नकली रुआब झूठे खिताब

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भारत लोकतांत्रिक देश है इसके बावजूद भी भारतीय महिलाओं की दयनीय स्थिति को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। आए दिन इस देश में यौन शोषण, सामूहिक बलात्कार जैसे जघन्य अपराध स्त्रियों के साथ होते हैं। स्त्रियों के प्रति विभेदी नीतियां, छल-कपट, घृणित मानसिकता, दोहरे चरित्र सब प्रत्यक्ष हैं। पीड़िताओं के लिए भी तुम्हारी तुलाओ असमानताएं हैं। नकली रुआब, झूठे खिताब, जातीय, सांप्रदायिक रंजिश कब तक इन कुंठाओं से उभरकर निष्पक्ष रूप अपनाओगे? समानताओं क्यों नागवार गुजरती हैं तुम्हें? क्यों स्त्रियों की स्वतंत्रता देखी नहीं जाती? जब रीढ़ तोड़ते हो, जुबां काट ते हो, उनके लिबासों को को खूनी धब्बो से लिथड़ा देख, रीढ़ तोड़, जुबां काट मर्दानी शक्तियों के प्रदर्शन असल में तुम्हारी बुजदिली के पुख़्ता सबूत हैं। जात- बिरादरी, मर्द औरत, धमकी, ज़ोर जबरदस्ती, छल – कपट, घृणित मानसिकता से दिग्भ्रमित कर दिया। झूठे सभ्यताओं, संस्कृतियों के राग अलापना कब बन्द कर मनुष्यता की मानवीय कसौटी पर स्वयं को परख पाओगे?
अपराध के विकृति रूप, दोगली नीतियां, जघन्य अपराधों के पोषक होते जा रहे। बेमुरववत लोग, पैसा, पावर, कानूनी दांव – पेंच यहां तक के मुख्य मीडियाधारा ने भी इस स्त्री अपराध के ग्राफ वृद्धि में कोई कसर नहीं छोड़ी।
इस देश की स्त्रियों ने खूब संताप, त्रासदियों को झेला है यदि सुप्तावस्था में रही तो कोई सुरक्षा कवच होगा, कोई चश्मदीद गवाह, सबूत, स्त्री मुव्वकिल, नहीं ,इसकी उम्मीद भी नहीं करें। मुखातीफ हो गई हूं मुखौटाई छवियों से, योरानर, अब मेरी दलीलों को सुनिए हां, मैंने ही कहा था कि ये जुबां काट दें मेरी, मैंने ही हथौडपह दिए हैं रीढ़ तोड़ने को, शायद छह महीनों की बच्चियों ने भी जो, मुस्कुराती हैं, महज़ हाथ पांव हिलती हैं, तुतलती तक नहीं उन्होंने भी उकसाया होगा कि उनका ये इंसान से हैवान रेप कर डाले, मुझ जैसी लहुलुहान, नोची खरोंची, सेंसिटिव पार्ट में, लोहे की रॉड, शीशे, मोमबततियां घुसेड़ देने पर भी आज कटघरे में खड़ी है अब उस के पास उसका दरवाज़ा खटखटाते है जो सर्वोपरि न्याय का सूचक है। हे ईश्वर देखो कितनी लंबी कतार में हैं हम स्त्रियां इंसाफ लेने आई है। रीढ़, जुबां गवा कर। कीजिए इंसाफ।
स्वयं के लिए लड़ना होगा, निर्भयता, प्रतिरोध करना होगा। कुछ ठोस कदम स्वयं की रक्षा को उठाने होंगे। हम भी देश की बेटियां हैं हमें भी वाई प्लस सुरक्षा चाहिए। अपराध बोध, अफ़सोस जैसे भाव को तिलांजलि देनी होगी। चौखट लांघ बाहर आना होगा। महिला सुरक्षा के पदों पर भीगी बिल्ली बन बैठी स्त्रियां दुबकने का नहीं अपनी सी महिलाओं को बचाने का वक़्त है। जो आज भय से घरों में दुबके बैठे हैं। एक बार अवश्य पीड़िताओं की अखबारों में चिपकी तस्वीर देखे फिर अपनी बच्चियों को उसी हाल में सोच कर देखना। शायद मन के किसी कोने में कोई भाव उभर आए। नपुंसक वार्तालाप मत करो धरातल पर संघर्षरत होना होगा। श्मशानों में चिताओं के ढेर ही होगे, करते रहना प्रलाप। मरते रहने अकेले ही। पूर्व भी एक लेख में कहां आज भी कह रही हूं
ये समय स्त्री वर्ग के लिए अंधकारमय युग के नाम से इतिहास में अंकित किया जायेगा।
डॉ. राजकुमारी

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