धम्मचक्कपवत्तनसुत्त धम्म चक्र परिवर्तन सुत्त दिवस गुरु पर्व – आषाद पूर्णिमा

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बुद्ध धम्म में सभी पूर्णिमाओ का प्रमुख स्थान हैं । वैशाख पूर्णिमा को सिद्धार्थ का जन्म, बुद्धत्व प्राप्ति एवम् महापरिनिर्वाण हुआ था। आषाढ़ पूर्णिमा को सिद्धार्थ का महाभिनिष्क्रमण ( ग्रह त्याग ) तथा म्रगदाय वन सारनाथ में पंच वर्गीय भिक्षुओं को प्रथम उपदेश दिया और तब ही धम्म की स्थापना हुई। आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही पांच भिक्षुओं ने तथागत सम्यक्सम् शाक्यमुनि गौतम बुद्ध को अपना गुरु माना, इसीलिए आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा भी कहते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा को बुद्ध ने पहला धम्मप्रवचन दिया, जिसे बौद्ध परंपरा और समुदाय में धम्मचक्र परिवर्तन सूत्र के नाम से जाना जाता हैं।
“धम्मचक्र परिवर्तन सूत्त में बुद्ध धम्म का सार हैं।” वर्तमान से 2564 वर्ष पूर्व वाराणसी के ऋषिपत्तन मृगदाय वन में महाकरुणिक शांतिनायक प्रज्ञावान बुद्ध ने जो उपदेश दिया था, वह प्रज्ञा एवम् मैत्री उत्पन करने वाला था। इसी धम्मचक्र परिवर्तन के दिन “आर्य अष्टांगिक मार्ग तथा चार आर्य सत्यों” को बताया था, इसे मध्यम मार्ग भी कहा जाता हैं। बुद्धतत्व प्राप्त करने के पश्चात बुद्ध ने जो पहला प्रवचन दिया हैं। उसमे चार आर्य सत्यों का दर्शन हैं। धम्म चक्र परिवर्तन सुत्त में बुद्ध की शिक्षाएं और धम्म के तत्व समाहित हैं। यह ऐसा एक सुत्त है, जो धम्म को समझने के लिए पूर्ण हैं। बुद्धतत्त्व प्राप्ति के पश्चात जो बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई तथा बुद्ध को संसार के अस्तित्व का दर्शन हुआ , तो बुद्ध के मन में आया की मैंने जो ज्ञान पाया हैं और मुझे जो ज्ञान की अद्भुत अनुभूति हुई हैं। वह इतनी सूक्ष्म हैं की उसे शब्दों में कहना कठिन है और उस अनुभव को शब्दों में वर्णित नहीं किया सकता, इस अद्भुत ज्ञान को केवल अपने अनुभव से समझा और पाया जा सकता है। बुद्ध के मन में विचारों का सिलसिला चल रहा था कि “मैं यह ज्ञान किस को बताऊं ? या मैं यही बोधि वृक्ष के नीचे बैठा रहूं ? या अकेला ही विचरण करूं ?” ऐसे विचार आ रहे थे। लेकिन जब बुद्ध ने सम्यक् दृष्टि की सकारात्मक भावना से एक आवाज सुनी “कि आप सम्यक् सम्बुद्ध हो गए हो अपने अथक प्रयास से जो आपने सम्बोद्धि पाई है इसको बांटो और आगे बढ़ो जो लोग दुखी हैं उन्हें जागृत करो दुखों का नाश करो आपकी यह महान शिक्षा प्रारंभ में कल्याणकारी होगी, मध्य में कल्याणकारी हो गई और अंत में भी कल्याणकारी होगी। बुद्ध वहां से प्रेरणा पाकर बोधगया से वाराणसी के लिए चल पड़े, तब बुद्ध को मार्ग में एक साधु मिला वह बुद्ध के व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुआ। तब उस तपस्वी साधु ने बुद्ध पूछा की तुमने क्या पाया है तुम्हारे शरीर से तेजस्वी प्रकाश की किरण फूट रही हैं फिर बुद्ध कहते हैं मुझे बुद्धत्व की प्राप्ति हुई है “मैं बुद्ध”, “मैं अर्हत हूं”, “मैं सम्यक् सम्बूद्ध हूं”, साधु कहने लगा कठिन तपस्या के प्रभाव से तू अपने आप को बुद्ध समझने लगा है और इतना कहकर आगे चला गया उसके बाद बुद्ध वाराणसी के ऋषिपत्तन मृगदाय में पहुंचे जहां उनके पुराने साथी, पांचो परिव्राजक जो बुद्ध को निरंजना नदी के किनारे छोड़कर चले गए थे, उन्होंने बुद्ध को बुद्धत्व प्राप्ति होने से पहले अनशन त्यागते हुए देखा यानी खीर ग्रहण करते हुए देखा तो उन्होंने सोचा कि यह पतित हो गया है और बुद्ध को छोड़कर चले गए। तब बुद्ध को अवसर मिल गया बौद्ध वृक्ष के नीचे बैठने का, तब उन्होंने वही दृढ़ प्रतिज्ञा ली, दृढ़ संकल्प लिया की चाहे मेरे शरीर का रक्त सूख जाए, चाहे मेरे शरीर अस्थि पंजर क्यों ना हो जाए, में जब तक बुद्धत्व प्राप्ति नहीं करूंगा तब तक मैं यहां से उठूंगा नहीं।
वैशाख पूर्णिमा के दिन निरंजना नदी के किनारे बोधि वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई, और फिर बुद्ध कहलाएं। बुद्ध ने विचार किया की सर्वप्रथम में इस ज्ञान को किसको दूं उन्होंने अपने मन में विचार किया “आलार कलाम” और “उत्तक राम पुत्त” भी आज जीवित नहीं है, तो फिर अद्भुत ज्ञान को किसको बताऊं। इसके बाद उन्होंने सोचा कि मेरे साथ जो पांच परिव्राजक थे उन्होंने मेरी खूब सेवा की थी और वह इस ज्ञान के अधिकारी हैं जो मुझे पतित समझकर छोड़ गए थे। बुद्ध ने उन पांचों परिव्राजको की तरफ जाने का निर्णय लिया और वो गया (वर्तमान बौद्ध गया) से वाराणसी को चल दिए वाराणसी के पास सारनाथ के म्रगदाय वन विहार मैं पहुंचे जहां पर पांचो परिव्राजको ने देखा की सिद्धार्थ हमारे तरफ आ रहा है और उन्होंने उन्हें अनदेखा कर दिया लेकिन जैसे-जैसे बुद्ध उनके पास आ रहे थे उनका आकर्षण बुद्ध की तरफ बढ़ने लगा वह बुद्ध के तेजस्वी व्यक्तित्व को देखते ही रह गए और फिर उनके स्वागत के लिए उठ खड़े हुए उन्होंने उन्हें ऊंचा आसन दिया, पैर धोने के लिए पानी दिया, उनका भिक्षा पात्र संभालने लगे अर्थात उनका समुचित आदर सत्कार किया।
सम्यक् सम्बुद्ध ने उनकी शंकाओं को मिटाने के लिए अपना पहला प्रवचन दिया उन्होंने कहा कि दो अतियो को छोड़ दो। अटियो का सेवन करना अनर्थ है अज्ञानता है।
(1) काम सुख में आसक्त होना या लिप्त होना ।
(2) शरीर को अति पीड़ा देना या कष्ट देना । इन दो अतियो को छोड़ मैंने “मध्यम मार्ग” खोजा है।
जो सुख देने वाला है ,जो शांति देने वाला है, जो ज्ञान देने वाला है, जो आनंद देने वाला है, मैत्री देने वाला है, वह आर्य अष्टांगिक मार्ग हैं।
आर्य अष्टांगिक मार्ग:-
• सम्यक् दृष्टि,
• सम्यक् संकल्प,
• सम्यक् वाचा,
• सम्यक् क्रमांत,
• सम्यक् आजीविका,
• सम्यक् व्यायाम,
• सम्यक् स्मृति,
• सम्यक् समाधि

भगवान बुद्ध ने अपने 5 परिव्राजक को चार आर्य सत्य पर प्रवचन दिया चार आर्य सत्य का ज्ञान कराया उन्होंने बताया कि संसार में दुख है और दुख का कारण है। दुखों का निरोध है और दुख निवारण का उपाय है दुख निवारण का मार्ग है इस प्रकार भगवान बुद्ध का प्रवचन उनके लिए था, जिनकी आंखों में है अभी भी पर्याप्त धूल जमा थी चार आर्य सत्य:-
(क) दुःख है।
(ख )दुःख का कारण है।
(ग) दुःख निवारण है।
(घ) दुःख निवारण का मार्ग है।

(क) दुख :- दुख की व्याख्या करते हुए भगवान बुद्ध ने बताया कि जन्म दुख है, बुढ़ापा दुख है, मरण शोक, रुदन, मन की बेचैनी दुख है, प्रिय का वियोग दुख है, अप्रिय का सहयोग दुख है, इच्छा करके जिसे नहीं पाया जा सकता वह दुख है । संक्षेप में पांचों उपादान स्कंध दुख है।
रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान, यही पांचो उपादान स्कंध है ।

1. रुप – पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, यह चारो रूप उपादान स्कंध है।
2. वेदना – हम वस्तुओं या उनके विचार के संपर्क में आने पर जो सुख दुखों या न सुख – दुख के रूप में अनुभव करते हैं इसे ही वेदना स्कंध कहते हैं।
3. संज्ञा – वेदना के बाद हमारे मस्तिष्क पर पहले से ही अंकित संस्कारों द्वारा जो हम पहचानते हैं । इसे संज्ञा कहते हैं उदाहरण यह वही देवदत्त है।
4. संस्कार – रूपों की वेदनाओ और संज्ञाओं का जो संस्कार मस्तिष्क पर पड़ा रहता है जिसकी सहायता से कि हम हमने पहचाना है इसे संस्कार कहते हैं उदाहरण यह वही देवदत्त है।
5. विज्ञान- चेतना या मन को विज्ञान कहते हैं यह पांचवा स्कंध जब व्यक्ति की तृष्णा के विषय होकर पास आते हैं तो इन्हें ही उपादान स्कंध कहते हैं बुद्ध ने पांचों उपादान सकंधों को दुख रूप कहा है ।
(ख) दुख का कारण है- तृष्णा, वासना, काम भोग की तृष्णा इंद्रियों के जितने प्रिय विषय हैं उन विषयों के साथ संपर्क मन में तृष्णा पैदा करते हैं सांसारिक पदार्थों की तृष्णा के कारण ही संसार में वाद – विवाद – मतभेद आदि हैं राजा महाराजाओं से लेकर, माता पुत्र से, पुत्र माता से, भाई – भाई से , पिता पुत्र से, पुत्र पिता से, भाई – बहन से, मित्र – मित्र से, वाद – विवाद – मतभेद करते हैं इस प्रकार कल विवाद करते हुए एक दूसरे पर तृष्णा करते हुए महान दुख को प्राप्त होते हैं।
(ग) दुख का निवारण- इच्छा, तृष्णा, वासना ही दुख का मूल कारण है इच्छा तृष्णा वासना को अपने अंदर नहीं आने देना । इच्छा, तृष्णा , वासना का नाश करना । सांसारिक पदार्थों से, सांसारिक विचारों से जब तृष्णा छूट जाती है तभी तृष्णा का अंत होता है और तृष्णा के अंत के साथ ही दुख का अंत होता है । तभी तृष्णा का विरोध होता है ।
तृष्णा के नाश होने पर उपादान (=विषयों के संग्रह) करने का निरोध होता है। अपादान के निरोध से भव (=लोक) निरोध होता है। भव निरोध से जन्म का निरोध होता है । जन्म के निरोध से बुढ़ापा, मरण , रोना दुखों मन की खिन्नता हैरानगी नष्ट हो जाती है इस प्रकार दुखों का विरोध होता है
यही दुख निरोध बुद्ध के सारे दर्शन का केंद्रबिंदु है।
(घ) दुख निवारण का मार्ग- दुख निरोध की ओर ले जाने वाला मार्ग है वह आर्य अष्टांगिक मार्ग है।
आर्य अष्टांगिक मार्ग की 8 बातों को प्रज्ञा (ज्ञान) , शील (सदाचार) समाधि (ध्यान) तीन भागों(स्कंधों) में बांटा गया है ।
प्रज्ञा- 1. सम्यक् दृष्टि, 2 सम्यक् संकल्प
शील- 3 – सम्यक् वाचा, 4 – सम्यक् क्रमांत , 5 – सम्यक् आजीविका
समाधि- 6- सम्यक् व्यायाम , 7- सम्यक् स्मृति, 8- सम्यक् समाधि

1. सम्यक् दृष्टि –
सम्यक सम्बुद्ध ने 5 परिव्राजको को उपदेश देते हुए कहा कि मन, वचन और शरीर से जो हमारे विचारों की समझ है वह उचित होनी चाहिए हमें भले – बुरे का ज्ञान होना चाहिए जो विचार हमारे अंदर शांति पैदा करते हैं वह शुद्ध हैं जो विचार अशांति पैदा करते हैं वह हमारे स्वयं के अर्जित किए विचारों से जुड़े हुए हैं। लोभ, द्वेष, मोह, अहंकार से जुड़े विचार हमारे स्वयं के अर्जित किए हुए विकार हैं जिनसे दुख पैदा होता है । जब हमारे नकारात्मक विचार होते हैं तब हमारी अकुशल भावनाएं काम करती हैं, जब हमारे विचार सकारात्मक होते हैं तब हमारी कुशल भावनाएं काम करती हैं अपने अंदर हमें कुशल विचारों को आने देना चाहिए अपनी उच्च मानसिकता का विकास करना है अपनी स्थिति को बदलना है जब हमारा मन दुखी होता है तो दूसरों को दोषी ठहराते हैं जिससे और ज्यादा दुख बढ़ता है। हमें बुद्धि विवेक से जीवन को चलाना है और अपनी समस्याओं का समाधान खुद ही करना है। बुद्ध कहते हैं की लोभी, द्वेशी, अहंकारी, अज्ञानी और विचलित न होकर, हमें करुणा, मैत्री, वीर्य, प्रज्ञावान बनकर जीवन को देखना है अगर हम मन के जो जहर हैं उनमें लगे रहेंगे तो हमारा जीवन अज्ञानता में चला जाएगा । अच्छा हो यदि हम अपनी बुद्धि का प्रयोग करके जागृत होकर चैतन्य रहकर अपनी समस्याओं का समाधान करें। “भगवान बुद्ध कहते हैं – धर्म को जानने का यही एक मात्र उपाय है कि स्वयं को जानने का प्रयत्न करें । अपने विकारों को अपने अनर्थ गलत भावनाओं को गलत सोच को जानने का समझने का प्रयत्न करें समस्याएं आसान हो जाएंगी एवम् समस्याएं स्वयं ही सुलझ जाएंगी । यही सम्यक दृष्टि है।

2. सम्यक संकल्प –
सम्यक विचार अपने हृदय में लाना, राग, हिंसा प्रति हिंसा से रहित होकर सोचना तृष्णा, अज्ञानता से पैदा होती है, ज्ञान से नहीं। सम्यक दृष्टि से ही सम्यक संकल्प होता है बाहर की चमक – दमक हम देखते हैं हमने तृष्णा पैदा होती है। हमारे पास सुंदर मकान हो, सुंदरकार हो, सुंदर पत्नी हो, प्यारे होनहार बच्चे हो, धन – दौलत हो, प्रतिष्ठा हो आदि । जब यह सब चीजें नहीं होती हैं तो इन सब के लिए हमारे अंदर तृष्णा पैदा होती है यह सब चीजें हमारे पास होने पर भी हम संतुष्ट नहीं होते हैं हमारी तृष्णा और बढ़ जाती है जिसका अंत नहीं प्रायः ऐसा होता है जो सत्य है उसकी ओर हम ध्यान नहीं देते और जो सत्य नहीं हैं उस ओर अनायास ही हम बड़े गंभीरता से ध्यान देते हैं जिससे दुख पैदा होता है। हम ध्यान साधना के अभ्यास से सम्यक संकल्प हम विकसित कर सकते हैं, इसके लिए हमें आनापान सती और मैत्ता भावना ध्यान भावना का अभ्यास करना चाहिए।

3. सम्यक वाचा – झूठ , चुगली, कटु भाषण और निंदा, बकवास से रहित होकर सच्ची मीठी बातों को बोलना चाहिए । हमें समय स्थान अवसर को देखते हुए जागरूक रहकर होश में रहते हुए बोलना चाहिए, हमें झूठ नहीं बोलना चाहिए, हमें निंदा – चुगली नहीं करनी चाहिए, ऐसे शब्द ना बोले जिससे दूसरे की भावनाओं को चोट पहुंचे अथवा हीन भावना पैदा हो हमें सच्ची बात बोलनी चाहिए मीठा बोलना चाहिए। मधुर वाणी बोले जिसे सुनकर दूसरे प्रश्न हो और आप स्वयं भी आनंदित हो।
4. सम्यक कर्मान्त- योग्य व्यवहार की शिक्षा देता है ।हमारा हर कार्य ऐसा हो जिसके करते समय हम दूसरों की भावनाओं और अधिकारों का ख्याल रखें । हमारा कार्य जीवन के जो मुख्य नियम (पंचशील)है उनसे अधिक से अधिक समन्वय रखता हो । जब किसी आदमी के कार्य पंचशीलों से समन्वय रखते हों , तो उन्हें हम सम्यक कर्म कहते है । कर्म दो प्रकार के होते हैं –
(अ )कुशल कर्म
(ब) अकुशल कर्म
कुशल कर्म – मैत्री करना,दान देना, शांति-संतुष्टि से रहना ,सत्य बोलना, मन को प्रदीप्त रखना ।
अकुशल कर्म- हिंसा करना,चोरी करना,कामाचार करना,झूठ बोलना, मादक पदार्थों का सेवन करना ।

5. सम्यक आजीविका – सम्यक आजीविका सदाचार से की गई कमाई सच्ची इमानदारी आजीविका से जीवन चलाना सच्ची आजीविका के लिए हमें ध्यान रखना है कि उसमें किसी की हिंसा न हो, किसी को कोई हानि न पहुंचे, किसी का शोषण ना ही, मादक पदार्थों का व्यापार न हो, हथियारों का व्यापार, प्राणियों का व्यापार, मांस का व्यापार, विष (जहर)का व्यापार ना हो, ऐसा व्यापार जिससे हमारे समाज को हानि पहुंचती हो ऐसे आजीविका या कार्य न करना उनसे बचना उनसे दूर रहना ही सम्यक आजीविका है ।
6. सम्यक व्यायाम – इंद्रियों पर संयम रखना, अकुशल भावनाओं को रोकना, उत्पन्न अकुशल भावनाओं का उच्छेद करना, कुशल भावनाओं को उत्पन्न करना, उत्पन्न कुशल भावनाओं का संरक्षण करना । यही सम्यक व्यायाम है, यही चार सम्यक प्रयत्न है।

7. सम्यक स्मृति – काया, वेदना, चित्त और मन के धर्मों को भली प्रकार समझना उनकी स्मृति बनाए रखना सम्यक स्मृति है। स्वयं के प्रति स्मृति, वस्तु मात्र क प्रति स्मृति , दूसरों के प्रति स्मृति, धम्म के प्रति स्मृति । स्मृति को बनाए रखने के लिए हमें दिन प्रतिदिन आनापानशती ध्यान का अभ्यास करना चाहिए । आनापानशती ध्यान के अभ्यास से हम स्मृतिवान होते हैं ।

8. सम्यक समाधि – चित्त की एकाग्रता को समाधि कहते हैं सम्यक समाधि वह है जिससे मन के विक्षेपण को हटाया जा सके बुद्ध की शिक्षाओं को अत्यंत संक्षेप में एक गाथा में धम्मपद में इस प्रकार कहा गया है

“सब्ब पापस्य अकरणं, कुशलस्स उपसम्पदां , सचित्त परियोदपनं एतं बुद्धानु सासनं ।”
अर्थात: “सभी पाप कर्मों का न करना, कुशल कर्मों का संचय करना, मन को परिशुद्द रखना यही बुद्ध की शिक्षा है।“
सम्यक दृष्टि , सम्यक संकल्प, सम्यक वाचा, सम्यक क्रमंट, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक समाधि यह सब एक दूसरे पर आधारित हैं एक दूसरे से संबंधित हैं यह यह हमारी भावनाओं को हमारे मन को संतुलित करने में सहायक हैं। जब हमारा मन संतुलित होता है तो हमारी भावनाएं संतुलित होती हैं, तो हमारे मन में एक आंतरिक आनंद का, शांति का अनुभव होता है। यही मध्य मार्ग है दो अतियों के बीच का मार्ग इससे हमारे बुद्धि हमारे इंद्रियां हमारे भावनाओं में तारतम्य में रहता है। आर्य अष्टांगिक मार्ग पर चलने से हमारे अंदर गहन शांति और निर्भयता का विकास होता है। आर्य अष्टांगिक मार्ग पर चल कर ही हम सच्चे आनंद का, सच्चे सुख का अनुभव कर सकते हैं और इस प्रकार सारनाथ में मृगदाय वन में पंच वर्गीय भिक्खुओं पांच परिव्राजकों “1 – कोडिंन्य, 2- वप्प, 3- भदिय, 4- महानाम और 5-अश्वजीत” को प्रथम उपदेश दिया। यह उपदेश संसार भर में धम्मचक्कपवत्तनसुत्त (धम्म चक्र परिवर्तन सुत्त) के नाम से जाना जाता है और आज आषाढ़ पूर्णिमा के दिन को धम्मचक्कपवत्तनसुत्त (धम्म चक्र परिवर्तन सुत्त) दिवस के रूप में विश्व भर में मनाया जाता है।

भवतु सब्ब मंगलम। ।

– धम्मचारिणी प्रज्ञाकीर्ति
(प्रेमिता गौतम)
ई.मेल. – dhammcharinipragyakirti@gmail.com

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