चीन हमारा दुश्मन नम्बर वन और रूस सबसे अच्छा दोस्त

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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान की हार तय थी, लेकिन १९६५ के बाद अब ‘दुनिया की पंचायत’ में कश्मीर की चर्चा होना अच्छा संकेत नहीं है। अटल सरकार के रक्षा मंत्री जार्ज फ़र्नांडीज़ ने सही कहा था, चीन हमारा दुश्मन नम्बर एक है।
धारा ३७० हटाए जाने के बाद पाकिस्तान ने अपने विदेश मंत्री को तुरंत चीन रवाना किया था और इसके तुरंत बाद भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर चीन गए थे, इसके बावजूद चीन के कहने पर पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिखा और सुरक्षा परिषद की बैठक हो गई। यूनाइटेड नेशंस सिक्यूरिटी काउंसिल यानी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पंच अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ़्रांस हैं जिनका ज़िम्मा विश्व शांति बनाए रखना है।
भारत एक लम्बे अरसे से इस परिषद में स्थायी सदस्यता की माँग कर रहा है, इससे पहला फ़ायदा होगा कि कश्मीर जैसे मामलों पर भारत को कटघरे में खड़ा कर सफ़ाई नहीं माँगी जाएगी। यह होमगार्ड के जवान को पुलिस हेडक्वार्टर में परमानेंट पोस्टिंग मिलने जैसा है।
भारत के लिए इस परिषद में आना बहुत ज़रूरी है। यह विश्व शक्ति होने पर संयुक्त राष्ट्र की मुहर होगी। कश्मीर में धारा ३७० का वजूद ख़त्म किए जाने से भारत की दावेदारी कमज़ोर हुई है। कह सकते हैं कि भारत सरकार ने घरेलू मोर्चे की तैयारी भले ही दुरुस्त की हो, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हम चीन से मात खा रहे हैं। पुराने वफ़ादार दोस्त रूस ने दोस्ती निभाई, कश्मीर को द्विपक्षीय मामला क़रार दिया और बाकी के तीन देश न इधर बोले न उधर। बैठक में पाकिस्तान एक बार दफ़ा और हार गया।
पाकिस्तान दुनिया में अलग-थलग पड़ा देश है। उसकी छवि अपरिपक्व राष्ट्र की है जिसका विदेश मंत्री संयुक्त राष्ट्र की ऐसी ही बैठक में प्रस्ताव की प्रति फाड़ चुका है। उस नाचीज़ पाकिस्तान के कहने पर बैठक का होना चिंता का विषय है। कारण यह कि इससे कम से कम कश्मीर पर अंतराष्ट्रीय चर्चा की पाकिस्तानी मंशा तो पूरी हुई।
यह स्पष्ट है कि अक्साई चीन, तिब्बत, अरुणाचल प्रदेश और डोक़लाम पर भारत से सीमा विवाद के चलते चीन कभी भी भारत का साथ नहीं देगा। ऊपर से पाकिस्तान ने उसे पीओके में सिल्क रूट बनाने की रिश्वत अलग दे रखी है।
आज के पाकिस्तान की पूरी ताक़त ही चीन है, संयुक्त राष्ट्र भी यह जानता है। चीन पाकिस्तान को ‘गुप्त दान’ करता रहता है, हथियारों की खेप भी जिसका हिस्सा है। युद्ध की स्थिति में चीन पाकिस्तान के साथ जाएगा।
भारत को चीन के साथ “नेहरु नीति” पर काम करना बंद करना होगा। नेहरु को कोसने वाली भाजपा सरकार की विदेश नीति पूर्ववर्ती तमाम सरकारों की तरह नेहरु से अलग नहीं है।
भारत के लिए अभी अच्छा यह है कि अभी अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार चल रहा है। भारत को इसका फ़ायदा उठाना चाहिए। हमें चीन से व्यापारिक रिश्तों पर लगाम कसनी होगी। आप चीन के राष्ट्रपति को कितना भी झूला झुला लें, वो पाकिस्तान को गोद से नहीं उतारेंगे। चीन अपने व्यापार की ताक़त से सहयोगी देशों को कश्मीर मामले में भारत के ख़िलाफ़ खड़ा कर सकता है।
एक बात और, इस मसले पर पाकिस्तान को पहला समर्थन टर्की ने दिया था, वही टर्की जिसने कुछ साल पहले रूस का लड़ाकू विमान अपनी सीमा के पास गिराया था।
अगले गणतंत्र दिवस पर रूस के समर्थन के लिए भारत को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन को विशेष सम्मान से नवाज़ना चाहिए क्योंकि रूस से चीन के मज़बूत रिश्ते हैं। चीन आर्थिक रूप से लड़खड़ाते रूस को हथियार ख़रीदकर मदद भी पहुँचा रहा है। इसके बावजूद रूस का चीन को किनारे रख भारत को समर्थन विशेष मित्रता का सबूत है। इससे पता चलता है कि डोनल्ड ट्रम्फ़ और शी जिन पिंग से पुतिन मीलों आगे की साफ़ नीति वाले राष्ट्राध्यक्ष हैं। वे ट्रम्फ़ औ जिन पिंग की तरह बाज़ार के दलाल का व्यवहार नहीं करते।
भारत को अब “रूस इज़ बेस्ट फ़्रेंड” की नीति पर लौटना होगा।

– अताह

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