ऑनलाइन शिक्षा से डिजिटल डिवाइड ही नहीं सामाजिक व आर्थिक विषमता भी बढ़ेगी

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शिक्षा बचाओ आंदोलन के अगुआ एवं रूक्टा प्रांतीय संयुक्त सचिव शिक्षाविद प्रोफेसर डॉ.रमेश बैरवा ने आज दिल्ली विश्वविद्यालय में ‘नई शिक्षा नीति 2020 एवं ऑनलाइन टीचिंग’ पर विषय पर व्याख्यान दिया। दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरु कॉलेज इवनिंग एवं रामानुजन कॉलेज के संयुक्त तत्वाधान में 1 से 14 सितम्बर तक आयोजित ‘ऑनलाइन फेकल्टी डवलपमेंट प्रोग्राम’ के तहत डॉ.रमेश बैरवा को आज के सत्र का विषय विशेषज्ञ के रूप में व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया गया। इस कार्यक्रम में देशभर से कॉलेज एवं विश्वविद्यालय शिक्षा से जुड़े करीब 600 शिक्षक सहभागिता कर रहे हैं। उल्लेख है कि डॉ बैरवा इससे पूर्व पिछले महीनों में डीयू में ही ‘नवउदारवाद के 40 वर्ष’ एवं ‘भारत चीन संबंध’ विषयों पर भी अपने व्याख्यान दे चुके हैं।

देश के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्र रहे डॉ.रमेश बैरवा ने पीपीटी प्रेजेंटेशन से प्रस्तुत अपने व्याख्यान में बताया कि 29 जुलाई को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा कोरोना की आड़ में जल्दबाजी में अनुमोदित 66 पृष्ठ की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पांच साल की मशक्कत के बाद तैयार हुई है। फिर भी लोकतंत्र की घोर अनदेखी की गई है। यह नीति संसद,राज्य सरकार,विद्यार्थी, शिक्षक जैसे असली हितधारकों से संवाद किये बिना तैयार की गई है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति नहीं असल में बिना रोडमेप का एक विजन डॉक्यूमेंट है। इसका क्रियान्वयन आसान नहीं है। नई शिक्षा नीति ऑनलाइन टीचिंग एवं लर्निंग पर जोर देती है। यह नीति कम्प्यूटर, लेपटॉप व हाई स्पीड नेट डाटा की कमी एवं नेटवर्क कमजोर आने के कारण डिजिटल एजुकेशन तक सीमित पहुंच के लिए गरीब एवं पिछड़े इलाके के युवाओं की चिंता तो जरूर करती है। लेकिन समतामूलक एवं समावेशी ऑनलाइन एजुकेशन के लिए समुचित तरीके नहीं बताती है। नतीजन वंचित तबके एवं पिछड़े इलाके के लोग ऑनलाइन शिक्षा का समुचित लाभ नहीं ले पाएंगे। इससे समाज में डिजिटल डिवाइड ही नहीं सामाजिक व आर्थिक विषमता भी बढ़ेगी। क्योंकि शैक्षिक विषमता अंततः समाज में व्याप्त आर्थिक व सामाजिक विषमता एवं भेदभाव का ही परावर्तन है।

डॉ. बैरवा ने अपने व्याख्यान में विस्तार से बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 प्राचीन भारतीय संस्कृति का ऐसे महिमागान करती है मानों कि मध्यकाल एवं आधुनिक काल में तो देश में कुछ ऐसी प्रगति हुई ही नहीं,जिस पर नई पीढ़ी कुछ गर्व कर सके। 21 वीं सदी में भारत को सुपर पावर एवं विश्वगुरु बना देने का दावा अतिउत्साह व्यक्त किया गया है। तथाकथित भारत केंद्रीत इस नई शिक्षा नीति को तैयार करने की पृष्ठभूमि में असल में कॉरपोरेट परस्त तथा धर्म व जाति के नाम नफ़रत की राजनीति को संरक्षण व प्रोत्साहन देने वाली आमजन विरोधी बाजारवादी आर्थिक नीतियां एवं संकीर्ण राजनीति हैं। जन विरोधी इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति का राष्ट्रहित में एकजुट होकर विरोध किया जाना बेहद जरूरी है। और विरोध हो भी रहा है। राजस्थान में भी शिक्षक,विद्यार्थी एवं नागरिक संगठनों का साझा मंच ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन’ 5 सितम्बर से अंतरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस तक पहली कड़ी में एन ई पी के खिलाफ जन चेतना अभियान चलाए हुए हैं।

यह विचार डॉ बैरवा ने ‘नई शिक्षा नीति एवं ऑनलाइन टीचिंग’ विषय पर डीयू में ऑनलाइन फेकल्टी डवलपमेंट प्रोग्राम में दिए व्याख्यान में व्यक्त किए।

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