क्षमा,अहिंसा और मैत्री का प्रतीक पर्युषण पर्व

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विविध धर्मो को एक पुष्प गुच्छ के रूप मे संजो कर रखने वाला देश भारत वर्ष है और यहाँ की विराट संस्‍कृति मे सभी धर्म की शिक्षाएं इस कदर समाहित होती है कि प्रत्‍येक भारत वासी अपने आपको किसी भी धर्म से अलग कर ही नही पाता है। आज बात कर रहे है हम जैन धर्म के पर्युषण पर्व के आखिरी दिन अर्थात् क्षमावाणी दिवस की । ज्ञातव्‍य है कि क्षमा, अहिंसा और मैत्री का पर्व है संवत्सरी। संवत्सरी पर्व पर जैन धर्मावलंबी जाने-अनजाने हुई गलतियों के लिए एक-दूसरे से क्षमा मांगते हैं। ध्‍यातव्‍य है कि जैन धर्म के श्वेतांबर पंथ में पर्युषण पर्व संपन्न हुए हैं और आज का दिन क्षमावाणी दिवस मनाया जा रहा है। पर्युषण पर्व के अंतिम दिन क्षमावाणी दिवस पर सभी एक-दूसरे से ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ कहकर क्षमा मांगते हैं, साथ ही यह भी कहा जाता है कि मैंने मन,कर्म वचन, से जाने-अनजाने आपका दिल दुखाया हो तो मैं हाथ जोड़कर आपसे क्षमा मांगता हूं अथवा मांगती हूँ ।
जैन धर्म के अनुसार ‘मिच्छामी’ का भाव क्षमा करने और ‘दुक्कड़म’ का आशय गलतियों से है अर्थात मेरे द्वारा जाने-अनजाने में की गईं गलतियों के लिए मुझे क्षमा कीजिए। आशा की जाती है कि क्षमादान महादान होता है,और आज के दिन हर उपेक्षित व्यक्ति को क्षमाकर दिल मे स्‍थान दिया जाता है।

*आचार्य महाश्रमण* के अनुसार- क्षमायाचना से चित्त में अाह्लाद का भाव पैदा होता है और आह्लाद भावयुक्त व्यक्ति मे मैत्री भाव उत्पन्न कर लेता है और मैत्री भाव प्राप्त होने पर व्यक्ति भाव विशुद्धि कर निर्भय हो जाता है। हम सभी का जीवन में अनेक व्यक्तियों से सम्पर्क होता है तो कटुता भी वर्ष भर के दौरान आ जाती है। व्यक्ति को कटुता आने पर उसे तुरंत ही मन में साफ कर देनी चाहिए और संवत्सरी पर अवश्य ही साफ कर लेना चाहिए। मन को साफ करने और दोषी को माफ करने का बडा ही दिन होता है क्षमावाणी दिवस का,जो मन की मलीनता को बडे ही सहज भाव से धो डालती है ।
शाब्दिक दृष्‍टि से अगर हम व्‍याख्‍या करे तो *’मिच्छामी दुक्कड़म’* प्राकृत भाषा का शब्द है। प्राकृत भाषा में काफी जैन ग्रंथों की रचना ही हुई है। पर्युषण महापर्व जैन धर्मावलंबियों में आत्मशुद्धि का पर्व है। इस तरह पर्युषण पर्व आत्मशुद्धि के साथ मनोमालिन्य दूर करने का सुअवसर प्रदान करने वाला महापर्व है।
इस दौरान लोग पूजा-अर्चना, आरती, समागम, त्याग-तपस्या, उपवास आदि में अधिक से अधिक समय व्यतीत करते हैं। इस पर्व का आखिरी दिन क्षमावाणी दिवस के रूप में मनाया जाता है जिसमें हर किसी से ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ कहकर क्षमा मांगते हैं। पर्युषण पर्व के आखिरी दिन ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ कहने की परंपरा है। इसमें हर छोटे-बड़े सभी परस्‍पर ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ कहकर क्षमा मांगते हैं। आज के दिन इस पर्व की महत्ता को समझते हुए हम सभी से जाने अनजाने हुए अपराध की क्षमा मांगकर महामानव के दिवास्‍वप्‍न को साकार करके इस पर्व की प्रासंगिकता बनाए रखते है,क्योंकि हमारे अंतस मे जैन धर्म भी समभाव रूप मे समाहित है। *मिच्‍छामी दुक्‍कडम* सभी जाने अनजाने अपराध के लिए और सभी के दिलो मे सद्‍प्रेम की उदात्तभावना के लिए।

-डाॅ.भावना शर्मा
झुंझुनू,राजस्थान ।

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