झुंझुनू की मन की आवाज

Facebook
Google+
https://newsquesindia.com/%E0%A4%9D%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%9D%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%86%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9C">
Twitter
LinkedIn
INSTAGRAM
SOCIALICON

सब अपने मन की आवाज सुनाते है आज मेरा भी मन है कि मै भी बताऊ कि मै झुंझुनू हूँ, मै शेखावाटी की शान हूँ,सीमाओं पर लडने वाली फौजो की जन्‍मस्‍थली भी हूँ, तीज त्योहारों की रोनक भी हूँ,मेरे ह्रदय पटल पर शेखावाटी की सुंदर हवेलिया है,सौंदर्य को चार चांद लगाती बावड़ी भी है। गली कुंचो के मेले ,घुमर, गीत,संगीत मेरी सांसे है। हर मंदिर मे पुजे जाने वाले पेड़ मेरा सुहाग है। मस्‍जिद दरगाह मे खिलती हरियाली मेरा भाग है। खेत खलिहान मे तो बस मेरा जीवन बसता है। काटली नदी मे बचपन विचरता है ।मै बहुत धनाड्‍य हूँ, पर क्‍या बताऊ मै कुछ कुछ निराश हूँ कि सब होते हुए मै कुछ गंदा सा क्‍यूॕ हूँ, सड़क पर इतने घाव क्यूं,हर आंगन के आगे की सड़क केवल सरकार की ही जिम्मेदारी क्‍यूं, तुम नाली के लिए खोदलो,फिर पुरने के लिए सरकार सरकार पुकारो,क्‍यो छीजत बढने देते हो। मेरे अंतस पर रहने वाले मेरे झुंझुनू के वाशिंदे, क्‍या तु कुछ भी जिम्मेदार नही,अब कुछ दोष ठेकेदार का तो,दोषी तो कुछ तू भी कम नही।

नाली मे इतनी दुर्गंध क्यूं रे दम घुटता है मेरा।अहा कितनी विषेली हवा…..अरे खाने पीने का सामान भी नाली मे….इसे सही तरीके से पशु पक्षियों को डाल देते…अन्‍न का इतना अपमान क्यूँ । अरे ये फंसे हुए प्‍लास्‍टिक के कप गिलास,पत्तल दोने भी सरकार डाल गई क्‍या? छी!छी! अरे तुम झुंझुनू के वाशिंदे हो,तुम फौजी बन कर देश की सुरक्षा करते हो,धन कुबेर बन कर कमाते हो,कचरा सही जगह क्‍यू नही डालते। हाॕ वो कचरा लेने वाली गाडी भी कहा सुनती है भावना की,कल कितना भागी पीछे,पर उसने खानापूर्ति की और चलती बनी…….मेरे देश की धरती आआआ…..रिकार्ड सुनाते हुए गाडी चली गई। अच्छा मेरे झुंझुनू के प्‍यारो बताओ न पिछले साल के कितने पेडो़ ने जन्मदिन मनाया,सरकार तो पेड़ लगाओ अभियान चला सकती हैं,पर पालना तो तुमको था न। मुझे हरे हरे पेड़ पसंद है। आजकल दम सा घुटता है मेरा,कही भी मोरी खोल लेते हो तो कही तक गेट निकाल लेते हो,कही भी गाडी खडी कर देते हो,मै तुम्‍हारा आंगन नही हूँ क्‍या,मुझे अच्छा नही लगता ,तुम मेरे आंगन के वाशिंदो,मुझे भी सुंदर सा रखो न,खिला खिला सा। तुम रोज साफ सुथरे कपडे पहनते हो और मुझे ऐसे ही रखते है ।

पता है कल मंदिर के पास बहुत सारा कचरा सा था,तुम इस तरह क्यो बिखेरते हो प्रसाद को भी,ये मवेशी गूड के साथ प्‍लास्‍टिक खा गए थे ,खाने वाली सामग्री को अलग कर दिया करो,ताकि पशुओं की अकाल मौत न हो,ये भी तो मेरे है,मेरी सोहबत मे पलते है। अच्छा सुनो,साग सब्जी के लिए थेले बनवा लो न,वैसै ही जैसे तुम्‍हारे बाऊजी बनवाते थे, पूरानी पेंटो का,कितना चलता था न वो।उसमे सब सामान आ जाता था न।कोई प्‍लास्‍टिक का झंझट ही नहीं । तुम नए नए कपड़े पहनते हो ,स्टाइल के मोबाईल रखते हो,सुनो न !

मै भी तुम्हारा अपना झुंझुनू हूँ ,मुझे भी सेल्‍फी लेनी है,पर थोडा सा मुझे भी स्वच्छ बना दो,कुछ तहज़ीब की फसल उगादो।कब तक केवल कलक्टर को जख्‍म जख्म दिखा कर सहानुभूति बटोरोगे, बार बार शर्मिंदगी होती है ,क्या कभी भी नही जागोगे मेरे लिए। मै भी तो तुम्हारा अपना हूँ,तुम मेरे वाशिंदे हो तो मुझे स्वच्छ झुंझुनू की एक सेल्‍फी दे दो न। झुंझुनू की भावना का इतना मान तो रखोगे न,आखिर मै आपका अपना झुंझुनू हूँ न।

डॉ.भावना शर्मा

NewsQues India is Bilingual Indian daily e- Magazine. It is published in New Delhi by NewsQues India Group. The tagline of NewsQues India is " Read News, Ask Questions".

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *