कोरोना लॉक डाउन को अवसरवाद नहीं एकजुटता का पर्व बनाएं

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कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते हुए आज हमारे देश में 21 दिन के लॉक डाउन की घोषणा की गई है और आज हम सब खुद असमंजस की स्थिति में आपस में एक दूसरे को दिलासा दे रहे हैं I सर्व विदित है कि इतना आसान भी नहीं है एक चारदीवारी के बीच में इक्कीस दिन बिताना, परंतु गत दिनों के प्रचार-प्रसार ने इतना तो बता ही दिया है कि अगर जीना है तो निज आवास रहना ही होगा। आज पूरे भारत में एक ही चर्चा का विषय है कि यह समय किस प्रकार गुजरेगा पर लोगों के दिमाग में यह सुकून है कि कम से कम उनके परिवार के सारे सदस्य आज एक साथ तो हैं हास्पिटल जाने से अच्छा निज आवास का एकांत ही है। हालांकि कुछ परिवारों में अपने उन लोगों के लिए एक चिंता एक व्याकुलता है, जो उनके बीच नहीं हैं बल्कि इसी दुनिया के किसी और कोने में अटके हुए हैं I आज संकट के इस दौर में परिवार की पूरी अवधारणा चरितार्थ हो रही है कि सुख में एक साथ और दुख में हमसफर I हमारे परिवारों में बहुत से छोटे बच्चे हैं जिन्हें इतने दिन के लिए अंदर बिठाए रखना एक बहुत बड़ी चुनौती है पर क्या यह नहीं लगता कि कितने समय बाद हम बच्चों को घर में खेलते कुदते देख रहे हैं हालांकि घर में ही पर आज उनकी अभिरुचि के साथी बनने का मौका मिला है। परिवारों में बुजुर्ग लोगों का सानिध्य भी काफ़ी समय बाद मिला हैं उन्हें भी आज का यह मंजर देखकर हैरानी भी हो रही है और सुकून भी कि उनके बच्चे घर में महफूज़ है। हालांकि इक्कीस दिन के लाकअप के श्यामल पक्ष भी है। जिन घरों में कोई ना कोई बीमार है या जिनके घरों में कोई गर्भवती औरत है, उनके हैरान परेशान होने के बारे में अंदाजा बेहद कष्टकारी है I बस्ती के कुछ परिवार ऐसे भी थे जिनके पास ठीक-ठाक पैसा था और जिनके पास सूचना भी समय पर पहुंच गई थी तो उन्होंने समय रहते ही कुछ सामान रसोई के लिए जोड़ लिया था, वही बेचारे कुछ परिवार ऐसे भी थे उनके पास पैसा था पर सूचना देर से आई ; कुछ ऐसे थे सूचना का करते भी क्या क्योंकि हाथ में एक पैसा भी नहीं था पर क्या नहीं लगता कि यह समय इंसानियत की परीक्षा का है तेरे पास चावल है मेरे पास दाल और दोनों आधा आधा बाट ले तो दाल भात दोनों परिवार खा लेंगे शायद पुराने दौर की सुनहरी खासियत की याद दिलाने आया है ये वक्त।
हालांकि स्टेटस के छद्म दौर में खुश तो कोई भी नहीं है पर इस संकट को देखते हुए और अपने बच्चों के चेहरे पर खुशी रखने के लिए तसल्ली दिखानी पड़ेगी I क्योंकि अगर बड़े ही हौसला हार जाएंगे तो कम हौसले वालों की जीवंतता बनाए रखना बेहद ही मुश्किल हो जाएगा I हालांकि कई परिवार ऐसे भी हैं जिनमें खाने से भी ज्यादा जरूरी है बीमारों की दवा और दवा भी 7 से 10 दिन से ज्यादा की खरीदना, अगर बस का ना हो तो अगले 21 दिन डरा ही देते हैं I ऐसे में नफा-नुकसान से परे दवा विक्रेताओं के पास भी अवसर है मानवीयता दिखाने का। कुछ लोगों की मुसीबत आज कुछ समय के लिए बिजनेस का बंपर टाइम भी हो सकता है और मानवीय मूल्यों की मिशाल भी I
कोरोना वायरस से चिपक कर बीमार होने का डर हो या भुखमरी से मरने का, दोनों ही स्थितियों में हमें यह मानकर चलना चाहिए कि एक समाज में रहने वाले लोगों को “सुरक्षा चक्र” वाली साधारण सी बात को समझकर ही चलना चाहिए कि सुरक्षा चक्र है और खुद सुरक्षित रहने के लिए पडोसी के सुरक्षित रहने की कामना भी करनी चाहिए ठीक उसी तरह जब हम कहा करते थे कि यदि कोई बच्चा पोलियो की दवा नहीं पिएगा तो बाकी बच्चों को भी पोलियो होने का डर रहेगा, उसी प्रकार से यदि हममें से कोई व्यक्ति कोरोना के समय में अपना ध्यान नहीं रखता है तो वह औरों को भी रोग फैला सकता है। एक व्यक्ति द्वारा की गई लापरवाही से वह अपने आसपास के लोगों के लिए मुसीबत पैदा कर सकता है। कोई जरूरी नहीं है कि इस समय परिवार के सदस्यों की सारी ख्वाहिशें पूरी की जाए जरूरी है मिलकर सुरक्षित रहा जाए। संकट इस समय केवल एक व्यक्ति विशेष का नहीं है अपितु पूरे मानव जगत का है।
आज यह एक ऐसा समय है जब हमें हमारे आसपास के उन सब लोगों की भी परवाह करनी होगी जो किन्हीं भी कारणों से इन परिस्थितियों के लिए तैयार नहीं है
क्योंकि इस बार की परिस्थिति अलग प्रकार की है और यह उन परिस्थितियों से बिल्कुल अलग है जो किसी इलाके में बाढ़ सूखे या दंगों के बाद पैदा होती है, इसलिए अगर इन सब लोगों की भलाई के लिए हम सब लोगों को मिलकर कुछ करना भी है तो उसके लिए हमें बहुत सारी सावधानियां भी बरतनी होंगी जो प्रायः हमें पहले वाली परिस्थितियों में महसूस भी नहीं होती थी I एक दूसरे से समुचित दूरी रखते हुए मानसिक एकजुटता के साथ सामाजिक सरोकार के लिए कुछ त्याग करने की भावना अभी से तैयार करनी होगी वरना ऐसा भी हो सकता है कि हम अभी भी तीन सब्जियों की थाली खा रहे हो और कुछ लोगों के पास सूखी रोटी और नमक भी ना हो I ऐसे में हम कोरोना संकट का सामना नहीं कर पाएंगे। आज आवश्यकता है इस अवधारणा की “पडोसी भी स्वस्थ रहे और अभावग्रस्त न रहे” और सच में इसी कामना के साथ ही हम मानवीय जगत की इस सुंदर रचना की सुरक्षा कर पाएंगे।

– नवीन जैन (आई.ए.एस)
(प्रबंध निदेशक राजस्थान स्टेट रोडवेज ट्रांसपोर्ट कार्पोरेशन जयपुर, राजस्थान)

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