दिल्ली विश्वविद्यालय का शिक्षक आंदोलन

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दिल्ली विश्वविद्यालय में दिल्ली शिक्षक संघ के आवाह्न पर अनिश्चितकालीन हड़ताल 4 दिसम्बर से आरम्भ हुआ आज अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच चुकी है । इस हड़ताल का मुख्य उद्देश्य तदर्थ शिक्षकों को जो कई-कई वर्षों से दिल्लीविश्वविद्यालयों के महाविद्यालयों में यू.जी.सी. की गाइड लाइन के अनुसार काम कर रहे है उनके समायोजन की मांग को उठाया गया है चूंकि इतने वर्षों तक कार्यरत होने के बावजूद उन्हें निकाला दिया जाता है । हर चार महीने में ये चिंता सताती है कि अगला नियुक्ति पत्र मिलेगा यहाँ नहीं । जब प्रत्येक शिक्षक योग्य है कालेज के कार्यों में भी हाथ बँटाता है , विद्यार्थियों को अच्छा ज्ञान देता है अपना बेस्ट देता है फिर क्यों ना उन्हें समायोजित किया जाये ? क्यों वे भयभीत रहे अगले सेमेस्टर के पत्र के लिए । इस तदर्थ पद पर रहते हुए कोई मेडिकल सुविधाएं उन्हें प्राप्त होती, ना ही चाइल्ड केयर लीव मिलती है । कुछ ऐसी भी महिलाएं शिक्षिका है जो डिलीवरी के दूसरे दिन ही कालेज ज्वाइन कर लेती है ताकि वेतन ना कटे । सब सभी शिक्षक योग्य है साक्षात्कार दे कर चयनित हुए है । अकेडमिक नम्बर भी पूरे किये है तो आड़ीनेस पास कर क्यों नहीं उनको समायोजित किया जा रहा ।ऐसा संयोजन ऐसा तो है नहीं की पहली बार हो रहा हो विश्वविधालय में पहले भी हुआ है । राजस्थान में अभी कुछ दिन पहले भी हुआ है । क्या गुलामी प्रथा लाना चाहती है सरकारें बाकी प्रस्ताव तो रातोंरात लें आती है सरकारें फिर ये क्यों नहीं ? विश्वविद्यालय के कुलपति का रवैया शिक्षकों के प्रति बिल्कुल अच्छा नहीं है । कुलपति ने अभी तक एक बार भी टीचर्स को आश्वसन नहीं दिया है कि कोई रास्ता निकालेगे । परीक्षा निषेध और पेपर्स चैकिंग का निषेध है तो धमकियों भरे पत्र शिक्षकों को आ रहे है नवम्बर का वेतन विलम्ब से मिला तो इस धरने का निर्णय लिया गया । दूसरा मुद्दा पदोन्नति था वरिष्ठ शिक्षकों को कई सालो के बाद भी प्रमोशन नहीं मिली है जब तक प्रमोशन नहीं होगा सीटे कैसे आयेंगी ? तीसरा पेंशन का मुद्दा था जो शिक्षक वर्तमान में पेंशनरों की श्रेणी में आ गये है वो अब वृद्धावस्था में क्या खाये । इसलिए यह अनिश्चितकालीन हड़ताल सभी शिक्षकों ने की जिसके चलते व वी.सी.ऑफ़िस को घेराबंद करना पड़ा । शिक्षक साथियों ने मीटिंग रूम को घेरा रात भर पुलिस प्रशासन ने उन्हें कैद रखा । इसी के चलते संसद थाने में गिरफ़्तारिया भी टीचर्स ने संसद थाने में दी । 10तारीख को पुलिस प्रशासन ने शांतिपूर्ण मार्च के दौरान वाटर कैनन का प्रयोग भी हम सभी पर किया । ताकि वो माल रोड तक मार्च ना लें जाये । एक कुलपति की सुरक्षा के लिए हज़ारो पुलिस वाले और सेना लगा रखी है । जो कुलपति महोदय की सुरक्षा कर रही है । आज 9दिन है शिक्षक कड़कती ठंड में पूस की रात में खुले आसमान में पेड़ो के नीचे गुजर -बसर कर रहे है । इसी आस में की समायोजन और बाकी मुद्दों के स्थायी निदान लें कर ही जाएँगे । देखते है कहा तक सफलता मिलती है बाकी सत्ता और कुलपति पर अभी जूं भी नहीं रेंग रही है । ये आंदोलन अब चरमावस्था पर है । समाजिक न्याय , शोषण के विरोध की लड़ाई है , शिक्षा और शिक्षकों को बचाने की लड़ाई है , ये जंग है निजीकरण से उच्च शिक्षाओं को बचाने की । देखते है बाहरी सरकार कब तक असवेंदनशील बनी रहती है ।

– डॉ.राजकुमारी

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