अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस

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आज अंतरराष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस है , अंतरराष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस का प्रारम्भ 17नवम्बर 1999 में यूनेस्को में स्वीकृति के पश्चात हुआ । भारतवर्ष में भी इसे 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस रुप में मनाया जाता है। सन 2007 में इसे पूर्णरूपेण अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस स्वीकृति प्रदान हो चुकी है। जैसा की मातृ शब्द से ही ज्ञात हो जाता हैं माँ , माता , आई , अर्थात जिसने हमें अपने गर्भ में रखा , जन्म दिया । भाषा अर्थात विचार विनिमय का माध्यम । अभिप्राय ये कि वह भाषा जिसे हमने अपनी माँ के सानिध्य में रह कर सीखा , उनके स्पर्श से भावों से , इंगित से । जिसमें हमने बाबा , माँ , आई , अम्मी , बेबे ये प्रथम उच्चारण शब्द सीखे जो आत्मीयता , निकटता , अपनत्व से परिपूर्ण शब्द होते हैं । जिनको श्रवण कर बाबा – माँ , दादा -दादी या भिन्न भिन्न प्रांतों में बाल्यावस्था में शिशु द्वारा सीखे शब्द मॉम , पा , डेडी इत्यादि ।विभिन्न प्रांतीय भाषाऒं की अपनी विशेष पहचान और प्रतिष्ठा , संस्कृति है । प्रांतीय भाषा का अपना रस , गुण ,उच्चारण सरसता , सहजता होती है । जो अपनी सभ्यताओं , संस्कृति के रुप में अपनी पृथक पहचान बनाती है । मातृ भाषाई ज्ञान सभी का भिन्न हॊता है जो उसकी पहचान बनाता है । शैशवावस्था में तुतलाहट वाले टूटे -फूटे , अर्ध उच्चारित शब्द मातृभाषा जो शिशु के प्रति मोह , वात्सल्य , आकर्षण पैदा करते वे शब्द इस मातृ भाषा शब्द कोश के ही शुरुआती शब्द होते । जो हर क्षेत्रीय भाषा , बोली को रसायुक्त , आनंदमयी , माधुर्यगुण सम्पन्न बनाते है । सभी प्रांतीय भाषाओं का अपना साहित्य जिसमें .लोक कथा , लोक गीत , नाटक , कविताएँ तमाम साहित्यिक विधाएँ उपलब्ध है। जिनमें भिन्न कहावतें लोकोक्तियाँ , मुहावरे आदि का रोचक साहित्य है । चूंकि हम अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की बात कर रहे हैं तो वैश्विकस्तर की भाषाऒं , जर्मन , फ़्रेंच , इंग्लीश वो सभी मातृभाषा अपना आस्तिव खो बैठेगी यदि हमने उन्हें सीखने बोलने का प्रयास नहीं किया । द्विभाषी तो लगभग सभी लोग हैं किंतु अब आवश्यक हैं बहुभाषी हो जाने की तभी हम भाषाओं के वजूद को बचा पाने में सफल होगें । इस प्रकार भाषा के फलस्वरूप हम सभी अपनी सभ्यताओं , सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित कर सकेंगे । अन्यथा मातृभाषाएं मृतप्राय हो सकती है। वैश्विक स्तर पर इनके सीखने -सिखाने , प्रचार -प्रसार के लिए कार्य करना होगा ।किसी भी भाषा का समाप्त होना , उस सभ्यता , साहित्य, भाव , वैचारिक आदान -प्रदान , चिंतन का मूल नष्ट हो जाने सा है।

– डॉ .राजकुमारी (हिंदी प्रवक्ता)

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