतः सरकार डेटा सरंक्षण का पर्याप्त प्रयास करे।
न्यायालय ने सूक्ष्म अवलोकन करते हुए कहा है कि ‘किसी व्यक्ति के बारे में जानकारी जुटाना उस पर काबू पाने की प्रक्रिया का पहल कदम है’। इस तरह की जानकारियों का प्रयोग असहमति का गला घोंटने में किया जा सकता है। अतः ऐसी सूचनाएँ कहाँ रखी जाएंगी, उनकी शर्तें क्या होंगी, किसी प्रकार की चूक होने पर जवाबदेही किसकी होगी? इन पहलुओं पर गौर करते हुए कानून बनाया जाना चाहिये।*”
कश्‍मीर से कन्‍याकुमारी तक विविधता रखने वाले देश मे संविधान और संविधान प्रदत्त मूल अधिकार ही हैं, जो विविधताओं से भरे भारत में एकता का सूत्रपात करते हैं।
नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च कानून के द्वारा की जाती है, जबकि सामान्य अधिकारों की रक्षा सामान्य कानून के द्वारा की जाती है।
दरअसल, संविधान के भाग 3 में मौलिक अधिकार के प्रावधान हैं, जिन्हें भारतीय संविधान के शिल्पी डॉ. अंबेडकर ने संविधान की आत्मा कहा है।
ध्यातव्य है कि अनुच्छेद 21 में जीवन तथा स्वतन्त्रता का अधिकार है और न्यायपालिका ने पहले भी कई निर्णयों के माध्यम से इसके दायरे का विस्तार करते हुए इसमें भी शिक्षा, स्वास्थ्य, त्वरित न्याय, बेहतर पर्यावरण आदि को जोड़ा है। ज़ाहिर है निजता का अधिकार इस विस्तारीकरण का अगला पड़ाव है।
संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत उच्चतम न्यायालय का निर्णय देश का कानून माना जाता है। जब निजता भी मौलिक अधिकार का हिस्सा बन गई है तो फिर कोई भी व्यक्ति अपनी निजता के हनन की स्थिति में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायायलय में सीधे याचिका दायर कर न्याय की मांग कर सकता है।
हालांकि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में शासन के दो महत्त्वपूर्ण स्तंभों- न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव कोई नई बात नहीं है। इतिहास पर नज़र डालें तो केशवानंद भारती मामले से लेकर विवादित कोलेजियम व्यवस्था तक हमेशा न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच खींचातानी चलती रही है।
बहरहाल, इस टकराव ने कभी उल्लेखनीय कानूनों को जन्म दिया है, तो कभी अत्यंत ही दुर्भाग्यजनक परिस्थितियाँ भी सामने आई हैं। हालाकिं इस निर्णय का वर्तमान सरकार ने स्वागत किया है, हालाँकि यह भी आशंका बनी रहती है कि कई बार ऐसे प्रसंग मे न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव मुखर होने की संभावना बनी रहती है। ऐसे मे संविधान का सरंक्षक होने के नाते उच्चतम न्यायालय का यह दायित्व है कि वह इसके मूल्यों को अक्षुण्ण बनाए रखे। लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों का महत्त्व एक समान है, परन्तु आदर्श स्थिति वही होती है, जिसमें सभी अपनी-अपनी मर्यादा का बिना राग-द्वेष के पालन करें।

24 अगस्त 2017 का दिन ऐतिहासिक है। सर्वोच्च न्यायालय ने *”निजता*”पर अपने फैसले के माध्यम से यह चरितार्थ कर दिया है क्यों इसे अंतिम जन की अदालत कहा जाता है। न्यायालय की नज़र में निजता वह यौगिक है जो किसी की खानपान संबंधी आदतें, किसी की साथी चुनने की आज़ादी, समलैंगिकता का सवाल, बच्चा पैदा करने संबंधी निर्णय जैसे तत्त्वों से मिलकर बना है। सरकार के नए सरोगेसी बिल में प्रावधान है कि समलैंगिक जोड़े सरोगेसी के ज़रिये बच्चा पैदा नहीं कर सकते हैं, जबकि इस फैसले में सेक्सुअल संबंध और चुनाव को मौलिक अधिकार माना है। ऐसे में इस तरह के मामलों को लेकर बड़ी संख्या में लोग न्यायालय का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं।
ज़ाहिर है आने वाले दशक में यह निर्णय कई अन्य महत्त्वपूर्ण फैसलों की आधारशिला बनने का कार्य करेगा।
न्यायालय ने साफ़ किया है कि किसी के कल्याण के नाम पर उससे उसके अधिकार नहीं छीने जा सकते हैं। जनता सरकार की आलोचना कर सकती है, उसके खिलाफ प्रदर्शन कर सकती है, अपने मानवाधिकारों के हनन को लेकर सड़क पर उतर सकती है। न्यायालय की 9 जजों की संविधान पीठ ने इन बातों को बड़े ही सुस्पष्ट ढंग से कहा है।
निजता का अधिकार के यह फ़ैसला एक नागरिक को उनके तमाम अधिकारों के प्रति उन्हें सचेत करता है।
अनुसूचियों, भागों, अनुच्छेदों और उपबंधों से भरे भारी भरकम संविधान के निरस ढांचे में सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय वाकई वह सुन्दर मानवीय प्रतिमान है जो बार-बार पढा और गुणा जाना चाहिये।

-डॉ.भावना शर्मा
झुंझुनू,राजस्थान ।

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