ऑन लाइन एजुकेशन ,छात्रों के पास नहीं है पाठ्यक्रम संबंधी पुस्तकें,स्मार्ट मोबाइल फोन, इंटरनेट की सुविधा भी नहीं

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केशव महाविद्यालय में आम आदमी पार्टी के छात्र संगठन सीवाईएसएस यूनिट द्वारा महाविद्यालय के अंदर ऑन लाइन शिक्षा तथा दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंदर सामाजिक न्याय की लड़ाई विषय पर लाइव सेशन का आयोजन किया गया।इस लाइव सेशन में मुख्य वक्ता आम आदमी पार्टी के शिक्षक विंग के प्रभारी प्रोफेसर हंसराज ‘सुमन ‘ व कार्यक्रम का संचालन श्री कमल तिवारी, श्री शाश्वत जायसवाल ,व्योम बिरला के अलावा श्री आशु विधूड़ी ने किया।

लाइव सेशन में बोलते हुए डीटीए प्रभारी प्रोफेसर हंसराज ‘सुमन ‘ ने कहा कि ऑन लाइन शिक्षा वर्तमान में कितनी उपयोगी और सार्थक है इसके लिए छात्रों के बीच जाकर फीडबैक के माध्यम से एक महीने का डाटा तैयार करे जिससे यह पता लगाए कि कितने प्रतिशत छात्र ऑन लाइन कक्षा ले पा रहे हैं।उन्होंने बताया कि सभी छात्र कक्षा नहीं ले पा रहे हैं।उसका कारण स्मार्टफोन, इंटरनेट, वाईफाई, लेपटॉप, डाटा कनेक्शन, कम्प्यूटर आदि की सुविधाएं ना होना है।इन सुविधाओं से उन वर्गो के छात्र ज्यादा वंचित हैं जो अनुसूचित जाति/जनजाति, पिछड़े वर्गों के अलावा विक्लांग छात्र ज्यादा प्रभावित है।वे ऐसे क्षेत्रों से आते हैं जहां बिजली व इंटरनेट की सुविधाएं कतई संभव नहीं है।

प्रोफेसर सुमन ने बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय का नया शैक्षिक सत्र –2020–21 कोविड–19 के चलते इस वर्ष तीन सप्ताह विलंब से शुरू हुआ है।फिलहाल अभी तीसरे और पांचवें सेमेस्टर की कक्षाएं लग रही है।इसके अंतर्गत द्वितीय व तृतीय वर्ष के छात्रों की कक्षाएं शिक्षकों द्वारा ऑन लाइन एजुकेशन के माध्यम से ली जा रही है।इन कक्षाओं में छात्रों की उपस्थिति 40 से 50 फीसदी है।जो छात्र कक्षा ले रहे हैं उनके पास अध्ययन सामग्री का अभाव है।छात्रों के पास ना तो सलेब्स, पुस्तकें भी नहीं है। एक घन्टे की कक्षा में शिक्षक पढ़ा रहे हैं और छात्र मात्र सुन पा रहे हैं।पुस्तकों व अध्ययन सामग्री के अभाव में छात्रों की उपस्थिति बहुत कम है।

प्रोफेसर हंसराज सुमन ने अपने संबोधन में छात्रों को बताया कि कॉलेजों में ऑन लाइन एजुकेशन की कक्षाएं पिछले एक महीने से शुरू हो चुकी है लेकिन कक्षाओं में आ रहे छात्रों के फीडबैक से पता चला है कि सभी छात्र कक्षा नहीं ले रहे हैं।इन कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र ज्यादातर दिल्ली से बाहर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा , जम्मू कश्मीर, गुजरात, हिमाचल प्रदेश ,उत्तराखंड, मेघालय, आसाम, गोवा आदि प्रदेशों से है उनके यहां इंटरनेट की सुविधाएं नहीं है या वे ऐसे क्षेत्रों से आते हैं जहां इंटरनेट की सुविधा ,बिजली बहुत कम आती है।वहीं लॉक डाउन के चलते पुस्तकालयों और पुस्तकों की दुकानों तक छात्रों की पहुंच नहीं बन पा रही है। उनका कहना है कि ऐसी स्थिति में विश्वविद्यालय, कॉलेज और शिक्षण संस्थानों को अपने छात्रों के लिए अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराने का प्रयास करना चाहिए ताकि छात्रों की शिक्षा बाधित न हो।

उन्होंने बताया कि शिक्षक छात्रों को ऑन लाइन पढ़ा रहे हैं उसमें एक घन्टे तक एक क्लास में किस तरह पढ़ाया जाए इसकी भी ठीक तरह से ओरिएंटेशन उनके पास नहीं है।उनका कहना है कि शिक्षक स्वाभाविक रूप से अच्छा पढ़ा रहे हैं लेकिन छात्रों के फ़ीडबैक से पता चलता है कि इस एक घन्टे के दौरान छात्रों से ठीक तरह से वार्तालाप ना होने के चलते शिक्षक सिर्फ बोलता है और छात्र सुनते है।पढ़ाने वाला ना तो ठीक से पढ़ा पा रहा है और पढ़ने वाले ठीक से पढ़ पा रहे हैं।प्रोफेसर सुमन ने जानकारी देते हुए बताया कि छात्रों को ऑन लाइन एजुकेशन देने से पूर्व विदेशों में शैक्षणिक संस्थानों में अध्ययन सामग्री और ऑन लाइन शिक्षण प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाते हैं जिस तरह से ओरिएंटेशन और रिफ्रेशर कोर्सिज महामारी से पहले चलाए जाते थे उसी तरह आज की स्थिति में ऑन लाइन टीचिंग ओरिएंटेशन प्रोग्राम चलाए जाने चाहिए जिससे शिक्षकों को आगे लाभ मिले।इस तरह के ओरिएंटेशन प्रोग्राम में भाग लेने और छात्रों को बेहतर शिक्षा प्रदान कर पाएंगे।नहीं तो यह शिक्षा का अर्द्ध सत्य ही साबित होगा।सभी के लिए शिक्षा का अधिकार का नारा खोखला साबित होगा।

प्रोफेसर सुमन ने बताया कि विभिन्न एजेंसी द्वारा कराए गए सर्वो और छात्रों के फीडबैक से पता चला है कि एक घन्टे के दौरान छात्रों से ठीक तरह से वार्तालाप नहीं हो पाता है।छात्रों ने बताया है कि उनके मन में बहुत से प्रश्न जो कक्षा में पढ़ाने के दौरान पूछ सकते हैं, वह अवसर उन्हें नहीं मिलता। मनोवैज्ञानिक रूप से छात्र और शिक्षक दोनों असन्तुष्ट रहते हैं।ऐसी स्थिति में आने वाली परीक्षाओं के लिए छात्रों के मन में डर और घबराहट होती है।उनका कहना है कि ऑन लाइन शिक्षा पद्धति मीटिंग बुलाने के लिए तो ठीक है किंतु अध्ययन-अध्यापन के लिहाज से आधा-अधूरा ज्ञान छात्र प्राप्त करते हैं। उनका कहना है कि किसी भी व्यवस्था को लागू करने से पूर्व बिना फीडबैक लिए छात्रों पर जबरदस्ती ऑन लाइन एजुकेशन थोपा जाना शैक्षिक जगत के लिए हानिकारक है।उन्होंने बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे संस्थान में लाखों छात्र ग्रामीण परिवेश और गरीबी जिंदगी से निकलकर आए हैं जो कि सुविधाओं की वजह से नहीं बल्कि अपनी कर्मठता और मेहनत के बल विश्वविद्यालय में प्रवेश लेते है।उनके पास न तो तकनीकी व्यवस्थाएं–स्मार्टफोन, इंटरनेट, लेपटॉप, कम्प्यूटर, वाईफाई इत्यादि की सुविधाएं उपलब्ध है और ना ही उनके गांवों में।ऐसी स्थिति में वे इस प्रक्रिया से नहीं जुड़ पा रहे हैं।

छात्रों के पास नहीं है पाठ्यक्रम संबंधी पुस्तकें–प्रोफेसर सुमन ने लाइव सेशन में बताया है कि उन्होंने डीयू में पढ़ाने वाले शिक्षकों से बात की है और उन्होंने बताया है कि जिन कक्षाओं को वे पढ़ा रहे हैं उन छात्रों के पास पाठ्यक्रम संबंधी पुस्तकें नहीं है।जो छात्र दिल्ली के है उन्होंने किसी तरह से पुस्तकें खरीद ली है लेकिन दिल्ली से बाहर के छात्रों के पास पुस्तकों का अभाव है। कोरोना जैसी महामारी के संकट के समय लाखों छात्र गांव की ओर वापस चले गए है।ऐसी स्थिति में सिर्फ तकनीकी सुविधा प्रदत्त छात्र ही ऑन लाइन एजुकेशन का लाभ ले पा रहे है और जिनके पास तकनीकी सुविधाएं नहीं है वे वंचित है कक्षा में नहीं आ पा रहे हैं, इसमें सबसे ज्यादा आरक्षित वर्ग के एससी, एसटी, ओबीसी और विक्लांग छात्र है जिनके पास स्मार्टफोन, इंटरनेट, कम्प्यूटर और लैपटॉप जैसी कोई सुविधाएं नहीं है।इन अर्थों में यह पद्धति एक नए तरीके के भेदभाव की परंपरा की शुरुआत करने जा रही है जो छात्र हित में कतई नहीं है। उनका कहना है कि ऑन लाइन एजुकेशन को आनन फानन में लागू किया गया है।इस तरह का फार्मूला उच्च शिक्षा के लिए घातक सिद्ध होगा।

छात्रों की उपस्थिति है बहुत कम–उन्होंने बताया है कि 12 अगस्त से वे तथा उनके साथी कक्षाएं ले रहे हैं लेकिन 40 से 50 फीसदी छात्र ही कक्षा ले रहे है।इनमें उन छात्रों की ज्यादा संख्या है जिनके पास पाठ्यक्रम की पुस्तकें नहीं है।वे केवल उपस्थिति के लिए आ रहे हैं।साथ ही उन्होंने बताया है कि जो ब्लैकबोर्ड पर लिखकर उन्हें बताना चाहते हैं उसे बता नहीं सकते ,ना ही छात्रों को बार-बार देख सकते कि वे पढ़ रहे हैं या नहीं ।प्रोफेसर सुमन का कहना है कि सीवाईएसएस को चाहिए कि वे ऑन लाइन एजुकेशन सिस्टम को लागू करने से पूर्व इस पर छात्रों की राय और सर्वे कराते, अभी भी करा सकते हैं कि कितने विद्यार्थियों के पास स्मार्ट मोबाइल फोन, कम्प्यूटर, लेपटॉप, वाईफाई की सुविधाएं उनके घरों में है और कितने फीसदी इसे चलाना जानते हैं।उनका कहना है कि पिछले दिनों कुछ संस्थाओं द्वारा ओपन बुक एग्जाम संबंधी सर्वे कराया था जिसमें- 70 से 75 फीसदी छात्र इन सुविधाओं से पूर्ण वंचित पाए गए थे।इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऑन लाइन एजुकेशन के लिए विश्वविद्यालय/ कॉलेजों में सुविधाएं उपलब्ध नहीं है तो छात्रों के पास कैसे होंगी।

कार्यक्रम के अंत में श्री आशु विधूड़ी ने सभी छात्रों का धन्यवाद किया जो ऑन लाइन एजुकेशन के लाइव सेशन में जुड़े हुए थे।साथ ही प्रोफेसर सुमन को भी धन्यवाद दिया और कहा कि छात्रों को जानकारी दी वह उससे सीखेंगे।

– हंसराज ‘सुमन ‘
प्रभारी –दिल्ली टीचर्स एसोसिएशन (आम आदमी पार्टी , शिक्षक विंग )

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