ई.वी.नायकर रामासामी ‘पेरियार’

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“ईश्वर को धूर्तों ने बनाया, गुंडों ने चलाया और मूर्ख उसे पूजते हैं” कहने वाले इरोड वेंकट नायकर रामासामी जिन्हें आदर व सम्मान से लोग ‘पेरियार’ कहते थे (पेरियार का तमिल में अर्थ सम्मानित व्यक्ति है) भारत के ऐसे नेता थे जिन्हें ब्राह्मणवाद और आर्यों के विस्तारवादी सिद्धांत के खिलाफ द्रविड़ आत्मसम्मान की अलख जगाने वाले नायक के रूप में जाना जाता है। वे एक तमिल राष्ट्रवादी, राजनेता व समाज सुधारक थे. वे आजीवन हिंदुत्व व जातिप्रथा तथा जाति आधारित भेदभाव का विरोध करते रहे। यूनेस्को ने उन्हें नए युग का पैगम्बर, दक्षिण पूर्व एशिया का सुकरात, समाज सुधार आन्दोलन के पिता, अज्ञानता, अंधविश्वास और बेकार के रीति रिवाज का दुश्मन कहा है।
पेरियार का जन्म 1879 ईस्वी में तत्कालीन मद्रास प्रांत व वर्तमान तमिलनाडु के इरोड में एक संपन्न परम्परावादी परिवार में हुआ। आपके माता-पिता वेंकटप्पा नायडू एक धनी व्यापारी और मां का नाम थायामल्ल था। 1885 यानी 6 वर्ष की अवस्था में स्थानीय स्कूल में दाखिला हुया और कुछ वर्ष लगभग 5 साल पढने के बाद उन्हें अपने पिता के व्यापार में हाथ बटाने में लगना पड़ा। पिता चूँकि धार्मिक प्रवृत्ति के थे इसलिए उनके घर पर वैष्णव संतों का आना जाना व भजन तथा धार्मिक उपदेशों का क्रम चलता रहता। पेरियार के मन में बचपन से ही धार्मिक उपदेशों में आये तथ्यों की प्रामाणिकता पर सवाल उठते और वे उसे उसी तरह उठाते भी रहते। वे हर बात को तर्क की कसौटी पर बिना कसे मानने को तैयार न होते। धर्म के आधार पर होने वाले शोषण और भेदभाव के मूल कारणों को उन धार्मिक सिद्धांतों में उन्हें बहुत पहले ही दिख गया था। धीरे-धीरे वे हिन्दू महाकाव्यों तथा पुराणों में आये परस्पर विरोधी व बेतुकी बातों का माखौल भी उड़ाने लगे। आप सामाजिक कुप्रथाएँ जो धर्म से जुड़कर काफी शक्तिशाली हो गईं थीं का खुलकर विरोध किया यथा बाल विवाह, देवदासी प्रथा, स्त्रियों व दलितों का शोषण. इसके साथ ही विधवा पुनर्विवाह के विरुद्ध समाज की मानसिकता के कट्टर विरोधी थे।
1898 में 19 वर्ष की आयु में आपका विवाह 13 वर्ष की नागमल्ल से हुआ. आपकी पत्नी ने भी आपके विचारों से प्रभावित हो आपकी विचारधारा को अपना लिया. और इस तरह आपकी वैचारिक लड़ाई में हमेशा पत्नी का साथ मिला।
पेरियार के जीवन में 1904 एक महत्वपूर्ण वर्ष के रूप में आया। इसी वर्ष उन्होंने एक ब्राह्मण जिसका उनके पिता बहुत सम्मान करते थे को गिरफ्तार करवाने में न्यायालय के अधिकारियों की मदद की। इस बात की जानकारी जब इनके पिता को हुई तो वे बहुत कुपित हुए और उन्होंने सरेआम लोगों के सामने पेरियार को इसके लिए पीटा. इस विवाद के चलते पेरियार को अपना घर छोड़ना पड़ा और वे काशी चले गए। वहाँ एक दिन भूख लगने पर निःशुल्क भोज में गए, जहां उन्हें जाने के पश्चात पता चला कि यह भोज सिर्फ ब्राह्मणों के लिए है और दूसरे इसे नहीं कर सकते। उन्हें वहाँ धक्का मारकर अपमानित किया गया। माना जाता है कि अपमान के इस अनुभूति के बाद ही वे रुढ़िवादी हिंदुत्व के घोर विरोधी हो गए। इसके बाद वे कभी किसी धर्म को स्वीकार नहीं किये और आजीवन नास्तिक रहे। वे स्पष्ट कहते थे ‘दुनिया के सभी संगठित धर्मों से मुझे सख्त नफरत है.’ यही नहीं उनका तो यह भी कहना था कि ‘शास्त्र, पुराण और उनमें दर्ज देवी देवताओं में मेरी कोई आस्था नहीं है, क्योंकि वह सारे के सारे दोषी हैं और उनको जलाने तथा नष्ट करने के लिए मैं जनता से अपील करता हूँ.’ बाद में वे एक मंदिर के न्यासी का पदभार भी सम्भाला तथा इरोड के नगरपालिका प्रमुख भी बने. उन्होंने नगरनिगम अध्यक्ष के रूप में सामाजिक उत्थान को बढ़ावा दिया। वे उस वक़्त गांधी जी से काफी प्रभावित थे. उन्होंने खादी के उपयोग को बढाने की दिशा में भी कार्य किया। 1919 में सी राजगोपालचारी के अनुरोध व पहल पर वे कांग्रेस के सदस्य बने। इसके बाद 1920 के असहयोग आन्दोलन में काफी सक्रिय भागीदारी की। 1922 के तिरुपुर अधिवेशन में वे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की वकालत की।
इस बाच केरल के वैकोम में अस्पृश्यता की स्थिति बहुत बुरी थी। वहाँ मंदिर के आसपास की सड़क पर दलितों के चलने की मनाही थी। केरल कांग्रेस के अनुरोध पर पेरियार ने वैकोम जा वहां के आन्दोलन का नेतृत्व किया। यह आन्दोलन उन मंदिरों के आसपास की सड़कों पर दलितों के चलने के प्रतिबन्ध के खिलाफ था। इस आन्दोलन में उनकी पत्नी व मित्रों ने कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया।
कांग्रेस द्वारा संचालित प्रशिक्षण शिविरों में ब्राह्मण प्रशिक्षक द्वारा गैर ब्राह्मण छात्रों के साथ भेदभाव वाले व्यवहार ने पेरियार को आहात किया। वे छुआछूत व वर्ण व्यवस्था से जुड़े अत्याचारों के प्रति कांग्रेस नेताओं के नर्म रवैय्ये से भी आहत थे. 1925 के कांग्रेस के कांचीपुरम अधिवेशन में शूद्रों व अतिशूद्रों की शिक्षा और उनके रोजगार से जुड़ा प्रस्ताव रखा जो पारित न हो सका और जिसके परिणामस्वरूप पेरियार ने कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया. कांग्रेस से त्याग पत्र देने के पश्चात पेरियार ने समाज में असमानता को ख़त्म या कम करने हेतु तत्कालीन सरकार पर दबाव बनाया और ‘आत्म सम्मान’ आन्दोलन पर ध्यान केन्द्रित किया। ‘आत्म सम्मान’ आन्दोलन का मुख्य लक्ष्य था गैर ब्राह्मण द्रविड़ों को उनके सुनहरे अतीत पर अभिमान कराना। आन्दोलन के प्रचार के लिए उन्होंने तमिल साप्ताहिकी ‘कुडी अरासु’ जिसका प्रकाशन 1925 में और अंग्रेजी में एक जर्नल ‘रिवोल्ट’ का प्रकाशन (1928) शुरू किया. यह आन्दोलन जाति व्यवस्था की समाप्ति व नई वैवाहिक व सामाजिक व्यवस्था की रचना पर आधारित थी। वे अपने समर्थकों से कहते थे कि ‘विवेकवाद से बड़ा कोई धर्म नहीं है’। उनका तर्क व बुद्धिवाद को केंद्र में रखते हुए जाति तथा साम्प्रदायिक भेदभाव व छुआछूत से मुक्त समतामूलक समाज की स्थापना का सपना मानवता व आधुनिकता की कसौटी भी है।
1929 में पेरियार यूरोप, रूस मलेशिया सहित कई देशों की यात्रा की। सोवियत संघ की साम्यवादी व्यवस्था ने उन्हें काफी प्रभावित किया और वे वापस आकर आर्थिक नीति को साम्यवादी बनाने की घोषणा की. वे 1929 में ही अपना उपनाम ‘नायकर’ का परित्याग कर दिया। 1933 में उनकी पत्नी नागम्मे का देहांत हो गया।
1937 में सी राजगोपालचारी तत्कालीन मद्रास प्रेसिडेंसी के मुख्यमंत्री बने और उन्होंने स्कूलों में हिंदी भाषा की पढाई अनिवार्य कर दी। इसका विरोध तत्कालीन जस्टिस पार्टी, तमिल राष्ट्रवादी नेताओं व पेरियार ने करना शुरू किया। 1938 में कई नेता गिरफ्तार हुए। इसी साल पेरियार ने हिंदी के विरोध में ‘तमिलनाडु तमिलों के लिए’ का नारा दिया. उनका स्पष्ट मानना था कि हिंदी को जबरिया थोपने से तमिल संस्कृति नष्ट हो जायेगी और तमिल समुदाय उत्तर के अधीन हो जाएगा। हिंदी विरोधी आन्दोलन बाद में चलकर वहाँ काफी लोकप्रिय हुआ। इस आन्दोलन में जस्टिस पार्टी से सहयोग लेने के कारण वे जस्टिस पार्टी के निकट आए और 1939 में वे जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष बनाए गए। 1944 में उन्होंने जस्टिस पार्टी के स्थान पर ‘द्रविड़ कषगम’ की स्थापना की। द्रविड़ कषगम का प्रभाव शुरू में शहरी लोगों और छात्रों पर ज्यादा था. हिंदी विरोध व ब्राह्मण कर्मकांड के विरोध ने इसे दूर दराजों के गाँव तक पहुंचा दिया। द्रविड़ कषगम ने दलितों के अस्पृश्यता के उन्मूलन के लिए संघर्ष किया।
1948 में पेरियार ने दूसरी शादी की. इनकी पत्नी इनसे आयु में आधे से भी कम थीं। इस वजह से उनके समर्थक अन्ना दुरई व अन्य से मतभेद हुए जिसकी परिणति 1949 में द्रविड़ मुनेत्र कषगम की स्थापना में हुई. पेरियार ने अपने को सत्ता की राजनीति से अलग रखा तथा आजीवन दलितों व स्त्रियों की दशा व अधिकार के लिए काम करते रहे।
पेरियार की चर्चा उनकी लिखी ‘सच्ची रामायण’ के बिना अधूरी है। इस किताब पर काफी विवाद हुए. मूल रूप से तमिल में लिखी यह किताब राम सहित रामायण में आये तमाम नायकों को खलनायक के रूप में पेश करती है। पेरियार की स्थापना है कि राम आर्यों के प्रतिनिधि हैं जिन्होंने दक्षिण के द्रविड़ों का संहार किया और जिन्हें राक्षस कहा गया। हिंदी में इसे ललई सिंह यादव ने अनुवाद किया मगर 1969 में बवाल होने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इसपर प्रतिबन्ध लगा जब्त कर लिया। इसके प्रत्युत्तर में ललई सिंह यादव ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जहां न्यायालय ने प्रतिबन्ध हटा दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और उसने भी उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा। पेरियार ने द्रविड़ कषगम का लक्ष्य बताते हुए कहा था कि इसका लक्ष्य आर्य ब्राह्मणवादी और वर्ण व्यवस्था का अंत कर देना है। इस तरह ‘द्रविण कषगम आन्दोलन “उन सभी शास्त्रों, पुराणों और देवी देवताओं में आस्था नहीं रखता, जो वर्ण व जाति व्यवस्था को जैसे का तैसा बनाए हुए हैं। पेरियार 24 दिसम्बर 1973 को 94 वर्ष की एक लम्बी उमर गुजारने के बाद चिर निद्रा में सो गए। वे जीवन भर सामाजिक बुराइयों व जातीय भेदभाव के खिलाफ लड़ते रहे. मगर आज अफ़सोस है कि उनके मृत्यु के इतने वर्ष बाद भी जातीय भेदभाव ख़त्म नहीं हो सका है और इसीलिए पेरियार की प्रासंगिकता आज और भी बढ़ जाति है।

– मसउद अख्तर

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