छात्रों को एक सप्ताह में लाइब्रेरी की किताबें लौटानी होगी

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नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध दिल्ली सरकार के स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज के प्रिंसिपल ने विद्यार्थियों के लिए नोटिस जारी करते हुए आदेश दिया है कि तृतीय वर्ष के सभी विद्यार्थी लाइब्रेरी से इश्यू कराई गई पुस्तकें शारीरिक रूप से पहुंचकर 3 जून से 10 जून के बीच में जमा कराने की तिथि तय की है।इस अवधि में कोई विद्यार्थी अपनी किताबें जमा नहीं करता है तो उस पर कार्यवाही करने को कहा गया है।इसी तरह से नोटिस में स्टूडेंट एड फण्ड द्वारा गरीब विद्यार्थियों को किताबें दी जाती है उसे भी लौटने को कहा है ऐसी स्थिति में वे विद्यार्थी पढ़ेंगे कैसे ?फोरम ऑफ एकेडेमिक्स फ़ॉर सोशल जस्टिस ने कॉलेज द्वारा जारी नोटिस की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए डीयू प्रशासन और दिल्ली सरकार इस पर तुरंत हस्तक्षेप कर जांच कराने की मांग की।

फोरम के चेयरमैन व दिल्ली यूनिवर्सिटी की एकेडेमिक काउंसिल के पूर्व सदस्य प्रोफ़ेसर हंसराज ‘सुमन ‘ ने स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज द्वारा एमएचआरडी, यूजीसी और दिल्ली विश्वविद्यालय के दिशा निर्देशों का उल्लंघन करते हुए तृतीय वर्ष के सभी विद्यार्थियों को कॉलेज में उपस्थित होकर किताबें एक सप्ताह में वापिस करने को कहा है इसकी कड़ी निंदा करते हैं।जहां एक ओर भारत में कोरोना जैसी महामारी के संकट के चलते सरकार ने सभी शिक्षण संस्थानों/विश्वविद्यालयों/कॉलेजों को खोलने से मना किया है तो डीयू का एक कॉलेज कैसे अपने विद्यार्थियों को बुला सकता है ?उनका कहना है कि एक ओर समूह में इकट्ठा होना और कोरोना के जानलेवा डर के कारण सरकारें दूरी बनाने के निर्देश जारी कर रही है और वहीं दूसरी तरफ स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज के प्रिंसिपल तुगलकी फरमान जारी कर रहे हैं।ऐसे में क्या वे यदि कोई दुर्घटना होती है तो उसकी लिखित जिम्मेदारी लेंगे और स्वंय दंड के भागी होंगे।

प्रोफेसर सुमन का कहना है कि उनका यह फरमान जहां एक ओर सरकार की नीतियों और आदेश का उल्लंघन है वहीं यह एक अतार्किक बात है कि कोरोना के समय अपने गांव चले गए विद्यार्थियों द्वारा कॉलेज में सहशरीर उपस्थित होकर पुस्तकें जमा करवाई जाए और उस पर यह भी कि ऐसा ना करने पर विद्यार्थियों से दंड शुल्क भी निर्धारित किया गया है।उनका कहना है कि बहुत से ऐसे विद्यार्थी है जिनके पिता किसान, मजदूर या प्राइवेट सेक्टर में काम कर रहे थे।आज उनके पास आर्थिक तंगी के कारण बच्चों को भेजने में असमर्थ है।ऐसे स्थिति में कैसे कॉलेज आ पाएंगे सोचा जा सकता है ?

उनका कहना है कि जो विद्यार्थी देश का भविष्य है उनकी जान के साथ खिलवाड़ करने की कुत्सित योजना कितनी घातक सिद्ध हो सकती है अकादमिक जगत के लोगों द्वारा इस पर विचार किया जाना चाहिए।उनका यह भी कहना है कि डीयू प्रशासन और दिल्ली सरकार को ऐसे गम्भीर मुद्दे पर कार्यवाही करने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में इस तरह के लोग अपनी गलत राय के चलते शिक्षा व्यवस्था को खराब ना कर सके।इस पर एक कमेटी बिठाकर जांच कराए जाने की सख्त आवश्यकता है।

प्रोफ़ेसर सुमन ने पुनः दिल्ली सरकार और दिल्ली विश्वविद्यालय से हस्तक्षेप की मांग की है और कहा है कि हमारे विद्यार्थी हमारे देश के भविष्य के सपने है इनको हमें किसी भी कीमत पर बचाना है।संस्थानों, विद्यार्थियों और पूरे समाज पर बने खतरे के रूप में ऐसे लोगों के तानाशाही रवैये को देखा जाना चाहिए और सरकार को इनसे सख्ती से निपटने की आवश्यकता है।

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