डीयू शिक्षकों ने आरक्षण नीति का सही पालन करने और प्रोफ़ेसर काले कमेटी को लागू कराने की मांग को लेकर वाइस चांसलर को पत्र लिखा

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दिल्ली विश्वविद्यालय के अनुसूचित जाति/ जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के शिक्षक संगठनों ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर को पत्र लिखकर मांग की है कि शिक्षकों की स्थायी नियुक्तियों से पूर्व रोस्टर ,काले कमेटी की रिपोर्ट व विज्ञापनों की सही से जांच कराने के लिए एक पांच सदस्यीय उच्च स्तरीय कमेटी बनाने की मांग की है।कमेटी में वरिष्ठ प्रोफेसर, पूर्व विद्वत परिषद सदस्य के अलावा रोस्टर की जानकारी रखने वालों को इसमें रखा जाए।यह कमेटी अपनी रिपोर्ट एक महीने के अंदर दे। सही रोस्टर के बाद ही कॉलेजों के विज्ञापन निकाले जाए।

पांच सदस्यीय कमेटी बनाने ,रोस्टर की सही जांच व प्रोफ़ेसर काले कमेटी को लागू कराने की मांग करने वाले शिक्षक संगठनों में दिल्ली यूनिवर्सिटी एससी, एसटी, ओबीसी टीचर्स फोरम, फोरम ऑफ एकेडेमिक्स फ़ॉर सोशल जस्टिस, एसडीटीएफ, दिल्ली यूनिवर्सिटी एससी, एसटी टीचर्स एसोसिएशन आदि हैं।इन संगठनों के पदाधिकारियों की हुई मीटिंग के बाद ही वाइस चांसलर को पत्र लिखा गया है।

फोरम ऑफ़ एकेडेमिक्स फॉर सोशल जस्टिस के चेयरमैन व पूर्व विद्वत परिषद सदस्य प्रो. हंसराज ‘सुमन’ के अनुसार संगठनों के प्रतिनिधियों ने बताया है कि हाल ही में आ रहे स्थायी शिक्षक नियुक्तियों के विज्ञापनों में अनेक प्रकार की विसंगतियां है।कॉलेजों द्वारा निकाले जा रहे विज्ञापनों में भारत सरकार की आरक्षण नीति व डीओपीटी के निर्देशों को सही से लागू नहीं किया गया है। साथ ही जो पद निकाले जा रहे हैं उनमें शॉर्टफाल, बैकलॉग और विश्वविद्यालय द्वारा बनाई गई प्रोफ़ेसर काले कमेटी की रिपोर्ट को स्वीकारते हुए करेक्ट रोस्टर नहीं बनाया गया है जिससे एससी,एसटी, ओबीसी अभ्यर्थियों को जिस अनुपात में आरक्षण मिलना चाहिए था नहीं दिया जा रहा है।तमाम कॉलेज सामाजिक न्याय और भारतीय संविधान की सरेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं।

प्रो. सुमन ने बताया है कि वाइस चांसलर को लिखे गए पत्र में उन्होंने विश्वविद्यालय में सामाजिक न्याय दिलाने की मांग करते हुए आरक्षण, रोस्टर और विज्ञापनों की जांच करने के लिए एक वरिष्ठ प्रोफ़ेसर के नेतृत्व में पांच सदस्यीय कमेटी का गठन किया जाए। कमेटी में पूर्व विद्वत परिषद सदस्य, रोस्टर की सही जानकारी रखने वाले सदस्यों को ही रखा जाये।कमेटी कॉलेजों में जाकर यह जांच करे कि हाल ही में शिक्षकों की स्थायी नियुक्तियों के लिए निकाले जा रहे विज्ञापन क्या सही है या नहीं ? क्या कॉलेजों ने रोस्टर को भारत सरकार की आरक्षण नीति और डीओपीटी के अनुसार सीनियरिटी के आधार पर 200 पॉइंट पोस्ट बेस रोस्टर को 2-7-1997 से एससी, एसटी के लिए लागू करना व 21 मार्च 2007 से ओबीसी आरक्षण को लागू करते हुए रोस्टर बनाया गया है या नहीं।इसके अतिरिक्त करेक्ट रोस्टर बनाते हुए इन पदों के विज्ञापन देते समय शॉर्टफाल, बैकलॉग और दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा बनाई गई प्रोफ़ेसर काले कमेटी की रिपोर्ट के निर्देशों को कॉलेजों ने स्वीकार करते हुए शॉर्टफाल व बैकलॉग पदों को निकाला है या नहीं?सही से जांच की जानी चाहिए।

दिल्ली यूनिवर्सिटी एससी, एसटी, ओबीसी टीचर्स फोरम के अध्यक्ष डॉ. के.पी.सिंह ने बताया है कि आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्गो (ईडब्ल्यूएस आरक्षण) को 10 फीसदी आरक्षण फरवरी ,2019 में आया था जिसे विश्वविद्यालय और कॉलेजों ने स्वीकारते हुए इसको रोस्टर में शामिल कर लिया।कॉलेजों ने ईडब्ल्यूएस रोस्टर को फरवरी 2019 से ना बनाकर उसे एससी, एसटी, ओबीसी आरक्षण के आरक्षण लागू होने से पहले लागू करते हुए रोस्टर बना दिया, इतना ही नहीं उन्होंने 10 फीसदी आरक्षण के स्थान पर किसी-किसी कॉलेज ने 14,15 या 20 फीसदी तक आरक्षण दे दिया जिससे कि एससी, एसटी, ओबीसी आरक्षण कम कर दिया गया और ईडब्ल्यूएस बढ़ाकर दिया गया।

डॉ. सिंह ने बताया है कि इसी तरह से हाल ही में यूजीसी ने ओबीसी की बकाया सेकेंड ट्रांच के पदों को भरने के निर्देश कॉलेजों को दिए हैं लेकिन अभी तक कॉलेजों ने ओबीसी एक्सपेंशन की बढ़ी हुई सीटों को अभी तक रोस्टर में शामिल नहीं किया है और कॉलेजों ने ईडब्ल्यूएस व सेकेंड ट्रांच को रोस्टर में शामिल किए बिना ही पदों को निकाल रहे हैं।इसमे किसी तरह का आरक्षण न देना डीओपीटी के नियमों का सरेआम उल्लंघन है।उनका कहना है कि कमेटी के बनने के बाद कॉलेजों द्वारा की जा रही इन विसंगतियों को दूर किया जा सकेगा।

शिक्षक संगठनों के प्रतिनिधि जिसमे प्रो. हंसराज ‘सुमन ‘डॉ. के.पी.सिंह ,डॉ. एस. के.सागर ,डॉ. धनीराम ने वाइस चांसलर को लिखे पत्र में अपील व मांग की हैं कि पांच सदस्यीय कमेटी को जल्द से जल्द बनाया जाए ताकि यह कमेटी कॉलेजों में जाकर रोस्टर व विज्ञापनों की सही जांच कर एक रिपोर्ट तैयार करके विश्वविद्यालय प्रशासन को दे। साथ ही जिन कॉलेजों के रोस्टर में अनेक विसंगतियां है, जिन्होंने भारत सरकार के नियमों का सरेआम उल्लंघन किया है उसे विश्वविद्यालय प्रशासन इस रिपोर्ट को मीडिया और आम जनता के बीच सार्वजनिक कर बताए कि किस तरह से कॉलेजों के प्रिंसिपलों द्वारा अपनी इच्छा से, अपने अनुसार रोस्टर बनवाते है,उनका वाजिब हक मारकर उन पदों को सामान्य वर्गो में तब्दील करते हैं।

प्रो. सुमन ने वाइस चांसलर से अनुरोध करते हुए जल्द से जल्द शिक्षकों का रोस्टर व विज्ञापनों की सही जांच करने संबंधी एक उच्च स्तरीय पांच सदस्यीय कमेटी का गठन करने की मांग दोहराई है ताकि विश्वविद्यालय में सामाजिक न्याय का सही से पालन हो और आरक्षित वर्गो को सही से न्याय मिल सके।

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