ओजोन : पृथ्वी का सुरक्षा चक्र

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प्रकृति के असंतुलित दोहन से आज ओजोन परत में ओजोन गैस की मात्रा घट रही है, पृथ्वी को इस असंतुलन से बचाने के लिए आज संपूर्ण विश्व ओजोन दिवस या ओजोन परत संरक्षण दिवस 16 सितंबर को पूरी दुनिया में मनाने जा रहा है। मनुष्य को धरती पर अपने अस्तित्व के लिए प्रकृति के साथ काफी संघर्ष करना पड़ा है। मानव प्रजाति ने हजारों साल के अगाध प्रयास से प्रकृति से सामंजस्य बनाकर अपने जीवन की रक्षा की है। विकास की इस प्रक्रिया में लंबा समय तय करके भी अति की अंधी दौड़ में आज खुद ही प्रकृति के कार्यों में हस्तक्षेप कर इंसान ने खुद को प्रकृति के सामने ला खड़ा किया है। मनुष्य अपनी असीमित वासना की पूर्ति के लिए वनों की कटाई, पहाड़ों की चट्टानों को डायनामाइट लगाकर उड़ाने को विकास का नाम देता है और आज इसी दोहन ने मनुष्य और प्रकृति, वायुमंडल के बीच एक असंतुलन पैदा कर दिया है। प्रौद्योगिकी के इस युग में इंसान हर उस चीज का हरण कर रहा है जो उसकी प्रगति की राह में रोड़ा बन रही है। ओजोन परत के इसी महत्त्व को ध्यान में रखते हुए पिछले दो दशक से इसे बचाने के लिये कार्य किये जा रहे हैं।23 जनवरी 1995 को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में पूरे विश्व में इसके प्रति लोगों में जागरुकता लाने के लिये 16 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय ओजोन दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव पारित किया था। उस समय यह लक्ष्य रखा गया कि 2010 तक हम पूरे विश्व को ओजोन सुरक्षा के लिए जागरूक कर देंगे। लेकिन लक्ष्य के छह वर्ष बीत जाने के बाद भी हम उस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकें हैं। आज पूरा विश्व ओजोन के संरक्षण के लिये संवेदनशील है। आज सबसे पहला प्रयास है कि आम व्यक्ति भी ओजोन परत को जानें। ओजोन वास्तव में एक हल्के नीले रंग की गैस होती है जो ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनती है और यह गैस वातावरण में बहुत कम मात्रा में पायी जाती है। ओजोन परत सामान्यत: धरातल से 10 किलोमीटर से 50 किलोमीटर की ऊंचाई के बीच पायी जाती है. वायुमंडल के समताप मंडल क्षेत्र में ओजोन गैस का एक झीना सा आवरण जिसमें वायुमंडल के आयतन के संदर्भ में ओजोन परत की सांद्रता लगभग 10 पीपीएम है। यह ओजोन परत पर्यावरण का रक्षक है।इसकी सघनता 10 लाख में 10 वां हिस्सा है। यह गैस प्राकृतिक रूप से बनती है। जब सूर्य की किरणें वायुमंडल से ऊपरी सतह पर ऑक्सीजन से टकराती हैं तो उच्च ऊर्जा विकिरण से इसका कुछ हिस्सा ओजोन में परिवर्तित हो जाता है साथ ही विद्युत विकास क्रिया, बादल, आकाशीय विद्युत एवं मोटरों के विद्युत स्पार्क से भी ऑक्सीजन ओजोन में बदल जाती है। यह गैस सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों से मनुष्य और जीव-जंतुओं की रक्षा करने का काम करती है। ज्ञातव्य है कि सूर्य से आने वाली सभी पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर पहुंच जाएं तो पृथ्वी पर सभी प्राणी कैंसर से पीड़ित हो जायेंगे और पृथ्वी के सभी पेड़ पौधे नष्ट हो जायेंगे। लेकिन सूर्य विकिरण के साथ आने वाली पराबैगनी किरणों का लगभग 99 फीसदी भाग ओजोन मंडल द्वारा सोख लिया जाता है। जिससे पृथ्वी पर रहने वाले प्राणी वनस्पति तीव्र ताप व विकिरण से सुरक्षित बचे हुए हैं और इसीलिए ही ओजोन मंडल या ओजोन परत को सुरक्षा कवच कहते हैं। ओजोन को नुकसान पहुंचाने में सुविधाभोगी जीवन मे काम आने वाली वस्तुएं यथा मुख्य रूप से रेफ्रिजरेटर व वातानुकूलित उपकरणों में इस्तेमाल होने वाली गैस, क्लोरोफ्लोरो कार्बन और हैलोन हैं।यह गैसें ऐरोसोल में तथा फोम की वस्तुओं को फुलाने और आधुनिक अग्निशमन उपकरणों में प्रयोग की जाती हैं।यही नहीं, सुपर सोनिक जेट विमानों से निकलने वाली नाइट्रोजन ऑक्साइड भी ओजोन की मात्रा को कम करने में मदद करती है। मनुष्य यदि समय रहते जागरूक नहीं होता है तो ओजोन परत में क्षरण की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, मानव जीवन तबाह हो जाएगा। ओजोन के क्षरण के कारण मनुष्य और जीव-जंतुओं में त्वचा-कैंसर की दर बढ़ने के साथ-ही-साथ त्वचा में रुखापन, झुर्रियों से भरा चेहरा और असमय बूढ़ा, मनुष्य तथा जंतुओं में नेत्र-विकार विशेषकर मोतियाबिन्द, रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता का अभाव हो जाएगा।सिर्फ मनुष्य जीवन ही नहीं यह हमारे पेड़-पौधों के साथ ही वनस्पतियों पर भी व्यापक असर डालेगा। सूर्य के पराबैंगनी विकिरण वृद्धि से पत्तियों का आकार छोटा हो सकता है।बीजों के अंकुरण का समय बढ़ा सकती हैं।यह मक्का, चावल, सोयाबीन, मटर गेहूं, जैसी फसलों से प्राप्त अनाज की मात्रा कम कर सकती है। फिलहाल, पूरे विश्व में ओजोन परत के संरक्षण को लेकर जागरुकता बढ़ रही है। रसायनों एवं खतरनाक गैसों के उत्सर्जन को कम करने की पुरजोर कोशिश करनी होगी क्योंकि विश्व समुदाय इस खतरे पर वैज्ञानिक ढंग से निराकरण नहीं कर पाएगा तो आने वाले दिन हमारे लिए बेहद खतरनाक साबित होंगे। फिर भी वैज्ञानिकों को अनुमान है कि यदि हम ओजोन पर संरक्षण की प्रतिबद्धता पर अनवरत काम करते रहें और जन सहभागिता मिलती रही तो 2050 तक हम इस समस्या को हल कर सकते है।


– डॉ.भावना शर्मा
झुंझुनूं, राजस्थान।
bsharma.jjn@gmail.com

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