गणतंत्र दिवस पर आओं करें पुण्यानुमोदन उनका जिनसे मिला हमें गणतंत्र

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अधिकांश राजनीतिक विचारकों का मानना है कि विश्व में सर्वप्रथम लोकतंत्र विशेषकर प्रत्यक्ष लोकतंत्र का सक्रिय रूप छठी-पाँचवी शताब्दी सामान्य युग से पूर्व प्लेटो तथा अरस्तू से पूर्व के काल में यूनानी नगर-राज्यों विशेषकर एथेंस में विद्यमान था। इन नगर राज्यों में राजनीतिक रूप से सक्रिय मानव समान सहभागिता, स्वतंत्र वाद-विवाद, प्रचलित कानून परम्पराओं के पालन पर बल देते थे।

पाश्चात्य विद्वानों का दृष्टिकोण सर्वदा स्वयं को श्रेष्ठ तथा प्रथम बताने का रहता है। यह मत भ्रामक प्रतीत होता है कि लोकतंत्र सर्वप्रथम ग्रीक में था। लोकतंत्र के प्रारंभिक सूत्र प्राचीन भारत में दृष्टिगत होते हैं। भारतीय वाङ्मय की बौद्ध परम्परा के साहित्य अर्थात् त्रिपिटक के अध्ययन से तत्कालीन समय में दस गणराज्यों में प्रचलित प्रजातांत्रिक शासन पद्धति का ज्ञान होता है। डब्ल्यू. टी. रीज डेविड्स ने अपने ग्रंथ “बुद्धिस्ट इण्डिया” (Buddhist India, p. 13-14) में इन गणराज्यों के नाम इस प्रकार बताए हैं-

1. कपिलवस्तु के शाक्य
2. सुंसुमारगिरि के भग्ग
3. अलकप्प के बुलि
4. केसपुत्त के कालाम
5. रामगाम के कोलिय
6. कुशीनारा के मल्ल
7. पावा के मल्ल
8. पिप्पलीवन के मोरिय
9. मिथिला के विदेह
10. वैशाली के लिच्छवि

वर्तमान संसदीय प्रणाली की तरह प्राचीनकाल में इन गणराज्यों में परिषदों का निर्माण किया जाता था। लिच्छवि की केंद्रीय परिषद् में 5000, यौधेय की परिषद् में 7707 सदस्य थे। गणराज्य की नीतियों का संचालन नियमित रूप से इन्हीं परिषदों द्वारा होता था।

किसी भी मुद्दे पर निर्णय होने से पहले सदस्यों में खुलकर चर्चा होती थी। सत्य अथवा असत्य का आकलन करने के लिए विपक्ष द्वारा जोरदार बहसबाजी की जाती थी। तत्पश्चात् सर्वसम्मति से, कभी-कभी बहुमत से निर्णय लिए जाते थे। बहुमत की प्रक्रिया को भूयिसिक्किम तथा वोट को छन्द कहा जाता था। निर्वाचन आयुक्त की भांति देखरेख करने वाला एक व्यक्ति होता था, जिसे शलाकाग्राहक कहते थे। वोट देने की तीन प्रणालियाँ प्रचलन में थी-

1. गूढक अर्थात् अपना वोट किसी पत्र पर लिखकर जिसमें उसका अर्थात् वोटर का नाम न लिखा हो।
2. विवृतक अर्थात् खुले आम अपने विचारों की घोषणा करना।
3. संकर्णजल्पक अर्थात् पक्ष में धीमे स्वर में कान में जाकर कहना।

शलाकाग्राहक पूरी ईमानदारी तथा मुस्तैदी से इन वोटों का हिसाब करता था। ऐसी कार्यवाही नियमित होती थी, जैसे वर्तमान समय में संसद के विभिन्न सत्र चलते हैं।

1857 ईस्वी के विद्रोह के बाद भारत के लोगों में विदेशी सत्ता से लड़ने का जज्बा तो था, किन्तु यहाँ की जनता परस्पर विभिन्न धर्मों तथा जातियों में विभाजित थी। अधिकांश राष्ट्रवादी व्यक्तियों ने धर्म का सहारा लेकर लोगों को एकत्रित करना चाहा, जिसने जाने-अनजाने भारत को विभाजित करने वाले सांप्रदायिक तत्त्व तथा जातीय कट्टरताओं के बीज बो दिए, जो समकालीन भारत में विष वृक्ष के रूप में फैल चुके हैं। भारत में आजादी की लड़ाई का नेतृत्व कर रहे अधिकांश व्यक्ति माध्यमिक स्तर तक भारत के ही स्कूलों में संस्कृत अथवा फारसी भाषाओं से पढ़े हुए था। कुछ अंग्रेजी माध्यम से भी पढ़े थे, किन्तु धार्मिक रूप से कट्टरता का उन्होंने त्याग नहीं किया। वे धर्म के अधिकारियों द्वारा की गई गलतियों को स्वीकार नहीं करना चाहते थे, अपितु विभिन्न उत्सव तथा पर्वों को प्रारंभ करके भारतीय जनता को प्राचीनता की ओर धकेल रहे थे।

ऐसे समय ज्योतिबा फुले, डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर, पेरियार, नारायण गुरू प्रभृति समाज सुधारको ने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वासों, धार्मिक संकीर्णताओं, कुरीतियों इत्यादि को दूर करने के लिए महतीय प्रयास किए, जिसके फलस्वरूप भारत में सामाजिक क्रांति का जन्म हुआ। चूंकि जनतंत्र का सीधा संबंध जनता से है, अतः विभिन्न समूहों में बंटी हुई भारतीय जनता को जोड़ने के लिए प्रजातंत्र की आवश्यकता पर बल दिया गया।

बाबासाहेब अम्बेडकर ने प्रजातंत्र की सारभूता परिभाषा देते हुए बताया है कि प्रजातंत्र मानवीय जीवन का संगठित रूप है। प्रजातंत्र की जड़े हमें मनुष्य के सामाजिक संबंधों में ढूढ़नी चाहिए- उन व्यक्तियों के संगठित जीवन में, जो समाज का निर्माण करते हैं। (डॉ. अम्बेडकर का समाज दर्शन, पृ. 115) समता एवं एकत्व की भावनाओं को बढ़ावा देना ही प्रजातंत्र का मूल आधार है। (Annihilation of cast, p. 38-39)

भारतीय शासन व्यवस्था में लोकतंत्र की संवैधानिक व्यवस्था होने के पश्चात् कई बार लोकसभा चुनाव हुए। कई बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। किन्तु भारत में लोकतंत्र के नाम पर सत्तारूढ़ अधिकांश सरकारों ने भय का सहारा लेकर शासन चलाया है। यदि अमुक दल की सरकार आ गई तो ये हो जाएगा, अमुक दल की आ गई तो अमुक वर्ग आगे आ जाएगा, किंतु सत्य तो ये है कि यह सब कुछ सत्ता प्राप्ति के हथियार हैं। भय को भारतीय शासन व्यवस्था में कारगर रूप में स्वीकार किया गया है। वैसे भय सदियों से हमारे देश में विद्यमान रहा है। कभी धर्म के नाम पर ईश्वर का भय, समाज के नाम पर भाग्य का भय, राज्य के नाम पर कानून का भय दिखाकर यहाँ राज्य पहले भी किया गया है तथा वर्तमान में भी चल रहा है।

भारतीय संविधान के पारित होने पर डॉ. अम्बेडकर ने कहा था, “26 जनवरी 1950 को हम विरोधाभासों से भरे जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति के मामले में हमारे यहाँ समानता होगी पर आर्थिक और सामाजिक जीवन असमनातओं से भरा होगा। राजनीति में हम ‘एक व्यक्ति एक वोट’ और ‘हर वोट का समान महत्त्व’ के सिद्धांत को मानेंगे। अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में कब तक समानता को नकारते रहेंगे? अगर यह नकारना ज्यादा लंबे समय तक चला तो हम अपने राजनैतिक लोकतंत्र को ही संकट में डालेंगे। (लोकतांत्रिक राजनीति, पृ. 53)”

आधुनिक साहित्याचार्यो के द्वारा उत्तर-संरचनावाद शब्द प्रयोग किया जाता है, जो किसी भी बनी बनाई संरचना को तोड़ता है। किन्तु कुछ पुरातनपंथी अपने गिसे-पिटे मूल्यों को छोड़ना ही नहीँ चाह रहे हैं, बाकी जो है सो है।

भारतीय सन्दर्भों में बाबासाहेब अम्बेड़कर आधुनिकता के जनक हैं। वे परम्परा को तोड़ते हैं तथा समतावादी मूल्यों पर आधारित राज्य एवं समाज व्यवस्था का निर्माण करते हैं। बुद्धकालीन गणराज्यों से हमने गणतंत्र सीखा, उन्हें पुण्यानुमोदन करें। जिसकी वजह से भारत को गणतंत्र मिला, उस महापुरुष से भारत को रूबरू करवाएं। जिसके त्याग और बलिदान से आज हम 26 जनवरी मना रहे हैं, उस स्वतन्त्र भारत के पितामह और आधुनिक भारत के निर्माता बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर का हम गणतंत्र दिवस पर पुण्यानुमोदन करें। आप सभी को गणतंत्र दिवस की मंगलकामनाएं।

(लेखक: डॉ. विकास सिंह, विभागाध्यक्ष, संस्कृत विभाग, मारवाडी महाविद्यालय, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, बिहार; स्थाई निवासी- ग्राम पीपला, भरतपुर, राजस्थान)

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