आजादी के बहुपक्षीय आयाम

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दिल्ली,जयपुर घूमते घूमाते मै जब झुंझुनू आई तो पता चला कि फिर से आजादी आ गई,मन उमंगो से भर उठा,चलो फिर देशभक्ति के तराने गाएं। अहा! तिरंगे की रैली ,ऊपर से बडन लोगों के हाथ से लड्‍डू, सुंदर नाच_गान ,सम्मान, शाल, साफे , नारियल , ईमानदारी कर्मठता की मिशाल और फिर बडी मुश्‍किल से उनके साथ फोटू की होड ,अहा कितने बडे लोगो के साथ फोटू,बस दिन ही बन गया रे भावना और फिर जन गण मन के साथ कार्यक्रम खत्‍म! अब जल्दी जल्दी इकट्‍ठी हुई आजादी कोई गाडी,कोई मोटर,कोई साईकल तो कोई पैदल निकल लिए अपनी अपनी दिशा की और। कुछ आजादी के परवाने पहुचे जहाँ अंधेरा दिखाई नही देता पर वहाँ कभी कोई रोशन भी नही होता । सीलन से भरी गली, कचरे से अटी नाली, दरकती सडक पर भरभराती आजादी घर आकर निढाल सी बस्‍ते को धकेलती हुई रोटी खा कर इतरा कर बताती कि मास्‍टर जी आज क्या बतियाए और वे बडन लोग ,बाप रे क्‍या क्‍या बडी बडी बात बोले, बस गुनगुनाती भोली आंख और विस्‍मित होती माॅ और घबराता बाप कि उई माॅ कल बडन लोग को गिफ्‍टवा देना है रे,नहीं तो जाने मजूरी पूरी आएगी भी नही,फिर बुरा क्या,भगवन को भोग लगे या बडन लोगो को,सब चलता है रे। व्‍यवस्‍था मे कछु बोलना मतलब रूजगार से हाथ धोना। चलो आजादी का दिन निपट गया और सुबह का नाश्ता भी। काश हर महीने एक दिन आजादी का होता तो एक दिन तो लड्‍डू भरपेट।अब कुछ आजादी के परवाने चले मंझोले से घर की और, राहत की सांस लेते हुए से ,साथ मे शाम की प्लानिंग करते से, आज साहब का मूड ठीक था, चलो फाइल कुछ आगे चलेगी, इस बार पगार न कटे,पिछली राखी भी बहन की साडी रह गई,इस बार सब ठीक होगा। अरे बाबा रे ! स्‍कुल की फीस,माॅ का घुटना,चलो माॅ को अगली बार दिखा देंगे,माॅ तो सब जानती है न, ओहो ये बारीश की सीलन,मकान ठीक कराना पडेगा, बीवी की गर्मागर्म पकौडे की मनुहार खैर आज आजादी है कल करेंगे फिर सोच विचार। कम से कम आज का दिन तो आजादी का !
अब एक आजादी की पंगत चली, शाल साफे के साथ अहा! पुरूस्‍कारवा मिला रे बाबा! बडन लोगों के साथ फोटू भी,पर इसने क्‍या बडा किया होगा रे,पिछली बखत तो इस आदमी ने काम करने के पैसे मांगे थे,बापू को कैसे दकियाए थे रे बाबा,खैर छोडो,बडन लोगों री बडी बात ।अच्‍छा आज पार्टी ,चलो आजादी है भाई ।
अरे अब बची खुचीआजादी कहा चली, ओहो आज पार्क मे बैठी कर रही है ले दे की प्लानिंग। क्‍या खोया क्‍या पाया,बाप रे बाप हर बखत अपडेट। कित्‍ता कुछ याद है रे,कभी कछु भूलत ही नाही,कहा से क्‍या,और कैसे लेना । आज इनके खुश होने से सेवक भी खुश,साब का मूड ठीक आज साहब राखी की बख्शीश भी दे दे शायद। मैम साब घूमने जाएगी आज शाम,चलो फिर जल्दी से आज हम भी घर जाएंगे,मुनिया को घूमा ले आएंगे आज । कब से जी हलकान कर बैठी है। अहा! आज पंद्रह अगस्त है । सब आजाद है पर किससे पता नहीं, पर बंधा है आम आदमी,गरीबी से,बेरोजगारी से,उपहार नीतियों से, भ्रष्‍टाचार की नैतिकता से, अफसरो की फरमानी से,नेताओ की गुलामी से,परिवार के दबाव से,बढती महंगाई से,दुर्व्‍यसनो से, जाने कहा कहा से बंधा आम आदमी जब गाता है जन गण मन,तब पुकार उठते है शहीदों की आत्‍मा कि आम आदमी की गुलामी तो आज भी बेकरार है,पर फिर भी देखो उन्‍हे पंद्रह अगस्त पर एतबार है। धन्‍य है भोलेराम का जीव,जोक मे चिपका हुआ मानव,शायद तेरे भरोसे पर पंद्रह अगस्त जिंदा है ।-डॉ.भावना शर्मा

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