अपने अंदर निवास किये हुए दशानन का दहन भी जरूरी

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हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी विजयादशमी का पर्व सिर पर है। त्रेता युग में भगवान राम ने त्रैलोक्य विजेता रावण का अंत करके यह संदेश दिया था कि कोई कितना भी बलशाली क्यों न हो, लेकिन उसके अंदर की बुराइयां एक दिन उसका सर्वनाश कर देती हैं। रावण प्रकाण्ड पंडित, शिव भक्त, परम ज्ञानी और त्रैलोक्य विजेता था, लेकिन उसके अंदर उत्पन्न अहंकार ने उसका सर्वनाश कर दिया। स्थिति यह है कि ‘एक लख पूत, सवा लख नाती। ता रावण घर दिया न बाती’ अर्थात् जिस रावण के एक लाख पुत्र और सवा लाख नाती थे, उसके घर में दिया बाती जलाने वाला भी कोई नहीं बचा है।

हर वर्ष रामलीलाएं होती हैं। जगह जगह रावण के पुतले का दहन होता है। इसके बावजूद समाज में दिन प्रतिदिन अपराध लगता बढ़ते जा रहे हैं। चाहे नेता हों या मंत्री, अफसर हों या व्यापारी। सब के सब द्वेष भावना तथा अहंकार से ग्रस्त हैं। हर एक के चेहरे पर दस से अधिक मुखौटे चढ़े हैं। यानि आज समाज में बहुत कम ऐसे लोग हैं, जो कि पारदर्शी व्यक्तित्व के हों। देश भर में स्वच्छता अभियान की कवायद चल रही है, लेकिन हकीकत है कि समाज में वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण के साथ साथ मानसिक प्रदूषण भी बहुत अधिक फैला हुआ है।


आज आवश्यकता है कि हम सब मिलकर आत्मावलोकन करें। जब तक हम अपने अंदर के रावण को अर्थात् बुराइयों को नहीं मारेंगे, तब तक दशानन के पुतले को दहन करने से कोई लाभ नहीं होगा। रावण के अंदर तो सिर्फ एक ही बुराई थी वह थी उसका अत्यधिक आत्माभिमानी होना। इसके विपरीत आज तो समाज में तमाम ऐसे दशानन पैदा हो रहे हैं, जिनके सामने तो त्रेता युग का दशानन भी शर्मा जाये। इसके बावजूद हम हर वर्ष आत्मावलोकन करने के बजाय रावण के पुतलों का दहन करके खुशिया मना लेते है। मेरा मानना है कि यदि हम सब मिलकर आत्मावलोकन करके अपने अंदर की बुराइयों को जला दें तो फिर किसी दशानन जैसे पुतले को जलाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। खुद ब खुद राम राज्य आ जायेगा।

– अरविन्द जांगिड़ ठिकरिया

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