कोरोना महामारी के दौर में कृतज्ञता ज्ञापन उन सभी के लिए जो आपके लिए लगे हुए हैं

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प्रेम जब दो व्यक्तियों से होता हुआ पूरी दुनिया के प्राणियों से मैत्री स्थापित कर ले और दूसरों के दुःख से दुःखी होकर कारुणिक चित्त द्रवित हो उठे, तो समझ लो कि बोधिसत्त्व आज भी आपके बीच में विद्यमान हैं। ये संसार ऐसे ही बोधिसत्त्वों और करुणा की दास्तानों से भरा हुआ है। 5वीं शताब्दी में चीन में कोरोना से भयंकर महामारी फैली थी, जिसे दूर किया था पल्लव राजकुमार जो बाद में बौद्ध भिक्खु बनें बोधिधर्मन ने। उन्होंने रोग-प्रतिरोधक क्षमता को विकसित करने के लिए सप्तस्तरीय कुन्फू को जन्म दिया, धार्मिक पाखंडवाद के स्थान पर चिकित्सकीय आयुर्वेद पद्धति के प्रति लोगों को ज़ागरूक किया और तत्कालीन महामारी से मुक्ति पाई थी। शाओलिन् टैम्पल इसका साक्षी है जिसने दुनिया में कुन्फू की पद्धति को यथावत बनाए रखा हुआ है। भारत सदैव करुणा से पूरित रहा है और समय-समय पर यहाँ से दुनिया को राह दिखाई गई है, इसके पीछे कारण यहाँ का वैज्ञानिक चिंतन और नालन्दा-विक्रमशिला की परम्परा रही है।समय जब करवट लेता है तो इतिहास फिर वहीं खड़ा हो जाता है, जहाँ से हम बहुत आगे चले आते हैं।

“बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो।” – मीर तक़ी मीर

आज फिर से चीन कोरोना नामक एक भयंकर वायरस से ग्रसित हो चुका है जो अब लगभग वैश्विक महामारी में बदल चुका है। अब भारत में बोधिधर्मन नहीं है, क्योंकि बोधिधर्मन निर्माण की परम्परा यहाँ सदियों पहले नेस्तनाबूत की जा चुकी है। तथागत की तथता के सक्ष्यों को मिटाकर पाखंडियों ने अपने धार्मिक अड्डे बना लिए जहाँ केवल परजीवी (पैरासाइट) पनपे हैं, जिन्हें जनकल्याण से कोई मतलब नहीं है।

अस्तु, ऐसे समय में भी विश्व की हवाओं में बुद्ध की करुणा अभी शेष है जो प्रेम और मैत्री के रूप में दिखाई देती है। ऐसा प्रेम जो परार्थ के लिए स्वयं को भी मिटा दे, ऐसा प्रेम जो वासनाओं से दूर दूसरों के दुःखों को दूर करने के लिए तत्पर है, ऐसा प्रेम जो दुनिया के सभी लोगों को स्वयं जैसा ही नहीं अपितु दूसरों को स्वयं से इतर कभी समझ ही नहीं पाता, ऐसा प्रेम जहाँ करुणा से सराबोर हृदय तड़पते हुए लोगों को देखकर खुद तड़प उठता है, ऐसा प्रेम जो स्वयं और परिवार की चिंता किए बगैर सभी को अपना परिवार समझ लेता है।

बोधिसत्त्व कहीं भी, कभी भी हो सकते हैं। बोधिसत्त्व इंसानों के अलावा पशु-पक्षी भी हो सकते हैं। बोधिसत्त्व किसी भी प्राणी के चित्त की एक भावना है जो करुणा के जागृत होने पर जाग जाती है और दूसरों के कल्याण के लिए स्वयं को भूल जाने का एहसास कराती है। ऐसा ही एक फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है जिसमें इटली के दो डॉक्टर्स हैं जो पति-पत्नी भी हैं। इन दोनों ने कोरोना वायरस (कोविड 19) से ग्रसित लगभग 134 लोगों की ज़ान बचाई थी। अपने स्वास्थ्य की परवाह न करते हुए करुणा के उस स्तर पर ये दोनों पहुँच गए कि पता ही नहीं चला कि कब ये भी उसी वायरस से संक्रमित होकर इस दुनिया से चले गए।

स्पेन के बर्सिलोना एयरपोर्ट का यह चित्र बहुत कुछ कहता है। आपका कारुणिक चित्त हमेशा बना रहे और उसे हमें हर समय जागृत करना ही होगा, अन्यथा ये मानवीय सभ्यता कब खत्म हो जाएगी पता भी नहीं चलेगा। इस चित्र को देखकर मुझे महसूस होता है कि एमिलिओ मोरेनत्ति नामक फोटोग्राफर मैं खुद ही हूँ जो कैद कर रहा हूँ इस क्षण को जो करुणा और प्रेम के इतिहास का एक नया आदर्श बन चुका है। मैं साक्षात् उन दोनों की बातें सुन रहा हूँ जहाँ पति कह रहा है, “मुझे पता है कि आज हमारे संक्रमण का आठवां दिन है और हम शायद ही इस संक्रमण से बच पाएं क्योंकि मरीज़ों को देखते-देखते अपने लिए समय का पता ही नहीं चला। परन्तु मुझे खुशी इस बात की है कि तुम हमेशा मेरे साथ थीं, मेरे दिल के पास और मेरी भावनाओं के पास। तुमने कभी भी अपने और परिवार के बारे में नहीं सोचा क्योंकि तुम मेरा हृदय समझ लेती हो। मेरी आँखों को पढ़ लेती हो और जान जाती हो कि हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं? मुझे जीवन के इस अंतिम समय में तुम पर गर्व महसूस हो रहा है।”

पत्नी अपने पति को स्नेह भरी निगाहों से देखती है और कहती है, “मैंने जीवन में जो पाया है वो यही कारुणिक हृदय है। आज मैं खुशी-खुशी तुम्हारें इस एहसास को महसूस करना चाहती हूँ। आज इस क्वारेंटाइन होने के समय मेरी सांसें बस तुम्हारी होना चाहती हैं।”

यही प्रेम है और प्रेम की यही परिभाषा तथागत बुद्ध ने दुनिया को सिखाई है जहां आप सर्वस्व न्यौछावर कर दें दूसरों के कल्याण के लिए और आपका जीवन साथी भी हमेशा आपके साथ बना रहे।

हम कृतज्ञ है इस आदर्श जोड़े के कार्यों के प्रति, महामारी के दौर में उनके द्वारा किए गए प्रयासों के प्रति, स्वत्व को न देखकर परार्थ के लिए प्राण तक गंवाने के प्रति। ऐसे महान डॉक्टर्स और उनके जज्बे को हमारा सलाम।

अब जिम्मेदारी आपकी भी बनती है। अगर आप डॉक्टर्स, नर्सेस, वार्ड बॉयज़, पैथोलॉजिस्ट्स, लैब असिस्टैंट्स, पुलिस, सफाई कर्मचारियों और महामारी के दौर में अन्य विभिन्न सेवाओं में लगे हुए लोगों के प्रति थोडे से भी कृतज्ञ हैं तो लॉकडाउन का पालन कीजिए। घर पर रहकर स्वयं को और अपनों को बचाये रखिए। यही आपका सबसे बड़ा कृतज्ञता ज्ञापन होगा।

– डॉ. विकास सिंह (लेखक बिहार के दरभंगा में स्थित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय की अंगीभूत ईकाई मारवाड़ी कॉलेज़ में संस्कृत विभागाध्यक्ष हैं।)

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