गांधीवादी परिप्रेक्ष्य में स्त्री विमर्श

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सुरज और चंद्रमा प्रकृति के अनुशासन से बंधे हैं। दोनो अपना अपना एक व्यक्तित्व रखते हैं, एक दुसरे से जुड़े हुए हैं पर एक दूसरे के व्यक्तित्व को बनाए रखते हैं। यह संतुलन ही प्रकृति को बनाए रखती है। इसी तरह स्त्री_पुरूष भी मानवीय जीवन के संतुलन के दो पक्ष होते हैं, एक दुसरे के सहधर्मी पर वास्तव में स्त्री को देवी कहकर उसके स्व से भी अलग कर दिया जाता है। शायद इसीलिए कहा है कि_
नारी तू है देवी,
ये तेरा दर्द है।
बचना तू जमाने से,
ये जमाना बड़ा बेदर्द है॥
नारी का देवी होना अपनेआप मे विसंगति है, उसे मानव न मानकर अतिमानव के घेरे में कैद कर दिया जाता है। गांधीजी ने भी एक बार महिला विसंगतियों के विषय में कहा था कि “हमारे समाज में कोई सबसे अधिक हताश हुआ है तो वे स्त्री ही हैं और इस वजह से हमारा अध: पतन भी हुआ है। स्त्री-पुरुष के बीच जो फर्क प्रकृति के पहले है और जिसे खुली आँखों से देखा जा सकता है, उसके अलावा मै किसी किस्म के फर्क को नहीं मानता । गांधी जी ने स्त्रियों को आजादी की लड़ाई मे शामिल कर जन आंदोलन परंपरा का श्री गणेश किया। साथ ही आश्रम में उनको समान हक व स्वतंत्रता प्रदान कर समाज में स्त्रियों को गरिमामय जीवन से परिचित कराया , इसकी अच्छी मिसाल हमें उनके जीवन से मिलती है। दरअसल हमें समाज में ऐसा वातावरण निर्माण करना चाहिए कि जिस प्रकार स्त्री घर के कामकाज को पूर्ण आत्म-विश्वास तथा उत्साहपूर्वक करती है उसी तरह समाज के कामकाज में भी साझेदारी करने लगे और स्त्री-पुरुष दोनों स्वाभाविक सह-जीवन का आनंद उठा सकें। आज भी स्त्री के मूल्य को लेकर समाज बहुत ही अज्ञानी है इसलिए कही कही स्त्री का जीवन बहुत ही कष्टदायक एवं दबा हुआ दिखाई देता है तो कहीं अति सशक्तिकरण की मानसिकता अवस्था। शायद इसीलिए आज के सामयिक युग में सशक्तिकरण शब्दावली विवादित हो गई है क्योंकि (सशक्तिकरण) आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की सहभागिता महिलाओं पर अधिक कार्य अथवा भार डाल रही हैं। सशक्तिकरण शब्द में ही अति विवादित शक्ति का सिद्धांत अंतर्निहित है जिसका अलग-अलग होना अलग-अलग अर्थ लेता हैं। ‘सशक्तिकरण का वास्तविक आशय क्या है’ शक्ति पर शक्ति या कुछ लोगों के पास दूसरों को नियंत्रित करने की शक्ति, या अपनी अंतर्निहित शक्ति को जागृत करने के लिए शक्ति, विचार व्यक्त करने की शक्ति, निर्णय लेने की शक्ति जो परिवार, समुदाय अथवा राज्य के बंधनों के बिना अपने लिए अवसरों को अधिकतम बढ़ा सकें वह शक्ति। विकास समग्र होता है, एकाकी नही । जब विकास की प्रक्रिया में समानता तथा सभी मानवों की, स्त्री और पुरुष की सहभागिता के बारे में बहस की जाती है, तो यह और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि हम जीव विज्ञान के सामाजिक आशयों के प्रति उदासीन न हो जाएँ और न ही इसके द्वारा महिलाओं के प्रति। महिला विकास का एक महत्वपूर्ण घटक है। किसी भी देश के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक एवं नैतिक विकास में महिलाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है।

गाँधी जी इस सत्य से पूरी तरह अवगत थे और इसीलिए गांधी जी का मानना था कि विकास की धारा से यदि स्त्रियों को जोड़ा नही गया तो विकास की परिकल्पना कभी साकार नहीं ही सकेगी। यंग इंडिया में स्त्रियों के अधिकारों पर बल देते हुए लिखा था कि “स्त्रियों के अधिकारों पर के सवाल पर मैं किसी तरह का समझौता नहीं कर सकता। मेरी राय में उन पर ऐसा कोई क़ानूनी प्रतिबन्ध नहीं लगाना चाहिए जो पुरुषों पर न लगाया गया हो। पुत्रों और कन्याओं में किसी तरह का भेद नहीं होना चाहिए। उनके साथ पूरी समानता होनी चाहिए।”। इस विचारों को गांधी जी ने सैद्धांतिक रूप में रखा नहीं बल्कि अपने व्यवहार में भी इस का कार्यान्वयन किया है इसके उदाहरण अभी भी आश्रम के रूप में जीवित हैं।
गांधाजी मैला ढोने वाली महिला को अभ्युत्थान की प्रथम कडी कहते है जो समाज की शक्ति के साथ पुरुष की सही अर्थो में सहयोगी बनने का प्रथम प्रयास करती है । मनुष्य के किसी भी कार्यक्षेत्र में भाग लेने वाली महिलाओं को अपना अभ्युत्थान करने का अधिकार है। इसीलिए व्यक्तित्व के उन्नयन का अवसर भी समान रूप से मिलना चाहिए। गांधी जी राजनीतिक सहभागिता के लिए भी नारी को अवसर देने मे विश्वास करते हैं। “स्त्रियों को मताधिकार तो होना ही चाहिए। उन्हें कानून के तहत समान दर्जा भी मिलना चाहिए।” संविधान के तहत “स्त्री-पुरुष के बीच किसी भी मामले में भेदभाव नहीं बरता जा सकेगा। आज जो कुछ राजनीतिक क्षेत्र में उपलब्धि हो पायी है उसका अधिक श्रेय गांधी जी को जाता है। गांधी जी के मानस-पटल में यह बात स्पष्ट थी कि “महिला सशक्तिकरण केवल नैतिक अनिवार्यता नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक परम्पराओं को सुदृढ़ करने तथा अन्याय व उत्पीडन के खिलाफ संघर्ष करने की पूर्व शर्त भी है। गांधीजी ने जिस बात का स्वप्न देखा था, वह अधिकारों, समान अवसर और समान भागीदारी वाली अधिक न्यायोचित और मानवीय दुनिया की दिशा में की जा रही है यात्रा का एक कदम भर है। क्योंकि जब किसी महिला का विकास होता है तो उसके परिवार-समाज का भी विकास होता है क्योंकि परिवार-समाज के विकास की दिशा पर ही प्रदेश, देश एवं विदेशों को लाभ मिलना संभव है। इसीलिए जब तक महिलाएँ सशक्त नहीं होंगी तब तक मानवता के इस बड़े हिस्से के पक्ष में महात्मा गाँधी के संघर्ष को अंजाम तक नहीं पहुँचाया जा सकता है। शिक्षा एक ऐसा क्षेत्र है जिसके लिए पूरी दुनिया में जोरदार अभियान चलाने की जरूरत है क्योंकि विश्व का एक बड़ा हिस्सा आज भी शिक्षा के अधिकार से वंचित है। शिक्षा के विषय पर गांधी के विचार पूर्णतः स्त्री शिक्षा के आग्रही थे।
सत्य एवं अहिंसा को आधार बनाकर नवीन विश्व-चेतना की योजना में जितना अधिकार पुरुष का है उतना ही अधिकार स्त्री का भी है।” अहिंसक समाज स्त्री एवं पुरुष दोनों के कर्तव्यों की सात्विक रचना हो सकती है। आदर्श विश्व-व्यवस्था में सामाजिक आचार- व्यवहार के नियम स्त्री और पुरुष दोनों आपस में परस्पर रजामंदी से तय करे और “स्त्री पुरुष परस्पर साथिन के रूप में एक दूसरे के सहयोगी बने न कि सशक्तिकरण के नाम पर प्रतिस्पर्धा करें। पुरुष की प्रवृत्तियों, उन प्रवृत्तियों के प्रत्येक अंग और उपांग में भाग लेने का अधिकार हो और स्त्री पुरुष अपनी प्रवृत्ति के क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान का अधिकारी मानें जाए , जो अपनी अपनी क्षमता
के अनुरूप अंतनिर्हित शक्ति को जागृत कर सके और मानवीय संभावनाओं का विकास कर सके।

– डॉ.भावना शर्मा
झुंझुनूं, राजस्थान
bsharma.jjn@gmail.com

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