अनलॉक प्रथम मे योग दिवस और विशेष जनजागरूकता अभियान पर एक छोटी सी बात

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दिल अदालत,.. रूह मुंसिफ़,… आंखें बयान देती हैं
प्रतिभा कितना सच्ची ,.. गहरी ,… रूह पहचान लेती हैं
हर सांस का सज़दा होता है,..उल्फ़त की दीनी राहों में
जब,…विश्वास इबादत होता है,….धड़कन अज़ान देती हैं

आज इक्कीस जून और वैश्विक योग दिवस जो हमे हमारे नश्वर शरीर की असीम शक्तियों से परिचित करवाता है और बताता है कि शरीर में पंचभूतात्मक शक्ति का अविरल प्रवाह को साधने की कला योग है और इस बार सरकार ने भी आह्वान किया है कि मानसिक रूप से जनता को इस महामारी मे इस प्रकार जोड़ने की कवायद की जाए कि कोई भी वर्ग सामाजिक जागरूकता के योग की धारा में उपेक्षित और अनदेखा न रह जाए और इस व्यवस्था का भार प्रत्येक जिले में जिला प्रशासन के माध्यम से शक्ति के विकेंद्रीकरण के सिद्धांत के तहत अपेक्षित है। पर ज्ञातव्य है कि जो कलम केशरी बाना पहन लेती है उसके सवाल भी होते हैं पर निरपेक्ष रूप से ऐसी कलम कभी किसी का नुकसान नहीं करती बस स्थिति तक ध्यान आकृष्ट करने का दुस्साहस ही करती है हालांकि उसे समय समय पर तथाकथित शांतिदूतो का सामना भी करना पड़ता है।
इसी प्रसंग में मै अभिजन की विशेष व्यवस्था के संदर्भ में संतरे का उदाहरण देना चाहुँगी कि जल से भरे पात्र में संतरा रख दिया जाए तो केवल एक चौथाई संतरा ही दिखाई देता है और शेष नीवं की ईट की तरह अदृश्य ही होता है और जो दृश्य होता है वह किसी न किसी अधिकारी के बहाने ही गाहे-बगाहे कला का प्रदर्शन करता है या अपने श्रेयस्कर होने का सम्मान प्राप्त करता है। कई बार स्थिति यहां तक होती है कि प्रशासक जब स्वयं अपनी आंखों से नही देखता और केवल अपने आसपास की नजरों से ही सामने वाले का मुल्यांकन करता है तो प्रतिभा होना भी सामान्य व्यक्ति के वजूद के लिए आत्मघाती हो जाता है क्योंकि मझोले खुश होंगे तो ही कोई कलाकार आगे की कड़ी मे जुड़े रहने का साहस कर पाएगा और इस संदर्भ में यह समीचीन है कि हर कोई व्यक्ति सफेद हाथियों को खुश नहीं रख पाता और कुछ चेहरे हर साल की तरह सामने आते हैं और जितना मजबूत गठबन्धन उतनी बड़ी सफलता पा जाते हैं। मनुष्य के भौतिक शरीर में जब पंचभूतात्मक शक्तियों का तालमेल नहीं होता और शक्तियों का समायोजन नही होता तो हम असाध्य बिमारी से घिर जाते हैं क्योंकि शक्ति का संचार अबाधित है और ठीक इसी तरह हमारे समाज में चारो तरफ सुशांत सिंह राजपूत है कुछ मर जाते हैं और कुछ प्रतिभाएं मार दी जाती है क्योंकि हर चेहरे के पीछे कोई जैक होता है या कोई चैक या फिर अपनी अपनी श्रद्धानुसार श्रद्धासुमन अर्पित किए जाते हैं तब कही जा कर प्रतिभाओं के पास अवसर होता है अपनी योग्यता के प्रदर्शन का। हमारे सामने जाने कितनी प्रतिभाओं की हत्या होती है और हम अनजान बने रहते हैं और भूल जाते है कि निकला हुआ वक्त बड़ा कातिल होता है पर कुछ लोग इतने स्वयंभू और नियंता होते हैं कि वे येन केन प्रकारेण की हर सीमा लांघ लेने का साहस रखते हैं और उनके पीछे राजनीतिक शक्तियों का भी हाथ होता है। समाज व्यक्ति का विराट रूप होता है और हम जाने अनजाने अभिजन रूपी संतरे की चौथाई परत का सम्मान करके न्यायप्रियता का सुख प्राप्त करते हैं पर योगी को शरीर साधना होता है तब ही वह अपने पूरे शरीर को न्याय दे पाता है और इसी तरह समाज रूपी शरीर को साधने के लिए प्रशासन को चुनिंदा आंखों से देखता है तो योग की मूल अवधारणा को उपेक्षित कर बैठता है इसलिए प्रशासक को चाहिए कि चुनिंदा आंखों के साथ खुद की अनुभूति को भी काम मे लेते रहे ताकि समाज की उपेक्षित प्रतिभाओं को भी समान न्याय दे सके और कही और कोई प्रतिभा कोई सुशांत सिंह राजपूत नही बने। मुझे याद है कि एक गायक कलाकार अपनी पीड़ा उंडेलते हुए एक दिन रो बैठा कि वह जब मंझोले अधिकारी को खुश नहीं रख पाया तो उसे येनकेन प्रकारेण हर कार्यक्रम से निकलवाने के प्रयास किया गया और तो और सामर्थ को तथाकथित अधिकारी ने अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि के रूप में लोगों को सांझा किया ताकि हतोत्साहित व्यक्ति तक यह संदेश भी जा सके कि हमसे उलझे तो सारे रास्ते बंद है । पर इस तरह के बंद रास्ते ही प्रायः असाध्य परिस्थितियों का निर्माण भी कर देते हैं या वे आत्महत्या के शिकार हो जाते हैं। इसी तरह एक शिक्षक को छब्बीस जनवरी के पुरस्कार मे नाम नामांकित होने के बाद भी तथाकथित मंझोले अधिकारी ने पुरस्कार नही लेने दिया क्योंकि मझोले अधिकारी से शिक्षक की बनती नहीं थी और अधिकारी सत्ता को गुमराह करने का सिद्धहस्त था। ये एक व्यक्ति नहीं होते एक चैन सिस्टम की तरह काम करते हैं कि तेरे घर मेरे वालों का सम्मान हो जाए और मेरे घर तेरे वालो का सम्मान हो जाए दरअसल मंझोले अधिकारीयों और समाज के विशेष प्रतिष्ठित लोगों का संयोजन एंटीबायोटिक दवाओं की तरह प्रशासन रूपी शरीर को सुविधाएं तो देता है पर उससे छीन लेता है एक सम्यक दृष्टि, समदर्शी न्याय और तीन चौथाई प्रतिभाओं को नीवं मे दफन कर दिया जाता है और आलाकमान को खबर भी नहीं होती और जाने कितने सुशांत सिंह राजपूत की तरह हर प्रतिभा ने आत्महत्या नहीं की पर उनकी प्रतिभाओं की हत्याएं होती रही और दीपक तले अंधेरे में रोशन योजनाओं के फेर में स्वस्थ समाज के योग की अवधारणा कागजी हो गई । सनद रहे कि यह दर्द हर जगह का दर्द है कोई अभिजन अपने पर लेकर शांतिदूतो को घर भेजकर घर की शांति बाधित नहीं करे क्योंकि आपका सामर्थ्य स्वीकार्य है। बांस के पेड़ की तरह वक्त की धारा में सर झुका कर जी लेना पलायन से ज्यादा कही बेहतर है। आखिर यह भी योग कहता है।

– डॉ.भावना शर्मा
(मोदियो की जाव
झुंझुनूं, राजस्थान)

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