नंदी की सेवा का आध्यात्मिक महत्व

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भारतवर्ष में सबसे ज्यादा पुजा जाने वाला गोवंश भी भेदभाव का शिकार है। गाय को माता की उपमा देकर बेशक उनके लिए विधान रच लिए पर नंदी अथवा बेल, सांड़ भी गोवंश ही है और इन गोवंशों को सड़कों पर बेसहारा रूप से विचरने को मजबूर कर दिया। गोवंश सड़कों पर खुद दुर्घटना का शिकार हो रहे हैं और लोगों को भी चोट पहुंचा रहे हैं। क्या गऊ शालाओं की तर्ज पर नंदी शाला नहीं होनी चाहिए। हमारे वैदिक धर्म में इन्हें साक्षात शिव भगवान् कहा गया है। अभी श्राद्ध पक्ष आ रहे हैं और हम गऊ की सेवा भी करेंगे पर गऊ के साथ साथ अगर हम नंदी के लिए भी कुछ चारा डलवाए तो शंकर भगवान भी तृप्त होंगे और पितरों को भी तृप्ति मिलेगी। नंदी की सेवा का आध्यात्मिक महत्व है पर हम कई बार आवश्यकता अनुसार सेवा के सौपान बना लेते हैं, पर क्या यह सही है? इसलिए आवश्यक है कि पहले हम नंदी सेवा का माहात्म्य समझे।
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए शिलाद ऋषि को यह भय हो गया कि उनकी मृत्यु के पश्चात उनका वंश समाप्त हो जाएगा, इसलिए उन्होंने एक बच्चा गोद लेने का मानष बनाया पर वे किसी सामान्य बच्चे को नहीं बल्कि एक ऐसी संतान को अपनाना चाहते थे जिस पर भगवान शिव का आशीर्वाद हो और वह आध्यात्मिकता से परिपूर्ण हो। उत्तम संतान प्राप्ति के उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए शिलाद ऋषि ने कठोर तपस्या की तब भगवान शिव प्रसन्न होकर उनके सामने प्रस्तुत हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया कि जल्द ही उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति होगी। इतना कहते ही शिव अंतर्ध्यान हो गए।
शिलाद ऋषि खुशी-खुशी घर लोटे और अगले ही दिन खेती करने के लिए वे जब खेत पर पहुंचे, वहाँ उन्हें एक खूबसूरत नवजात शिशु मिला, जो आकर्षक तो था ही, उसके चेहरे पर एक अजीब सा तेज भी था। इतने में ही आकाशवाणी हुई कि , “यह दिव्य संतान है, इसका अच्छी तरह पालन-पोषण करना।“
शिलाद ऋषि उस बच्चे को लेकर अपने आश्रम लौट आए और उसे बेहद प्रेम और स्नेह के साथ पालने लगे। इस बच्चे का नाम उन्होंने नंदी रखा, जो बचपन से ही आध्यात्मिक और अपने पिता का आदर करने वाला था। शिलाद ने भी पिता और गुरू की भूमिका निभाते हुए नंदी को वेदों के साथ-साथ नैतिक शिक्षा का भी अच्छा ज्ञान दिया ।

कुछ समय पश्चात शिलाद ऋषि के आश्रम में दो संत पधारे, मित्र और वरुण। शिलाद ने अच्छी तरह उनकी आवभगत की और नंदी ने भी अपने पिता का अनुसरण करते हुए उन संतों का खूब सेवा की और किसी भी प्रकार की शिकायत का अवसर नहीं दिया।
जाते समय मित्र और वरुण ऋषि बहुत प्रसन्न थे, वह अपने साथ हुए व्यवहार से काफी संतुष्ट थे। ऋषियों के प्रस्थान करने से पहले शिलाद और नंदी ने उनका आशीर्वाद लिया। जब शिलाद ऋषि ने उन साधुओं को प्रणाम किया तब उन दोनों ने उन्हें लंबे और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद दिया। लेकिन जब नंदी ने साधुओं के चरण स्पर्श किए तो दोनों ही साधु बिना आशीर्वाद दिए ही प्रस्थान करने लगे ।
साधुओं की परेशानी शिलाद ऋषि ने भांप ली, इसलिए जैसे ही वे आश्रम से बाहर आए तो शिलाद ने उन साधुओं से पूछा कि उन्होंने नंदी को लंबी उम्र का आशीर्वाद क्यों नहीं दिया?
मित्रा और वरुण ने उन्हें बताया कि नंदी अल्पायु हैं, यह बात सुनकर स्वयं शिलाद चिंताग्रस्त हो गए। आश्रम लौटते ही नंदी ने भी अपने पिता के चेहरे के भाव पढ़ लिए। नंदी ने अपने पिता से उनकी चिंता का कारण जानना चाहा तो उनके पिता ने उन्हें सब कुछ सच-सच बता दिया। शिलाद को लगता था कि अपनी मौत की जानकारी सुनते ही नंदी या तो रो पड़ेगा या भयभीत हो जाएगा। लेकिन जो हुआ वो ठीक विपरीत था। नंदी ने जैसे ही सुना कि वो अल्पायु है, तो वह हंसकर बोला कि आपने मुझे भगवान शिव की कृपा से पाया है, इसलिए मेरी उम्र की रक्षा भी वही करेंगे। इतना कहते ही अपने पिता का आशीर्वाद प्राप्त कर नंदी भुवन नदी के किनारे तप करने चले गए। नंदी का तप इतना कठोर, आस्था इतनी प्रबल और ध्यान इतना मजबूत था कि शिव को प्रकट होने में ज्यादा समय भी नहीं लगा।
शिव ने नंदी से आंखें खोलने के लिए कहा। नंदी ने जैसे ही अपनी आंखें खोलीं, तब उनके सामने दुनिया का विशाल तेजपूंज शिव थे। जिन्हें देखकर नंदी ने वरदान के रूप में लंबी उम्र की जगह ताउम्र शिव का सानिध्य मांग लिया। नंदी के भावुक समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने नंदी को पहले अपने गले लगाया और उन्हें बैल का चेहरा देकर उन्हें अपने वाहन, अपना दोस्त, अपने गणों में सर्वोत्तम के रूप में स्वीकार कर लिया। नंदी ने महादेव की कृपा से अपनी नियति को बदला साथ ही स्वयं अपनी नियति को अपने हाथों से लिखा भी लिया ।
नंदी द्वारा शिव का साथ प्राप्त करने के पश्चात एक बार असुरों और देवताओं के बीच क्षीर सागर में समुद्र मंथन हुआ। इस मंथन में सबसे पहले हलाहल नाम का अत्याधिक घातक विष निकला, जिसकी एक बूंद भी सर्वनाश कर सकती थी। इस विष का गलत प्रयोग ना हो इसलिए स्वयं शिव ने उसका पान कर लिया।
वह विष, शिव के लिए भी घातक था इसलिए उनकी अर्धांगिनी माता पार्वती यह नहीं चाहती थीं कि इस विष की बूंद भी शिव के शरीर में जाए इसलिए पार्वती ने शिव के गले में ही उस विष को रोक दिया था। इस विष की कुछ बूंदे जमीन पर गिर गई थीं, जिससे पृथ्वी को नुकसान हो सकता था, जिसे स्वयं नंदी ने अपनी जीभ से साफ किया था। देवता और असुर दोनों ही नंदी की तत्परता और समर्पण को देखकर हैरान हो गए कि नंदी ने जान-बूझकर इस विष को क्यों ग्रहण किया। सभी यही सोच रहे थे कि शिव तो भगवान हैं, साथ ही उनके पास माता पार्वती का साथ भी है। लेकिन नंदी!

इस पर नंदी ने जवाब दिया कि जब उनके स्वामी ने इस विष को ग्रहण किया है तो उन्हें तो करना ही था। नंदी का यह समर्पण देखकर शिव भी प्रसन्न हुए और कहा कि नंदी मेरे सबसे बड़े भक्त हैं इसलिए मेरी सभी ताकतें नंदी की भी हैं। अगर पार्वती की सुरक्षा मेरे साथ है तो वह नंदी के साथ भी है। इस घटना के बाद शिव और नंदी का साथ अत्यधिक मजबूत हो गया।
शिव और नंदी के बीच इसी संबंध की वजह से शिव की मूर्ति के साथ नंदी की प्रतिमा भी स्थापित की जाती है। ऐसा माना जाता है कि शिव तो हमेशा ध्यान में लीन होते हैं, वह हमेशा समाधि में रहते हैं इसलिए नंदी के कान में की गई प्रार्थना नंदी की अपने स्वामी से प्रार्थना बन जाती है और वह शिव को इसे पूरा करने के लिए कहते हैं। नंदी की प्रार्थना शिव कभी अनसुनी नहीं करते इसलिए वह जल्दी पूरी हो जाती है।
जब नंदी की सेवा साक्षात शिव भगवान् की सेवा है तो क्यों न गऊ शाला के साथ नंदी शाला के महत्व को स्वीकार किया जाए। इससे सड़क सुरक्षा भी बनी रहेगी और पशु की हानि भी न होगी और कोई व्यक्ति नंदी का शिकार भी न होगा। प्रकृति संतुलन का नाम है और प्रकृति की सभी व्यवस्थाएं सम्मानित रहे तो ही मानवीय जीवन सुरक्षित है।

– डॉ.भावना शर्मा
मोदियो की जाव, झुंझुनूं,राजस्थान
bsharma.jjn@gmail.com

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