आर्टिकल 15 देखना जरूरी क्यों 

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दशकों बाद भारतीय नायक वापस आ गया है। आयुष्मान खुराना, “जंजीर” का अमिताभ बच्चन और “अर्धसत्य” का ओम पुरी है जो ईमानदार है और सिस्टम के खिलाफ लड़ता है। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक रोमांच पैदा करता है। सिनेमेटोग्राफी गांव की सुबह और सांझ को बखूबी दिखाती है। संवाद कुछ ना कहते हुए भी बहुत कुछ कह जाते हैं। संवाद बड़े प्यार से जातिवाद का कड़वा सच समाज के सामने रखते हैं। संवाद बिल्कुल भी भड़काऊ नहीं है और ना ही किसी जाति विशेष पर कटाक्ष करते हैं बल्कि पूरी वर्ण व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं।

ऊना कांड(गुजरात),गटर में डूबा हुआ सफाई कर्मचारी, हीरो और विलेन का औकात को लेकर संवाद। बहुत सारे यादगार दृश्य जो झकझोर देते हैं। उत्तर प्रदेश की दलित ब्राह्मण सोशल इंजीनियरिंग और वंचितों द्वारा हिंसा का मार्ग अपनाने के दुष्परिणाम सच बाहर लाते हैं। सामान्य, अनुसूचित और अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक सभी को इस फिल्म को देखना चाहिए, फिल्म समानता के अधिकारों की बात करती है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे निर्भया रेप कांड को फ्रंट पेज जगह मिलती है। लेकिन बदायूं बलात्कार का मामला खारिज कर दिया गया क्योंकि यह यूपी के छोटे से शहर से था। आर्टिकल 15 कहता है कि किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म, स्थान, लिंग के आधार पर भेदभाव गैर संवैधानिक है। फिल्म भी यही कहना चाहती है। “मदर इंडिया” के बाद, यह मेरी अब तक की पसंदीदा फिल्म है जो भारतीय समाज की सच्चाई व कुरुतियों को दिखाती है।
भारत में जाति हर जगह है। लेकिन हर आदमी जातिवादी नहीं, फिल्म यही संदेश देती है। फिल्म से पता चलता है कि किसी को परिवर्तन का नेतृत्व करना होगा। लोग बस भीड़ का हिस्सा है, किसी नायक की तलाश में। वो नायक कोई सत्ता का भूखा महंत भी हो सकता है या कोई सताया हुआ नौजवान जो विद्रोह के लिए खड़ा हो जाता है या कोई ईमानदार पुलिस अफसर जैसा कि फिल्म में दिखाया गया है। फिल्म दर्शाती है कि कैसे सत्ता, ताकत व धन के बल पर शहरों मुख्यत गाँवों में जाति व्यवस्था को कायम रख लोगों पर अत्याचार और बलात्कार किए जा रहे है। गांव के धनी व साहूकार लोग अनुचित मेहनत दर पर गरीबों से मजदूरी करवाते हैं।
आर्टिकल 15 सिर्फ रेप और हत्या की जांच पड़ताल नहीं, बल्कि भारतीय जातिवादी व्यवस्था की जांच पड़ताल है। इसलिए सभी भारतीयों का इसे देखना जरूरी है। भारतीय सिनेमा के इतिहास में पहली बार किसी ने जाति को पर्दे पर उतारा है। निर्देशक अनुभव सिन्हा और लेखक गौरव सोलंकी के साहस को सलाम।

– सुजाता गौतम

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